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Delhi Eletion: दिल्ली में बिहारियों ने भी बोला, जमे रहो केजरीवाल

दिल्ली में विधानसभा चुनाव था मगर चर्चा यूपी-बिहार का भी जोड़ो पर था| कारण था कि दिल्ली के लगभग 15 सीटों पूर्वांचल बहुल है जबकि आधी से ज्यादा सीटों पर पूर्वांचली वोटर जीत-हार तय करते हैं| आम आदमी पार्टी (AAP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) से लेकर कांग्रेस पार्टी, सबकी नजर पूर्वांचली वोटर्स पर थी| पूर्वांचली को लुभाने के लिए बीजेपी ने जहाँ प्रसिद्ध भोजपुरी गायक मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया हुआ है, तो कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले कृति आज़ाद (Kriti Azad) को प्रचार समीति का प्रमुख बनाया था| वहीं आम आदमी पार्टी को अपनी जन कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा था|

पूर्वांचलियों ने लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के पक्ष में वोट किया था| इसलिए बीजेपी को विधानसभा में भी उनसे बहुत उम्मीदें थी| मगर 11 फरवरी को रिजल्ट उसके ठीक उलट आया| बिहार और यूपी के लोगों ने बीजेपी के हिन्दू राष्ट्रवाद को नकार दिया और केजरीवाल(Arvind Kejriwal) के विकाश को अपना पूरा समर्थन दिया| यहाँ तक कि कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन में लड़ रही बिहार की तीन पार्टियों का हाथ भी खाली रहा|

जहां बीजेपी ने दो सीटें जेडीयू और एक सीट एलजेपी को दी थी वहीं कांग्रेस ने आरजेडी के लिए चार सीटें छोड़ी थी| लेकिन लगभग सभी पूर्वांचली सीटों पर आप का परचम लहराया| सबसे बुरा हाल आरजेडी का रहा जिसके चारों उम्मीदवारों की जमानत तो जब्त हुई ही, तीन को नोटा से भी कम वोट मिले|

पिछले कुछ चुनाव से लगातार इंडिया टुडे एग्जिट पोल (India Today Exit Poll) लगभग सही हो रहा है| उनके सर्वे के अनुसार इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिटी वाइज वोट शेयर को देखा जाए तो लोगों ने आम आदमी पार्टी पर भरोसा जताया है| AAP के साथ दिल्लीवासी (55 फीसदी), पूर्वांचली (55 फीसदी), हरियाणवी (54 फीसदी), राजस्थानी (61) और अन्य (55 फीसदी) रहे| यानी इस चुनावी नतीजे से पता चलता है कि 2015 की तरह इस बार भी पूर्वांचली वोटर्स ने आम आदमी पार्टी को ही वोट दिया है|

दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा. Image: Subhash Barolia

पूर्वांचली के वोटिंग पैटर्न को लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद एक दिलचस्प आंकड़ा सामने आया था| 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद सीएसडीएस ने पूर्वांचली वोटर्स पर एक सर्वे करवाया| इस सर्वे में जिन 56 फीसदी पूर्वांचली ने लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को वोट दिया था, उनमें से 24 फीसदी पूर्वांचली ने कहा कि वो राज्य विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी को वोट करेंगे| मतलब बीजेपी के आधे वोटर्स पहले से ही मन बना चुके थे कि वो 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट करेंगे| नतीजों से ऐसा लग भी रहा है|

धर्म के राजनीति को नकार, विकास की राजनीति को चुनकर दिया एक बड़ा सन्देश 

एक बड़ी बात ये भी रही है कि दिल्ली में पूर्वांचल के ज्यादातर वोटर्स वर्किंग क्लास से आते हैं| बहुत सारे लोग मेहनत मजदूरी करने वाले हैं| इन लोगों के लिए केजरीवाल सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने काम किया| इस वजह से भी एक तरफ वो मोदी के चेहरे को केंद्र में देखना चाहते थे तो राज्य में उन्हें केजरीवाल जैसा सीएम ही चाहिए था| दिल्ली का मिडिल क्लास पूर्वांचली वोटर्स भी आम आदमी पार्टी का समर्थक है- वजह है बिजली और पानी पर मिलने वाली छूट| सरकारी स्कूलों की बेहतर हालत और स्वास्थ्य सेवाओं की सुधरती स्थिति|

दिल्ली का चुनाव में बिहारियों या पूर्वांचलियों का वोट पैटर्न समझाना इसलिए भी जरुरी है कि इसी साल बिहार में भी विधानसभा चुनाव है| बिहार में भी भाजपा एक बड़ी पार्टी है| दिल्ली में उसके कट्टर हिंदूवादी प्रयोग के असफल हो जाने के बाद उसको फिर से अपनी रणनीति पर सोचना पड़ेगा| एक तरफ बीजेपी के कमजोर होने से उसके सहयोगी दल जदयू (Janta Dal United) खुश होगी, क्योकि अब वह बीजेपी से ज्यादा सीट लेने का दवाब बना सकेगी| वही दुसरे तरफ दिल्ली में शिक्षा के चुनावी मुद्दा बन जाने से नीतीश थोड़ा मुश्किल में होंगे, क्योंकि नीतीश कुमार के 15 साल के राज में शिक्षा उनकी सबसे कमजोर पक्ष है|

राष्ट्रीय पार्टी बन सकती है नीतीश की जदयू, अरुणाचल प्रदेश में भी मिली 7 सीटों पर जीत

नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड 16 लोकसभा सीटें जीतकर एकबार फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही है| बिहार में तो जदयू की सरकार है, इसके साथ अब अरुणाचल प्रदेश में भी जदयू राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर के आई है|

अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में जदयू ने 14  सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें सात को जीत मिली| इसके साथ ही 60 सदस्यीय अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में भाजपा के बाद जदयू दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है|

बिहार के बाहर नगालैंड के बाद अरुणाचल प्रदेश दूसरा राज्य है, जहां जदयू ने अपना  परचम लहराया है| वहीं पिछले साल नगालैंड  विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने एक सीट पर विजय  हासिल की थी और चार उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे| ऐसे में नगालैंड और  अब अरुणाचल में मिली जीत से स्पष्ट है कि नीतीश कुमार के  नेतृत्व में जदयू ने सामाजिक न्याय और विकास को बल देकर उत्तर-पूर्व में  भी विस्तार किया है|

राष्ट्रीय पार्टी दर्जा लगभग मिलना तय

जदयू को इस साल राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल सकता है. इसकी अधिकतर शर्तों को पार्टी ने पूरा कर लिया है| मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में जदयू की यह बड़ी सफलता है| वैसे जॉर्ज फर्नांडीस के जमाने में जदयू को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त था|

अब एक बार फिर जब से नीतीश कुमार ने पार्टी अध्यक्ष का दायित्व संभाला है, जदयू को दूसरे प्रांतों में भी सफलता मिल रही है|

बिहार और अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में राज्य की दूसरी सबसे पार्टी बनने के बाद इस साल जम्मू-कश्मीर और झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी जदयू अपने उम्मीदवार उतारेगा| जम्मू-कश्मीर में पार्टी के कई नेता स्थानीय निकाय चुनाव जीत चुके हैं| नगालैंड में भी जदयू के एक विधायक हैं और सरकार में मंत्री भी हैं|

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की शर्तें
 यदि कोई पार्टी कम-से-कम तीन राज्यों को मिलाकर लोकसभा की दो फीसदी सीटें (2014 के चुनाव के अनुसार 11 सीटें) जीतती है|
यदि कोई पार्टी चार लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार राज्यों में छह फीसदी वोट प्राप्त करती है|
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विश्लेषण: जल्दी में है प्रशांत किशोर, क्या नीतीश को खटक रही है उनकी महत्वाकांक्षा?

प्रशांत किशोर को देशभर में सफल चुनावी रानितिकार के रूप में जाना जाता है मगर प्रशांत किशोर देश की राजनीति में खुद को एक सफल राजनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं| उनके पास कई विकल्प थे मगर बीती वर्ष 16 सितंबर को प्रशांत किशोर ने रणनीतिकार से नेता बनने के तरफ अपना पहला कदम बढ़ाते हुए जदयू में सामिल ही गये|

इस समय प्रशांत को लेकर जदयू के अन्दर जो घमासान मचा है, उसकी पटकथा तो उसी समय लिखा गया था, जब नीतीश कुमार ने पीके को ‘भविष्य’ बोलकर जेदयू में स्वागत किया| नीतीश कुमार ने यह किस परिप्रेक्ष्य कहा था, वह तो वे ही जाने मगर मीडिया ने इसे नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में लिया| नीतीश कुमार ने भी अघोषित रूप से उनको पार्टी में नंबर 2 की हैसियत दे दी|

पार्टी में प्रशांत किशोर के बढ़ते कद और पुराने नेताओं की घटती अहमियत से भड़कती चिंगारियों को शोला बनना तो तय था मगर उस समय नीतीश का आशीर्वाद होने के कारण किसी के आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हुई| 

यहाँ यह जानना जरुरी है कि प्रशांत किशोर राजनीति में सिर्फ विधायक, सांसद या मंत्री बनने नहीं आये हैं| उनकी महत्वाकांक्षा इस से कही ज्यादा बड़ा है| ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार को पीके के महत्वाकांक्षा के बारे में पता नहीं रहा होगा| राजनीति में सब अपना फायदा देखता है| नीतीश और प्रशांत दोनों ने भी एक दुसरे में अपना फायदा देखा| मगर अब प्रशांत किशोर की जल्दबाजी अब नीतीश को खटक रही है!

प्रशांत जब से जदयू में सामिल हुए हैं, वे जदयू और नीतीश के नाम पर लोगों को जोड़ तो रहे हैं मगर पार्टी से नहीं खुद से| जदयू को उम्मीद थी कि पीके के आने से जदयू मजबूत होगा मगर उनकी संस्था आईपैक लगातार नीतीश कुमार के जगह प्रशांत किशोर को स्थापित करने में लगी है| प्रशांत किशोर पार्टी हित से ज्यादा अपने हित में लगे हुए हैं या यूं कहें कि प्रशांत नीतीश के जदयू में रहते हुए, उसके समान्तर अपना जदयू तैयार करने में लगे हैं| यही बात नीतीश को खटक रही है और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रशांत और नीतीश के बिच दूरी बढ़ गयी है|

इसका सबसे पहले संकेत हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के गाँधी मैदान में हुए संकल्प रैली में दिखा| जिसमें पार्टी के पोस्टर के साथ मंच पर भी प्रशांत किशोर को जगह नहीं दी गयी| 

5 मार्च को पीके ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘अगर मैं किसी को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनाने में मदद कर सकता हूं ,तो बिहार के नौजवानों को मुखिया या विधायक भी बना सकता हूं’। पार्टी में अकेले पड़े पीके का यह बयान जदयू को चेतवानी देने के तरह लिया गया| इसपर जदयू के नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि मनुष्य को अपने बारे में भ्रम हो जाता है। विधायक, सांसद जनता बनाती है और उसे पार्टी टिकट देती है।

पीके यही नहीं रुके| एक इंटरव्यू में वे नीतीश कुमार के फैसले को ही गलत बता दिया है| जिसको लेकर पार्टी के अन्दर ही उनको लेकर भूचाल मचा है|

दरअसल, जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने कहा है कि वह भाजपा के साथ दोबारा गठजोड़ करने के अपनी पार्टी के अध्यक्ष नीतीश कुमार के तरीके से सहमत नहीं हैं और महागठबंधन से निकलने के बाद भगवा पार्टी नीत राजग में शामिल होने के लिये बिहार के मुख्यमंत्री को आदर्श रूप से नए सिरे से जनादेश हासिल करना चाहिये था|

इसपर जद (यू) के महसचिव आऱ सी़ पी़ सिंह ने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में पीके का नाम लिए बगैर कहा, “जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वे उस समय पार्टी में भी नहीं थे। उन्हें इसकी जानकारी नहीं होगी। सभी नेताओं की सहमति से पार्टी महागठबंधन से अलग हुई थी और फिर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल हुई थी।”

पीके के हालिया बयानों से स्पष्ट है कि जद (यू) में सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा है। बेगूसराय के शहीद पिंटू सिंह के पार्थिक शरीर के पटना हवाईअड्डा पहुंचने पर जब सरकार और पार्टी की ओर से श्रद्धांजलि देने वहां कोई नहीं गया, तब पीके ने पार्टी की ओर से माफी मांगी थी और इसके लिए उन्होंने ट्वीट भी किया था। जिसके कारण प्रशांत किशोर कि व्यक्तिगत छवि तो चमकी मगर पार्टी की बहुत किरकिरी हुई| इसको भी अब इसी विवाद से जोड़ कर देखा जा रहा है|

जदयू के सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर को लेकर जदयू में पहले से ही नाराजगी थी मगर नीतीश कुमार के समर्थन के कारण कोई बोल नहीं रहा था| मगर हालिया घटनाक्रम को देखें तो यह साफ़ है कि प्रशांत किशोर अब पार्टी में अकेले पड़ गयें हैं| प्रशांत की महत्वाकांक्षा और उसके लिए उनकी बेतावी अब नीतीश को खटक रहा है! पीछे मुड़कर देखें तो नीतीश कुमार ऐसे हरकत को सहन नहीं करतें| उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और शरद यादव इसके कुछ उदाहरण हैं|

 

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जॉर्ज फर्नांडेस की जन्मभूमि भले ही दक्षिण में हो मगर उनकी कर्मभूमि बिहार ही रहेगी

मंगलुरु में पले बड़े पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडेस की जन्मभूमि भले ही दक्षिण में हो पर उनकी कर्मभूमि बिहार ही रहेगी. उस समय जब सोशल मीडिया जैसा आसान साधन नहीं हुआ करता था उस दौर में जॉर्ज फर्नांडेस ने दक्षिण से लेकर उत्तर की दुरी को तय किया.

फर्नांडेस ने उस समय जेल में थे जब 1977 में बिहार की जनता ने उन्हें तीन लाख वोट देकर मुजफ्फरपुर सीट से लोक सभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के लिए चुना.

तब वे जनता पार्टी के उम्मीदवार थे और देश में लगी इमरजेंसी के केस में जेल में बंद थे. चुनाव के दौरान वो शायद ही स्वयं प्रचार कर पाए. ये जीत ऐतिहासिक इसलिए भी रही क्योंकि जॉर्ज फर्नांडेस ने तीन बार के कांग्रेस सांसद एस.के.पाटिल को हराया था. जहां एक ओर 1989 में वी.पी सिंह सरकार के काल में जॉर्ज फर्नांडेस ने रेलवे मंत्री का कार्यभार संभाला वहीं 1998 – 2003 तक चली वाजपई सरकार के दौरान फर्नांडेस रक्षा मंत्री बनाए गए.

कारगिल युद्ध के समय सैनिकों का हौसला बढ़ाने वे सियाचिन जाते रहते थे. पोखरन टेस्ट से भी उन्होंने कभी अपनी नज़ारे नहीं हटाई.

मुजफ्फरपुर में फैलाई विकास की नई जड़े

अपनी इस जीत के बाद ही फर्नांडेस ने 1978 में मुज़फ़्फ़रपुर में थर्मल पावर प्लांट की नीव डाली जिसने ज़िले में रोज़गार के साधन बढ़ा दिए. फर्नांडेस ने चार बार मुजफ्फरपुर और तीन बार नालंदा से चुनाव जीता. नालंदा में उन्होंने फैक्टरियों के साथ राजगिर में सैनिक स्कूल भी खुलवाया.

जॉर्ज फर्नांडेस कि बदौलत दूरदर्शन केंद्र मुजफ्फरपुर तक पहुंचा. उन्होंने मुजफ्फरपुर में इंडियन ड्रग्स एंड फार्मासूटिकल्स लिमिटेड खुलवाया. इस से पहले मुजफ्फरपुर में केवल चीनी और तम्बाकू की फैक्टरियां ही हुआ करती थी.

लालू के लिए बन गए थे चुनौती

फर्नांडीस ने बिहार की राजनीति में एक प्रमुख भूमिका निभाई. याद होगा 1990 के दशक के दौरान फर्नांडेस ने राष्ट्रीय जनता दल (रजद) प्रमुख लालू प्रासाद यादव  के साथ अनबन के चलते रजद के लिए एक चुनौती बन चुके थे. फर्नांडेस ने शिकायत की कि उन्हें लालू द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है और ‘फ्रॉड फर्नांडेस’ कहकर बुलाया जा रहा है.

बाद में उन्होंने नितीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल ग़फ़ूर के साथ मिलकर 1994  में समता पार्टी को जन्म दिया. फर्नांडेस इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए. 1995 चुनाव में फर्नांडेस की समता पार्टी के खराब प्रदर्शन के चलते उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिला लिया. फर्नांडेस लालू की आँख का कांटा तोह थे ही पर इस गठबंधन के कारण लालू का शासन भी खत्म हो गया. 2005 के आते आते समता पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) में जा मिली.

जब नितीश के साथ बिगड़े सम्बन्ध

एक छत में रहने के बावजूद नितीश और फर्नांडेस में अनबन होना स्वाभाविक था. नितीश ने फर्नांडेस को हटाकर शरद यादव को अपनी पार्टी का नया अध्यक्ष नियुक्त कर लिया था. 2009 में ये खबर आई की खराब स्वस्थ्य के चलते फर्नांडिस को मुजफ्फरपुर से जनता दल (यूनाइटेड) के नामांकन से मना कर दिया गया था. फर्नांडेस की हार के बावजूद किसी तरह वे राज्य सभा में अपनी सीट सुनिश्चित करने में कामयाब रहे.

मुजफ्फरपुर के लोगो के थे चहेते

फर्नांडेस टैक्सी ड्राइवर यूनियन के प्रमुख नेता भी रह चुके हैं. उन्होंने सोशलिस्ट ट्रेड यूनियन ज्वॉइन किया और होटलों, रेस्टोरेंटों में काम करने वाले मजदूरों की आवाज उठाई. नालंदा के लोगों के बीच फर्नांडेस ‘जारजे साहेब’ के नाम से मशहूर थे. मुज़फ़्फरपुर के लोग उन्हें बहुत पसंद किया करते थे. दिल्ली में होने के बावजूद वहां के लोगो फर्नांडेस को पोस्टकार्ड के ज़रिए अपनी समस्याएं लिखकर भेजते थे.

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बिहार एनडीए में सीट का हुआ बटवारा, बीजेपी-जेडीयू को 17-17 और लोजपा को मिले 6 सीटें

बिहार एनडीए में सीट का बटवारा हो गया है|

40 लोकसभा सीटों वाले राज्य में बीजेपी 17, जेडीयू 17 और एलजेपी 6 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। लोक जन शक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान को राज्यसभा भी भेजा जाएगा।

रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये ऐलान किया। रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान भी इस दौरान मौजूद थे।

शेयरिंग की घोषण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने की| शाह ने यह भी कहा कि इन सिटों के अलावे लोपजा प्रमुख रामविलास को होने वाली राज्यसभा चुनाव में एनडीए के सिट से भी लड़ेंगे| इससे पहले जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री से मिलने उनके दिल्ली स्थित आवास पर पहुंचे है| इसके साथ ही लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान और चिराग पासवान भी दिल्ली लौट आये है. दोनों कल मुंबई गये हुए थें|

 

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नीतीश ने चुना अपना उत्तराधिकारी, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर जेदयू में हुए शामिल

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर परदे के पीछे से बहार निकल अब राजनितिक रंग मंच के मुख्य किरेदार के तौर पर सबके सामने आ गये हैं| चुनावी राजनीति में अपनी महारत दिखा चुके और राजनीति के चाणक्य के रूप में मशहूर बिहार के बक्सर ज़िले में जन्मे प्रशांत किशोर पांडेय ने बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड का दामन थाम लिया है|

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत से जीत दिलाने में प्रशांत किशोर को श्रय दिया जाता है| बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के गठबंधन को जीत दिलाने में भी किशोर का महत्वपूर्ण योगदान था। बिहार के बाद उन्होंने पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी सत्ता हासिल करने में अहम मदद की थी।

अपनी राजनीतिक पारी को शुरू करने से पहले किशोर ने खुद ट्वीट करके अपनी नई यात्रा की जानकारी दी थी। प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर कहा था, ‘बिहार से अपनी नई यात्रा की शुरुआत करने को लेकर बहुत उत्साहित हूं।’ प्रशांत किशोर इस से पहले कई दलों के साथ काम कर चुकें हैं| कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बीच अच्छी पैठ होने के बाद भी प्रशांत किशोर ने जेदयू जैसे छोटी पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया है|

इसके पीछे कई कारण बताये जा रहें हैं| चुकीं प्रशांत किशोर खुद मूल रूप से बिहारी हैं इसलिए वह बिहार में काम करना चाह रहे थे| बिहार विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार के साथ काम करते हुए वे नीतीश कुमार के नजदीक आए| मगर इस सब के अलावा जो बात राजनितिक हलकों में तैर रही है, वह हैं कि प्रशांत किशोर को जेदयू में नीतीश कुमार के बाद नंबर 2 की हैसियत दी जाएगी|

यही नहीं, प्रशांत किशोर के जदयू में शामिल होने की खबरों के बीच बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार ने उन्हें भविष्य बताया है| मीडिया से बात करते हुए नीतीश कुमार ने कहा, ‘ मैं आपको कहता हूं, प्रशांत किशोर भविष्य हैं|’

सूत्रों से आ रही ख़बरों के अनुसार नीतीश कुमार ने जेदयू में प्रशांत किशोर को अपना उत्तराधिकारी बनाने का आश्वासन दिया है| प्रशांत किशोर अपनी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आई-पैक) के जरिये जेदयू को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करेंगे और 2020 में फिर से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का रणनीति बनायेंगें| कुछ राजनितिक पंडितों का माने तो 2025 में प्रशांत किशोर जेदयू के तरफ से बिहार में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी हो सकतें हैं|

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बिहार: एनडीए में सीटों के बटवारे की खबर लीक, बीजेपी के फ़ॉर्मूले को सहयोगी पार्टियों ने नकारा

पिछले दिनों मीडिया रिपोर्टों में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में एनडीए के सहयोगी दलों के बीच सीटों का बटवारा होने की खबर छाई रही| खबर के अनुसार बिहार के 40 लोकसभा सीटों में से बीजेपी 20, जेडयू 12, एलजेपी 5 और रालोसपा को दो सीट पर चुनाव आएगी| साथ ही, पार्टी से निलंबित सांसद अरुण कुमार को भी मैदान में उतारने की बात कही जा रही है| बताया जाता है कि जदयू को रिझाने के लिए जरूरत पड़ने पर झारखंड में एक सीट चुनाव लड़ने के लिए दी सकती है|

हालाँकि यह खबर लीक होते ही बिहार के राजनीतिक गलियारों में हरकंप मच गया| गठबंधन में सामिल सभी दल ने एक सुर में इसे अफवाह बताया| एलजेपी नेता चिराग पासवान ने एनबीटी से कहा कि सीटों के फॉर्म्युले की बात अफवाह है। अभी इस बारे में कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है। वहीं, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि सीटों पर बात के लिए पार्टी की ओर से चिराग अधिकृत हैं और वह पंजाब में हैं। अभी इस बारे में कोई बात नहीं हुई है। एनडीए के दूसरे सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि अभी यह महज अटकलें हैं। सीट समझौते को लेकर एनडीए दलों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई है। बाद में बीजेपी और जेडीयू नेताओं ने भी सीटों को लेकर कोई अंतिम सहमति बनने से इनकार किया।

वैसे,सूत्रों से मिल रही ख़बरों के अनुसार जेडीयू 15-16 सीटों पर सहमत हो सकती हैं, वहीं रालोसपा अपने लिए 7 सीटों की मांग कर रही है मगर पार्टी सूत्रों के अनुसार वह 3 सीटों पर भी मान सकती है अगर पार्टी से बागी संसद अरुण कुमार को एनडीए से दूर रखा जाता है|

गौरतलब है कि रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा बीजेपी पर दवाब बनाने के लिए लगातार आरजेडी के साथ जाने की संकेत दे रहे हैं| हाल ही में उनका खीर वाला बयान मीडिया के सुर्ख़ियों में छाया रहा| कुशवाहा ने हालिया बयान में कहा था कि यदुवंशियों (राजद) का दूध और कुशवाहों (रालोसपा) का चावल मिल जाए तो खीर बनने में देर नहीं… लेकिन खीर बनाने के लिए केवल दूध और चावल ही नहीं बल्कि छोटी जाति और दबे-कुचले समाज के लोगों का पंचमेवा भी चाहिए। इस बयान को कुशवाहा के महागठबंधन के प्रति रुझान के तरह देखा गया|

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मोदी सरकार का बिहार को सौगात, कोसी नदी पर बनेगा नया फोर लेन पुल

केंद्र की मोदी सरकार ने बिहार को एक नयी सौगात दी है|  मधेपुरा जिले के फुलौत के पास कोसी नदी पर फोरलेन पुल बनेगा| आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने इसकी मंजूरी दे दी है|

नेशनल हाईवे 106 पर फुलौत में 6.930 किलोमीटर लंबे 4-लेन पुल का निर्माण होगा। सीसीईए ने बिहार में राष्‍ट्रीय राजमार्ग-106 के मौजूदा बीरपुर-बिहपुर खंड के उन्नयन व पुनर्वास को हरी झंडी दी है। इसके तहत 106 किलोमीटर से 136 किलोमीटर तक ‘पेव्‍ड शोल्‍डर के साथ 2-लेन’ दुरुस्त होंगे। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद यह जानकारी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मीडिया को दी|

इस परियोजना पर 1478.40 करोड़ रुपये की लागत आएगी। इस परियोजना के लिए निर्माण अवधि 3 वर्ष है और इसे जून 2022 तक पूरी होने की उम्‍मीद है। इस नये पुल से निर्माण के क्रम में लगभग 2.19 लाख श्रम दिवस के लिए प्रत्‍यक्ष रोजगार सृजित होंगे।

नए पुल के बन जाने से मधेपुरा, सुपौल, सहरसा और भागलपुर के बीच बेहतर सड़क संपर्क कायम होगा। यही नहीं इनके बीच की दूरी 60 किलोमीटर कम हो जाएगी। वर्तमान में फुलौत से बिहपुर जाने के लिए लगभग 72 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। इस परियोजना के तहत कोसी नदी पर 4-लेन वाले इस नये पुल के निर्माण होने पर फुलौत और बिहपुर के बीच की दूरी घटकर महज 12 किलोमीटर रह जाएगी।

दरअसल, राष्‍ट्रीय राजमार्ग 106 पर फुलौत और बिहपुर के बीच 10 किलोमीटर लंबा लिंक नादारद है और वह कोसी नदी के कटाव क्षेत्र में आता है। इस नये पुल के निर्माण से बिहार में राष्‍ट्रीय राजमार्ग 106 पर उदाकिशुनगंज और बिहपुर के बीच मौजूदा 30 किलोमीटर लम्‍बी खाई दूर हो जाएगी जो नेपाल, उत्‍तर बिहार, पूर्व-पश्चिम गलियारा (एनएच-57 से होते हुए) और दक्षिण बिहार, झारखंड, स्‍वर्ण चतुभुर्ज (एनएच-2 से होते हुए) के बीच संपर्क मुहैया कराएगी। इसके अलावा राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या-31 की पूर्ण उपयोगिता सुनिश्चित होगी।

वर्तमान में यह राष्‍ट्रीय राजमार्ग केवल एक लेन (मध्‍यवर्ती लेन) के साथ खराब स्थिति में है। इसलिए इस राजमार्ग पर वाहनों के लिए औसत गति 20 किलोमीटर प्रति घंटे से कम है। लेकिन इस राजमार्ग के ‘पेव्‍ड शोल्‍डर के साथ 2-लेन’ में उन्‍नयन एवं पुल के निर्माण से यातायात की गति बढ़कर करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटे हो जाएगी।

 

नीतीश कैबिनेट का होगा विस्तार! ये बनेंगे नए मंत्री ..

समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफे के बाद, बिहार के राजनितिक गलियारों में नीतीश कैबिनेट के विस्तार का चर्चा जोरो पर है| कैबिनेट में फिलहाल आठ जगह खाली है। आधे दर्जन नए मंत्रियों के जल्द शामिल किए जाने की चर्चा है। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में सामाजिक समीकरण को साधने के लिए यह कवायद की जाएगी|

हाल के दिनों में एससी-एसटी एक्ट को लेकर दलितों ने मोदी सरकार के खिलाफ असरदार आंदोलन किया है| दो अप्रैल को दलितों का असरदार भारत बंद तो था ही, उसके साथ ही दलित नेता जीतन राम मांझी ने भी एनडीए का दामन छोड़ राजद के साथ जा चुके हैं| सूत्रों के मुताबिक, नीतीश की कोशिश दलितों में पैठ बढ़ाने और गैर यादव अन्य पिछड़ा वर्ग को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की है| ताकि दलितों के बीच एक अच्छा सन्देश जाए और पार्टी का आधार मजबूत हो| इसी के मद्देनजर श्याम रजक और कांग्रेस छोड़ कर जेडीयू का दामन थामने वाले अशोक चौधरी कैबिनेट के रेस में सबसे आगे नजर आ रहे हैं|

मंजू वर्मा नीतीश सरकार में एकलौती महिला मंत्री थी| उसके इस्तीफा के बाद नीतीश कैबिनेट में महिला प्रतिनिधित्व ख़त्म हो गया है| महिला को प्रतिनिधित्व देने के लिए एक महिला मंत्री बनना तय है| बीमा भारती, रंजू गीता या लेसी सिंह इसके प्रबल दावेदार हैं|

इसके साथ ही मंजू वर्मा कुशवाहा समाज से आती है| इस समाज के वोट बैंक बार अभी सभी पार्टियों का नजर है| कुशवाहा समाज का समर्थन नीतीश कुमार को मिलता रहा है| मगर अब इस वोट बैंक पर अब कई लोग दाबा कर रहे हैं| नीतीश कुमार इस समाज को साधने के लिए मंजू वर्मा के जगह किसी दुसरे कुशवाहा नेता को ही मंत्रिमंडल सामिल करेंगे| कुशवाहा जाति से कई नेता इसके दावेदार हो सकते हैं, जिनमें अभय कुशवाहा और उमेश कुशवाहा शामिल हैं|

अभय कुशवाहा को युवा जदयू की कमान दे दी गई है और वह जिस मगध प्रमंडल से आते हें वहां से कृष्णनंदन वर्मा इस समाज से पहले ही मंत्री बने हुए हैं, इसलिए उत्तर बिहार के किसी कुशवाहा नेता को यह पद मिल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा का कोटा लगभग पूरा हो गया है। नीतीश कैबिनेट में रालोसपा को कोई जगह नहीं मिली है। अगर एनडीए के केंद्रीय नेतृत्व का दबाव पड़ा तो रालोसपा के सुधांशु शेखर को भी मंत्री बनाया जा सकता है।

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2020 में नीतीश कुमार को खुद बिहार के मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी छोड़ देनी चाहिए: उपेन्द्र कुशवाहा

लोकसभा और बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक क्या आया, बिहार के राजनीति में बयानबाजी का दौर चल पड़ा है| एनडीए के सहयोगी और केंद्रीय राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने बिहार के मुख्यमंत्री को लेकर बड़ा बयान दिया है| एक नीजी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि 2020 में नीतीश कुमार को खुद मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी छोड़ देनी चाहिए।

उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि नीतीश कुमार ने पंद्रह साल तक बिहार की सत्ता संभाली, अब किसी और को भी काम करने का मौका मिलना चाहिए। पंद्रह साल बहुत होते हैं। नीतीश कुमार को अब बड़ी राजनीति करनी चाहिए और खुद ही सीएम का पद छोड़ देना चाहिए। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नीतीश कुमार ने तीन कार्यकाल में जितना विकास करना था कर लिया। अब उन्हें इससे आगे की राजनीति करनी चाहिए।

कुशवाहा के इस बयान से बिहार का राजनितिक पड़ा काफी गर्म हो चुका है| अपने सबसे बड़े नेता पर कुशवाहा के कटाक्ष पर जेदयू भड़क चुकी है| उपेंद्र कुशवाहा के बयान पर जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कड़ी आपत्ति जाहिर की और कहा कि नीतीश कुमार किसी नेता या एक विधायक वाली पार्टी के नेता की वजह से सीएम नहीं बने हैं बल्कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को सीएम बनाया है| केसी ने कहा कि कुशवाहा की पार्टी के कई नेता कांग्रेस और आरजेडी में टिकट के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं ऐसे में एनडीए के अन्य दल कुशवाहा के बयान पर अपना स्टैंड साफ करें|

गौरतलब है कि नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा बिहार में कभी एक साथ राजनीति करते थे लेकिन पिछले दो दशक से उनकी राहें अलग-अलग हो चुकी हैं। उपेन्द्र कुशवाहा को घोर नीतीश विरोधी समझा जाता है| जब से एनडीए में नीतीश की घर वापसी हुई है, तभी से रालोसपा गठबंधन में असहज महसूस कर रही है| बता दें कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी पिछले दिनों नीतीश कुमार के नेतृत्व में आगामी चुनाव लड़ने से इनकार कर चुकी है। उनकी पार्टी के नेता नागमणि ने कहा था कि उनके नेता नीतीश कुमार नहीं हो सकते हैं। रालोसपा उपेन्द्र कुशवाहा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार के रूप में लगातार प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रही है|

बिहार के राजनीति में अभी और रोमांच आने को बाकि है| अभी आप देखते रहिये..

विश्लेषण: उपचुनाव में तेजस्वी ने नीतीश को फिर दी पटखनी, जानिए जोकिहाट में क्यों जीती आरजेडी?

बिहार में जोकिहाट विधानसभा उपचुनाव आरजेडी प्रत्याशी शहनवाज अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी और जेडीयू उम्मीदवार मोहम्मद मुर्शीद आलम को 41225 वोटों से हराया। आरजेडी उम्मीदवार शहनवाज को 81240 वोट जबकि जेडीयू उम्मीदवार मुर्शिद आलम को 40015 वोट मिले। जीत के बाद आरजेडी विधायक दल के नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि यह अवसरवाद पर लालूवाद की जीत है, लालू विचार नहीं बल्कि विज्ञान है।

जोकीहाट सीट पर साल 2005 से ही जेडीयू का कब्जा रहा था। ताजा चुनाव परिणाम से साफ है कि मुस्लिम वोटरों का जेडीयू से मोह भंग हो रहा है। भाजपा के साथ जाने की वजह से जदयू की लगातार तीसरी बार हार हुई है|

साल 2005 में बिहार के अंदर लालू विरोधी लहर आई जिसकी वजह से नीतीश को सत्ता मिली थी। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम वोटरों में सेंध लगाना शुरू किया। जिसमें वह सफल भी रहे। चुनावों में भाजपा के साथ रहने के बावजूद मुस्लिम वोटरों ने नीतीश को वोट दिया था। मगर साल 2014 में भाजपा से अलग होने की वजह से उन्हें अपने दम पर चुनाव लड़ना पड़ा और करारी हार मिली। बता दें कि इस सीट पर पहले तस्लीमुद्दीन परिवार का कब्जा था। उनके निधन के बाद उनके बेटे सरफराज आलम यहां से विधायक थे। इसी साल मार्च में उन्होंने जदयू से इस्तीफा देकर राजद के टिकट पर अररिया की लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। उनके इस्तीफे की वजह से ही यह सीट खाली हुई थी।

 

आइए समझते हैं जोकिहाट पर क्यों जीती आरजेडी

मुस्लिम बहुल इलाका है जोकिहाट: इस सीट पर दो लाख 70 हजार वोटर हैं, जिसमें से करीब 70 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है| यहां यादवों की भी अच्छी खासी आबादी है. ऐसे में यहां इस बार आरजेडी का M+Y (मुस्लिम+यादव) समीकरण फीट बैठता हैl हालांकि जेडीयू ने भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट दिया था, लेकिन आरजेडी का समीकरण भारी पड़ रहा था।1969 में बने इस विधानसभा सीट पर हमेशा से मुस्लिम प्रत्याशी जीतते आ रहे हैं, हालांकि पार्टियां बदलती रही हैं।पिछले चार बार से जेडीयू के प्रत्याशी यहां से जीतते रहे हैं।

मोहम्मद तसलीमुद्दीन के परिवार का इस सीट पर रहा है दबदबा: जोकिहाट सीट पर मुस्लिमों के बड़े नेता मोहम्मद तसलीमुद्दीन का दबदबा रहा है। अबतक हुए 14 बार हुए विधानसभा चुनावों में नौ बार तस्लीमुद्दीन के परिवार से ही जीतते रहे हैं। इस बार भी आरजेडी के ने तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज आलम आलम को टिकट दिया है। इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए जेडीयू ने भी तसलीमुद्दीन के परिवार को ही टिकट दिया था। तस्लीमुद्दीन के बड़े बेटे सरफराज आलम 2010 और 2015 में जदयू के टिकट पर यहां से विधायक बने थे।

जेडीयू के प्रत्याशी हैं दागदार: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपराधियों और अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस की बात कहते हैं, लेकिन जोकिहाट पर उनकी पार्टी के प्रत्याशी मुर्शीद आलम के खिलाफ कई मुकदमें दर्ज हैं। इसमें से कई गंभीर मुकदमें भी हैं। वहीं आरजेडी प्रत्याशी शाहनवाज आलम साफ सुथरा चेहरा हैं। तेजस्वी यादव ने प्रचार के दौरान भी इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया था।

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चंद्रबाबू नायडू के एनडीए से अलग होने के बाद, बिहार को विशेष राज्य के दर्जे पर नीतीश ने तोड़ी चुप्पी

आंध्र प्रदेश को वेशेष राज्य का दर्जा नहीं देने के मुद्दे पर राज्य में सत्ताधारी पार्टी टीडीपी द्वारा एनडीए छोड़े जाने के बाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य के मुद्दे पर अपनी छुपी तोड़ी है|

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि वो इस बात को एक दिन के लिए भी नहीं भूले हैं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले, वो लगातार इस पर चर्चा करते रहते हैं| उन्होंने कहा कि हम इस मांग पर तब तक कायम रहेंगे जब तक कि बिहार को इसका विशेष दर्जा मिल नहीं जाता| 

कुछ लोग इस मुद्दे को रोज उछाल रहे हैं| लेकिन, हम इस मुद्दे पर चुप हैं| हम हर रोज इसी मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते हैं|

गौरतलब है कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए नीतीश कुमार को चंद्रबाबू नायडू बनने की सलाह दी थी और कहा था कि वो भी इस मुद्दे पर एनडीए से बाहर आ जाएं|

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने को लेकर नीतीश कुमार ने केंद्र पर बनाया दबाव

वर्ष 2005 में नीतीश कुमार ने विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री को भेजा मेमोरंडम

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने के लिए बिहार विधानसभा से सर्वसम्मति से पास कराया प्रस्ताव

17 मार्च, 2013 को दिल्ली के रामलीला मैदान में की अधिकार रैली

केंद्र सरकार को सौंपे बिहार के 1.25 करोड़ लोगों के हस्ताक्षरयुक्त आवेदन पत्र

 

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बिहार चुनाव: बीजेपी-नीतीश पर भारी पड़े तेजस्वी, RJD की जीत के बने हीरो

बिहार की अररिया लोकसभा सीट और दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे जहां एक तरफ बीजेपी और नीतीश कुमार के लिए एक जोरदार झटका है तो वहीँ दूसरी तरफ राजद नेता तेजस्वी यादव के राजनितिक भविष्य के लिए एक शुभ संकेत लेकर आया है|

लालू यादव के जेल जाने और नीतीश के साथ गठबंधन टूटने के बाद उपचुनाव के मुकाबले को जीतना अहम है| नीतीश कुमार के बीजेपी में जाने और लालू यादव के जेल जाने के बाद, बिहार में यह पहला चुनाव था| साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले अररिया लोकसभा, जहानाबाद विधानसभा और भभुआ विधानसभा पर हुए उपचुनाव का परिणाम पहले से ही कई मामलों में खास माना जा रहा था| इस चुनाव में नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा तो दाव पर थी साथ ही लालू यादव के जेल जाने के बाद तेजस्वी यादव के नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा थी|

लालू यादव के गैरमौजूदगी में राजद ने ये चुनाव पूरी तरह तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा था| अब चुनाव परिणाम आने के बाद तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालो का मुह बंद हो गया है|

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इस तरह बढ़ा तेजस्वी का कद
लालू यादव के जेल जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई थी कि अब आरजेडी को कौन संभालेगा| लेकिन तेजस्वी यादव ने सुगबुगाहट पर पूर्ण विराम लगाया और ना सिर्फ विरोधियों पर हावी हुए बल्कि पार्टी की कमान को बखूबी संभाला|

राजनीति में धमक बढ़ाने में कामयाब हुए तेजस्वी
बिहार उपचुनावों के परिणाम बताते हैं कि लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव पिता की गैर मौजूदगी में राजनीति में अपनी धमक बढ़ाने का सफल प्रयास कर रहे हैं| लालू यादव के जेल जाने के बाद तेजस्वी जिस तरह के विरोधियों को जवाब देने और उन पर हावी होने की कोशिश कर रहे हैं उससे यह बात तो स्पष्ट है कि वह अब लीडिंग फ्रॉम फ्रंट की भूमिका में काम करना चाहते हैं और कर भी रहे हैं| जीत का सेहरा तेजस्वी यादव के सिर इसलिए भी सजा है, क्योंकि वह प्रदेश की राजनीति में एकमात्र ऐसा युवा चेहरा है जिस पर जनता पिछले विधानसभा चुनावों से लेकर अब तक विश्वास कर रही है|

नीतीश के लिए चुनौती का समय
उपचुनावों के नतीजे इस बात को भी स्पष्ट करते हैं कि बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव नीतीश के विकल्प के रूप में उभर कर आ रहे हैं| तेजस्वी के राजनीतिक गतिविधियों की वजह से बिहार की जनता के बीच लाजिमी तौर पर तेजस्वी की पूछ बढ़ेगी| इसके साथ ही बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों में नीतीश को तेजस्वी यादव से कड़ी टक्कर मिलेगी|

 

आंध्र प्रदेश के बाद बिहार से फिर उठी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग, नीतीश पर बढ़ा दवाब

आंध्र प्रदेश को विशेष राज्‍य का दर्जा नहीं मिलने के बाद मुख्‍यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और केंद्र सरकार के बीच शुरू हुए विवाद का असर बिहार की राजनीति पर भी दिखने लगा है। टीडीपी के बाद एनडीए का एक और सहयोगी जदयू भी इस मुद्दे पर टीडीपी के साथ अपना सूर मिला रहा है| बिहार में महागठबंधन तोड़कर बीजेपी की मदद से सरकार बनाने वाली जनता दल यूनाइटेड ने भी विशेष राज्य का दर्जा न मिलने पर असंतोष जाहिर किया है|

जेडीयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि बिहार को भी स्पेशल कैटिगरी स्टेटस (विशेष राज्य का दर्जा) नहीं दिया गया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी काफी समय से विशेष राज्य के दर्जे की मांग दोहराते रहे हैं। नीतीश 2005 के विधानसभा चुनाव से ही विशेष राज्य की मांग उठाते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार को जब तक विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, उसका विकास नहीं हो पाएगा| केसी त्यागी ने कहा कि हम आंध्र प्रदेश की मांग का समर्थन करते हैं| उन्होंने कहा आज आंध्र प्रदेश की वही स्थिति है जो बिहार की थी| विभाजन के की तर्ज पर अधिकतर संसाधन आंध्र से अलग होने के बाद तेलंगाना के पास पहुंच गए| उन्होंने कहा कि बिहार भी विशेष राज्य के दर्जे का हकदार है| उन्होंने कहा कि बिहार का बंटवारा होने के बाद सारे संसाधन झारखंड के पास चले गए| केसी त्यागी ने कहा कि नीतीश कुमार हमेशा पीएम मोदी इसके लिए पीएम मोदी से बात करते रहते हैं| उन्होंने हमेशा पीएम से राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है|

इधर विपक्ष भी मौका का फायदा उठाकर नीतीश कुमार पर दवाब बढ़ा रही है| नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव ने नीतीश कुमार पर तंज कसा है।

 तेजस्‍वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कहा कि उन्‍हें आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू से सीखना चाहिए। शासन इक़बाल और स्वाभिमान से चलता है। आखिर ‪कितने दिन डरकर बिहार का नुक़सान करते रहेंगे।‬

तेजस्‍वी ने कहा कि नीतीश कुमार ने व्यक्तिगत फ़ायदों के लिए बिहार के हितों की तिलांजलि दे दी है। अपने लिए ‘विशेष आवास’ और ‘विशेष सुरक्षा’ के समझौते के तहत बिहार की विशेष दर्जे की मांग को कूड़ेदान में डलवा दिया।
तेजस्‍वी ने पूछा कि नीतीश कुमार को यह हक़ किसने दिया है की अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए वो बिहार के साथ हक़मारी करें। स्वयंघोषित नैतिक पुरुष जवाब दें।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मैंने 5 फ़रवरी को पत्र लिखकर अपने नेता प्रधानमंत्री मोदी जी से बिहार के लिए विशेष राज्य की माँग करने की विनम्र विनती के साथ-साथ तन-मन-जन से पूर्ण समर्थन देने का वायदा भी किया था। लेकिन मुख्यमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष को उस पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझा। वे बतायें कि उन्होंने किस डर से अपनी नैतिकता, अंतरात्मा, राजनीति और बिहार के अधिकारों को भाजपा के यहाँ गिरवी रखा है?
तेजस्‍वी ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री मोदी जी और केंद्र सरकार बिहार की विशेष दर्जे की जायज़ माँग को अस्वीकार करते है तो नीतीश जी को अंतरात्मा की आवाज़ पर तुरंत इस्तीफ़ा देकर एनडीए से गठबंधन तोड़ना चाहिए। कुछ तो हिम्मत दिखाइए चाचा जी। हम इस मांग पर साथ है।

इधर, विधानसभा में गुरुवार को राजद सदस्य शक्ति यादव और समीर कुमार महासेठ ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर कार्यस्थगन प्रस्ताव पेश किया। विधानसभा अध्यक्ष ने इसे नियमानुकूल नहीं बताते हुए इसे अमान्य कर दिया।

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बिहार छोड़ राज्यसभा जाने की तैयारी में है नीतीश, मुख्यमंत्री से देंगे इस्तीफा

जेदयू द्वरा अली अनवर को  निष्कासित किये जाने के बाद खाली हुए राज्यसभा सीट के साथ बिहार कोटे के अन्य पांच राज्यसभा सीटें 2 अप्रैल को खाली हो रहें हैं।

चुनाव आयोग ने इन 6 सीटों पर चुनाव के लिए तो अभी तक कोई तारिख का ऐलान नहीं किया है मगर इसको लेकर सियासी गलियारों में गहमा-गहमी और राजनीतिक पार्टियों के अंदर मंथन शुरू हो चुके हैं।

पिछले वर्ष जुलाई में महागठबंधन टूटने के बाद और नीतीश कुमार का फिर से बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद,  बिहार की राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुकी है।

अली अनवर के अलावा 2 अप्रैल को बीजेपी से केंद्रीय मंत्री धरमेंद्र प्रधान और रविशंकर प्रसाद रिटायर हो रहे हैं, और जेदयू से किंग महेंद्र, वशिष्ठ नारायण सिंह और अनिल कुमार सहनी का भी कार्यकाल खत्म हो रहा है।

आंकड़ों का खेल

243 की संख्या वाले बिहार विधानसभा में राजद के 79, जदयू के 71, बीजेपी के 52 और कांग्रेस के 27 विधायक हैं। इस आधार पर राजद और जदयू आराम से 2-2 सीट जीत सकती है, बीजेपी 1 तो राजद के मदद से कांग्रेस भी 1 सीत जीतने में संफल हो सकती है।

नीतीश कुमार जा सकते है राज्यसभा 

बिहार के मुख्यमंत्री पिछले दो दिन दिल्ली में थे। पार्टी सूत्रों से मिली खबर के अनुसार नीतीश कुमार अपने पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसदों और नेताओं से बिहार भवन में मुलाकात करके इन मुद्दों पर बात की।

‘द हिन्दू’ में छपे खबर के अनुसार राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि महेंद्र प्रसाद और नीतीश कुमार पार्टी के दो राज्यसभा उम्मीदवार होंगे। क्योंकि नीतीश कुमार केंद्रीय राजनीति में अब एक नये रोल के साथ दिल्ली आ सकते हैं। गौरतलब है कि नीतीश कुमार को हाल ही में  जेड प्लस सुरक्षा मुहाया कराया गया है और साथ ही दिल्ली के लुटीयनस जोन उनके नाम पर एक बड़ा सा बंगला भी आवंटित किया गया है।

हालांकि जेदयू ने इस खबर को अफवाह और विपक्ष की साजिश बताया है। मगर, धुंआ अगर उठी है तो आग भी कहीं जरूर लगी होगी। वैसे ज्ञात हो कि नीतीश कुमार हमेशा सबको चौकाने वाले फैसले लेते रहते हैं।

चार साल बाद नीतीश की हुई घर वापसी, जदयू एनडीए में हुआ सामिल

जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आज साढ़े दस बजे पटना में शुरु हो चुकी है। बैठक में जदयू के सभी आमंत्रित सदस्य शामिल हैं। बैठक मुख्यमंत्री आवास, 1 अणे मार्ग पर शुरू हुई है। बिहार के राजनीति में नाटकीय घटनाक्रम के साथ चार साल बाद फिर से जदयू एनडीए में सामिल हो गया | बैठक में जदयू नेता केसी त्यागी ने एनडीए में शामिल होने का प्रस्ताव रखा जो सर्वसम्मति से पारित हो गया। हालांकि पार्टी की तरफ से इसकी औपचाकिर घोषणा किया जाना बाकी है|

इसके साथ ही अब नीतीश कुमार के नेतृत्‍व में जदयू के केंद्र में बीजेपी के नेतृत्‍व वाले राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्‍सा बनने का रास्‍ता साफ हो गया है. दरअसल हाल में बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने नीतीश कुमार को एनडीए में शामिल होने का औपचारिक आमंत्रण दिया था. यह आमंत्रण नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ गठबंधन करने के बाद दिया गया था|

अब एनडीए में शामिल होने के साथ ही इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी के अगले कैबिनेट विस्‍तार में जेडीयू को भी जगह मिल सकती है और इसके कोटे से दो मंत्रियों को बनाया जा सकता है|

शरद और नीतीश गुट के लोग आपस में भिड़े 

इससे पहले पार्टी में जारी आंतरिक कलह अब हिंसक रूप लेने लगा है| शनिवार को इसकी बानगी पटना की सड़कों पर देखने को मिली जब सीएम हाउस के ठीक बाहर शरद और नीतीश गुट के लोग आपस में भिड़ गये| शनिवार को जेडीयू में बैठकों का दौर है| इसके लिये दोनों खेमों ने तैयारियां भी कर रखी थीं|

हालांकि राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बगावती तेवर अपनाने वाले शरद यादव ने हिस्‍सा नहीं लिया| नीतीश के आवास पर आयोजित राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान शरद यादव और लालू प्रसाद यादव के समर्थकों को बाहर विरोध में नारेबाजी करते देखा गया| नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ हाथ मिलाने और महागठबंधन को तोड़ने के फैसले के खिलाफ शरद यादव ने बगावत का बिगुल बजा दिया है| भाजपा से हाथ मिलाने के नीतीश के फैसले का विरोध कर रहे शरद यादव के करीबी नेता भी एस के मेमोरियल हॉल में ‘जन अदालत’ नाम का एक कार्यक्रम करेंगे| दोनों बैठकों से साफ हो जाता है कि जदयू में दरार पड़ चुकी है और पार्टी टूट की ओर बढ़ रही है|