हमारे मुख्यमंत्री “शराबबंदी” के नशे में हैं..!

Deep Freeze Standard Crack

नीतीश कुमार ने बिहार के महिलाओं के मांग पर राज्य में शराबबंदी लागू किया ताकि उनके पति और संतान नशामुक्त हो। शुरुवात में यह कानून कितना दमदार लग रहा था। नीतीश कुमार के राजनीतिक इक्षाशक्ति की मिशाल दी जाने लगी। बिहार का उदाहरण दक्षिण भारत के राज्यों में दी जाने लगी मगर समय के साथ सबकुछ बदल गया।
शराबबंदी से बिहार के खजाने का नुकसान तो हुआ ही। शराब माफियाओं ने दूसरे तरफ नकली और अवैध शराब का एक समांतर अर्थव्यवस्था खड़ा कर दिया। जो पैसा बिहार के खजाने में जा रहा था वो माफिया, भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं के जेब में जाने लगा है।
जिन महिलाओं ने इस कानून के बाद अपने पति और संतानों के नशामुक्ति का सपना देखा था, अब वे नकली और जहरीली शराब से इस दुनिया से मुक्त होने लगे हैं। शराब माफियाओं की किस्मत चमक गई, पुलिस गरीब लोगों का मुंह सूंघकर राज्य के सभी जेल भर दिए।
नशा क्या होती है? जब मस्तिष्क क्षुब्ध और उत्तेजित हो उठता है, तथा स्मृति (याद) या धारणा कम हो जाती है । इसी दशा को नशा कहते हैं । .. और नशा सिर्फ शराब से हो यह जरूरी नहीं, नशा किसी भी चीज की हो सकती है। जैसे हमारे मुख्यमंत्री जी को शराबबंदी कानून का नशा हो गया। जब भी इसपर कोई सवाल उठता है तो मानों वो अपना आपा खो देते हैं और उत्तेजना में कुछ भी अल – बल बोलने लगते हैं।
जैसे, जहरीली शराब से हुए मौत के सवाल पर विधानसभा में तू – तराक करने लगे और बोल दिए, “जो शराब पीएगा वो मरेगा.”
कोई भी योजना और कानून दोषहीन नहीं होता। आलोचना सरकार में बैठे लोगों को अपने योजना, कानून या इन्हें लागू करने में हो रहे चूक को जानने में मदद करती है। बिहार सरकार को शराबबंदी कानून की हो रही आलोचना को सुनना चाहिए और इसकी कमियां दूर करनी चाहिए। बजाय इसके कि इसके नाकामियों को छुपाने के लिए कुछ भी बेतुका तर्क दिया जाए या गुस्सा में चिल्लाकर विपक्ष की आवाज को दबा दिया जाए।
© Avinash Kumar (एडिटर, अपना बिहार)

Caste Based Census: जातीय जनगणना का क्यों हो रहा है बेतुका विरोध?

मंडल कमिशन के रिपोर्ट को लागू करने की जब बहस चल रही थी तब भी समाज के अग्रिम पंक्ति में खड़े समाज के लोग, जिन्हें तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का जरूरत से ज्यादा लाभ मिल रहा था, वे मंडल कमिशन के मुखर विरोधी थे – उनका तर्क था कि सामाजिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। मंडल कमिशन की बात अगर मान ली गई तो समाज का ‘अनुशासन’ बिगड़ जायेगा।

बीपी मंडल के अध्यक्षता वाली कमिशन ने 1980 में ही राष्ट्रपति को अपना रिपोर्ट दे दिया था मगर तत्कालीन सरकारें उस रिपोर्ट के उपर बैठ गई, जैसे वर्तमान सरकार 2011 के जातीय जनगणना के आंकड़ों पर बैठी है।

जिनको यथा – स्थिति बनाए रखने से फायदा मिल रहा है वे बदलाव का तो विरोध करेंगे ही, इसके साथ बदलाव के जरूरत को भी नकारेंगे। दलितों पर हजारों सालों तक होने वाले अत्याचारों को भी लोग सही बताते थे। दलितों के मंदिरों में प्रवेश पर रोक को भी लोगों ने उचित ठहराया है। दलितों ने अपने लड़ाई खुद लड़ी और उनके समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों ने जैसे बाबा साहब अम्बेडकर और काशीराम जैसे नेताओं ने दलितों को उसका हक दिलाने के लिए आवाज बुलंद किया। ये लोग भले अभी सभी पार्टियों और वर्गों में (मजबूरी बस ही सही) पूजनीय है, मगर उनके जीवनकाल में संपन्न वर्गों ने हमेशा उन्हें विलेन के रूप में देखा है।

ठीक उसी तरह जेपी आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्गों का बढ़ा प्रतिनिधित्व और राष्ट्रिय राजनीति में लालू – मुलायम और शरद यादव जैसे ओबीसी नेताओं का प्रभाव ही था जिसने नेशनल फ्रंट के सरकार को बीपी कमिशन की रिपोर्ट को स्वीकार करने को मजबूर किया और ओबीसी को पहली बार सरकारी नौकरी में 27% आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया।

पुरानी बातों का चर्चा मैं आपको यह बताने के लिए किया कि शोषण करने वाला कभी भी शोषित के हक की बात नहीं करता है। हमेशा ही शोषितों को अपने हक के लिए अपनी आवाज उठानी पड़ी है।

इस बात को आप समझ गए तो आप जातीय जनगणना के पीछे मिडिया और कुछ खास वर्गों के विरोध के पीछे उनके मंशा को भी आप समझ सकते हैं। जो लोग जातीय जनगणना से मुंह मोड़ना चाहते हैं, वास्तव में वे सचाई से भागना चाहते हैं। मंडल कमिशन और दलितों के अधिकार देने के समय इसी मानसिकता के लोग सामाजिक अनुशासन बनाए रखने की बात करते थे, अब जातीय जनगणना को देश की एकता – अखंडता के खिलाफ बताने की प्रोपेगेंडा रची जा रही है। जात के आधार पर पहले से ही विभाजित समाज के बटने का डर पैदा किया जा रहा है।

जैसे सड़क के गड्ढों को छुपाने से सड़क अच्छी नहीं होगी, उसी तरह जाति आधारित असमानता को छुपा के समानता नहीं लाया जा सकता।

गड्ढों को मिट्टी, गिट्टी, बालू, सीमेंट या अलकतरा से भड़ना होगा – गड्ढा कितना बड़ा है और उसको भरने के लिए कितना समय और संसाधन लगेगा, उसके लिए जरूरी है कि सड़क पर हुए गड्ढों को मार्क किया जाय और उसकी संख्या का पता लगाया जाए।

ठीक उसी तरह – जातिवाद जाति आधारित भेदभाव या समस्या से मुंह मोड़ के खत्म नहीं होगा, उसके मूल कारण को खत्म करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि पता लगाया जाए कि आजादी के 75 साल बाद हमने कितनी समानता प्राप्त किया, कितना अभी बाकी है, किसको अभी और सहायता की जरूरत है और कौन अब मुख्यधारा में आ चुका है। मगर इसके लिए जरूरी है कि जातियों का सही आंकड़ा हो।

वैसे भी जातीय जनगणना के आंकड़ों का प्रयोग नीति निर्माण में सरकार कर रही है। मगर वह जानगणना का आंकड़ा 1931 का है। कोई नया मांग नहीं किया जा रहा है, मांग बस इतना है कि अंग्रेजों के जमाने का आंकड़ा प्रयोग करने के जगह वर्तमान समय का आंकड़ा का प्रयोग किया जाए।

अविनाश कुमार, संपादक (अपना बिहार)

महिला का दुपट्टा खींचा जा रहा है, लोग मर रहे हैं और ‘धृतराष्ट्र’ अपने विरोधियों पर जुल्म ढा रहें

भागलपुर में ईलाज के लिए गई महिला ने जब हॉस्पिटल में मदद मांगी तो उसका दुपट्टा खींचा जा रहा था, पति के मौत के बाद बेचारी पीड़िता मिडिया के कैमरों के सामने चीख – चीख कर अपनी आपबीती सुना रही थी। उस विडियो को सबने देखा मगर वह ‘धृतराष्ट्र शासक’ नीतीश कुमार को नहीं दिखा।

हॉस्पिटल है तो डॉक्टर नहीं, एंबुलेंस है तो ड्राईवर नहीं और वेंटीलेटर है तो उसे चलाने वाला नहीं है। लोगों में हाहाकार है, हर रोज मेरे जैसे छोटे प्लेटफॉर्म को चलाने वाले के पास भी दर्जनों मदद की गुहार आती है। कोई ऑक्सीजन के बिना मर रहा है तो किसी को समय पर दबाई और बेड नहीं मिल रहा है। एक आम इंसान होने के बाद भी जब उनको कोई मदद नहीं कर पाते हैं तो दिल बैठ जाता है और बेचैनी से रात को नींद नहीं आती है।

मगर जिस नीतीश कुमार को जनता ने अपना रहनुमा चुना था, जिसकी ज़िम्मेदारी बनती है लोगों के मदद करने की, वह आंखों पर पट्टी बांधकर धृतराष्ट्र की तरह अंधे हो चूके हैं –

जिनके सभा में औरतों की आबरू लूटने की कोशिश हो रही है। लोग तड़प – तड़प के मर रहे हैं और गरीबों पर जुल्म हो रहे हैं। मगर सभा में वे मौन तमाशा देख रहे हैं।

क्या नीतीश कुमार की नैतिकता के साथ मानवता की भी मौत हो चुकी है?

भागलपुर में उस महिला के साथ जिसने छेड़खानी की, जिस हॉस्पिटल के लापरवाही के कारण उसकी पति की जान चली गई, उसपर करवाई करने के लिए बिहार पुलिस ने कोई तत्परता नहीं दिखाई। मगर लोगों के मदद में लगे और सरकार के नाकमियों को उजागर कर रहे पप्पू यादव को लॉकडाउन तोड़ने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।

उस मामले में बेल मिलने वाली थी। उसके बाद पुलिस ने 32 साल पुराने मामले में फिर उनको गिरफ्तार कर लिया गया। और अब खबर आ रही है कि पप्पू यादव द्वारा गरीबों को खाना खिलाने के लिए चलाए जा रहे पप्पू रसोई को भी सरकार ने बंद करवा दिया है। सरकार ने कहा है कि रसोई चलाने के लिए पुलिस की इजाज़त लेनी होगी।

वाह! जरा क्रोनोलॉजी को समझिए और नीतीश सरकार के नियत को जानिए। नीतीश कुमार का रवैया एक तानाशाह से कम नहीं है।

पहले भी अपनी आलोचना पर भड़कते रहे हैं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को लाठी के बल पर कुचलते रहे हैं और सोशल मिडिया पर सरकार के निंदा पर जेल भेजने की धमकी देते रहे हैं।

अब लगता है उनके राज में समाज सेवा करना भी जुर्म है। लोगों को खाना खिलाने के लिए भी साहब से इज़ाजत लेना होगा। अस्पताल में डॉक्टर नहीं है, मगर हो सकता है टेलीमेडिसीन की सेवा देने के लिए अपना बिहार पर पाबंदी लगाई जा सकती है। एक दिन नीतीश बाबू के इज़ाजत के बिना कही सांस लेना भी जुर्म न हो जाए!

– अविनाश कुमार (एडीटर, अपना बिहार)

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ग्रेजुएशन पास करने वाले लड़कियों के खाते में 50-50 हज़ार रुपए भेजेगी नीतीश सरकार

विधानसभा चुनाव में से पहले सभी पार्टियों ने चुनावी वादे किए थे मगर जनता ने फिर से नीतीश कुमार पर भरोसा जताया और एक बार फिर उनके नेतृत्व में एनडीए की सरकार राज्य में बनी।

अब सरकार बन गई है तो नीतीश सरकार अपने चुनावी वादे को हकीकत में बदलने के तरफ कदम बढ़ाने लगी है। नीतीश कुमार ने चुनावी सभाओं में ये ऐलान किया था कि उनको फिर से मौका मिला तो ग्रेजुएशन पास करने वाले छात्रों को 50 हजार की राशि दी जायेगी।

नीतीश के इस ऐलान के बाद महिलाओं ने जमकर नीतीश कुमार वोट देकर उनकी सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। अब नीतीश कुमार उसका ईनाम देने जा रहे हैं।

बिहार सरकार के शिक्षा विभाग (Bihar Education Department) ने मुख्यमंत्री स्नातक बालिका प्रोत्साहन योजना के तहत लाभार्थीयों के बैंक खाते में प्रोत्साहन राशि भेजने का प्रस्ताव तैयार किया है। प्रस्ताव को वित्त विभाग (Bihar Finance Department) के पास स्वीकृति के लिए भेजा जा रहा है। उसके बाद कैबिनेट से मंजूरी ली जाएगी। महत्‍वपूर्ण यह है कि इस बार पिछली बार की अपेक्षा सौ करोड़ रुपये की राशि अधिक बांटी जाएगी।

राज्य सरकार से मान्यता एवं संबद्धता प्राप्त महाविद्यालयों (College Affiliated to Bihar Government) से स्नातक पास छात्राओं को प्रोत्साहन राशि दी जाती है।

वर्तमान व्यवस्था में स्नातक उत्तीर्ण छात्राओं को 25-25 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है।  मगर अब यह राशि 50 हजार हो जाएगी।

वर्ष 2019-20 में इस योजना के लिए शिक्षा विभाग ने दो सौ करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। इस वित्तीय वर्ष (2020-21) में तीन सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है।  इस तरह इस बार सौ करोड़ रुपये अधिक राशि बांटी जाएगी।

उच्च शिक्षा निदेशालय (Directorate of Higher Education)  के एक अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री स्नातक बालिका प्रोत्साहन योजना में राशि की बढ़ोतरी होने पर करीब 1.50 लाख स्नातक उत्तीर्ण लड़कियों को लाभ मिलेगा।

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असिस्टेंट प्रोफेसर और जूनियर वैज्ञानिकों के भर्ती घोटाला के आरोपी को बनाया गया शिक्षा मंत्री

नीतीश कुमार ने जनता के बीच अपनी छवि एक भ्रष्टाचार विरोधी नेता की बनायीं है. आपको याद होगा कि 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन का सरकार गिरा दिया था क्योंकि तेजस्वी यादव का एक भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में नाम आ गया था. मगर नीतीश कुमार के नए कैबिनेट में सामिल मंत्रियों के नाम सामने आने के बाद सवाल उठने लगे है.

नीतीश ने शिक्षा मंत्री का जिम्मा मेवालाल चौधरी को दिया है. जिनपर कृषि विश्वविद्यालय,सबौर, भागलपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर कम जूनियर साइंटिस्ट के पद की बहाली में घोटाले और धांधली करने का आरोप लगा था.

साल 2012 में कृषि विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर और जूनियर वैज्ञानिकों के 281 पदों पर भर्ती निकाली गई थी. लगभग 2500 लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया और 166 लोगों की नियुक्ति भी हो गई पर इसमें बड़े पैमाने पर धांधली हुई. मेरिट लिस्ट देखने पर पता चलता है कि भर्ती साफ सुथरी तरह से नहीं की गई.

मेरिट लिस्ट में कुल 100 नंबर पर चुनाव होना था. जिनमें से 80 नंबर शैक्षणिक योग्यता, 10 नंबर इंटरव्यू और 10 नंबर प्रजेंटेशन के लिए दिए जाने थे. पर चुने गए लोगों के नंबरों को देखें तो पता चलता की है कैसे शैक्षणिक योग्यता में पिछड़े होने के बाद भी इंटरव्यू और प्रजेंटेशन में मनमाने नंबर देकर उनकी नियुक्ति की गई.

इस धांधली की वजह से योग्य उम्मीदवारों को नौकरी नहीं मिल पाई ऐसा उनका आरोप है. पीड़ितों का कहना है कि इसमें पैसे का लेनदेन साफ दिखाई देता है. कहा ये भी जा रहा है कि ये लिस्ट इंटरव्यू के बाद तैयार की गई और इस मामले में बिहार कृषि विश्वविद्यालय के पहले कुलपति मेवालाल चौधरी की इसमें बड़ी भूमिका है. पीड़ितों की मांग है इस मामले का पर्दाफाश कर मेवालाल चौधरी को जेल भेजा जाए.

यह मामला सामने आने के बाद मेवालाल चौधरी पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था. मेवालाल चौधरी को इस मामले में एंटी सिपेटरी बेल मिल गई थी. पर मुकदमें में अबतक चार्जशीट दायर नहीं हुई है.

इस मामले के सामने आने के बाद विपक्ष हहमलेवार है और नीतीश सरकार पर सवाल उठा रहा है|

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Bihar Election 2020: गुप्तेश्वर पाण्डेय के साथ JDU में वही हुआ जो प्रशांत किशोर के साथ हुआ था

जदयू ने अपने सभी 115 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। वीआरएस लेकर जदयू (JDU) ज्वाइन किए बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय (IPS Gupteshwar Pandey) का नाम इस लिस्ट में नहीं है। माना जा रहा था कि गुप्तेश्वर पांडेय को बक्सर से टिकट मिल सकता है मगर बक्सर सीट बीजेपी (BJP) के खाते में चली गई। हालांकि चर्चा यह भी थी कि बीजेपी ही उनको बक्सर से टिकट देगी, कोशिश भी की गई और बक्सर सीट पर उम्मीदवार के घोषणा में देरी भी हुई। मगर आखिरकार बीजेपी ने एक स्थानीय नेता को बक्सर का टिकट दे दिया।

वर्षों से राजनीति का शौक रखने वाले गुप्तेश्वर पांडेय का राजनीति में एक बार और दिल टूट गया। उन्होंने इससे पहले भी 2010 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस ले लिया था मगर इस बार की तरह उस बार भी टिकट मिलते – मिलते रह गया था।

कहावत है न कि चौबे जी गए थे, छब्बेजी बनने , दुबे जी बन कर रह गए – ठीक वही हाल गुप्तेश्वर पांडेय का हुआ है। उन्होंने इसके प्रतिक्रिया में कहा, ‘अपने अनेक शुभचिंतकों के फोन से परेशान हूं। मैं उनकी चिंता और परेशानी भी समझता हूं। मेरे सेवा मुक्त होने के बाद सबको उम्मीद थी कि मैं चुनाव लड़ूंगा लेकिन मैं इस बार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहा। हताश-निराश होने की कोई बात नहीं है। धीरज रखें। मेरा जीवन संघर्ष में ही बीता है। मैं जीवन भर जनता की सेवा में रहूंगा।’

पांडेय जी जो कहे मगर उनके साथ खेल हो गया। इसके कई कारण हो सकते हैं मगर एक प्रमुख कारण यह भी है कि बिहार के बड़े और लोकप्रिय नेताओं को उनका आदेश का पालन करने वाले समर्थक चाहिए जो खुद लोकप्रिय नहीं हो बल्कि “बड़े साहब” के लोकप्रियता के अहसान के साथ राजनीति में रहे।

Former DGP Gupteshwar Pandey out of the poll fray in Bihar (Lead)

गुप्तेश्वर पांडेय एक पूर्व आईपीएस है, राज्य में उनकी लोकप्रियता किसी भी राजनेता से कम नहीं है और उनकी महत्वकांक्षा मात्र एक विधायक या मंत्री बनने तक तो कतई नहीं है। यह बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी जानते हैं और बिहार बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व पर कब्ज़ा किये नेता भी।

जदयू में गुप्तेश्वर पांडेय के साथ वही हुआ, जो प्रशांत किशोर के साथ हुआ है। नीतीश कुमार को भले गुप्तेश्वर पांडेय के लोकप्रियता से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता हो मगर उनके करीबी ललन सिंह और आरसीपी सिंह जैसे नेता जो नीतीश बाद खुद को जदयू का भविष्य मानते हैं, उनको प्रशांत किशोर और गुप्तेश्वर पांडेय चिंतित करते हैं। बीजेपी के साथ सीटों के बतवारें में नीतीश की सहमती जरूर थी मगर बीजेपी के नेताओं से इसके बातचीत में ललन सिंह और आरसीपी सिंह का महत्वपूर्ण रोल था। गुप्तेश्वर पांडेय के साथ खेल यही पर हुआ है।

दूसरी तरफ उम्मीद जताई जा रही थी कि जदयू नहीं तो कहीं पांडेय जी को बीजेपी अपना ले। मगर बिहार में बीजेपी को पहले ही एक लोकप्रिय नेता की कमी महसूस हो रही है। मजबूरी में उसको नीतीश कुमार का नेतृत्व बार – बार स्वीकार करना पड़ रहा है मगर इस से सुशील मोदी जैसे नेताओं को लॉटरी लगता रहा है। बिहार बीजेपी में यह बात आम है कि बिहार बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व नए नेतृत्व के लिए जगह नहीं बनने देता है।

गुप्तेश्वर पांडेय ब्राह्मण जाती से आते हैं, पूर्व आईपीएस हैं और सोशल मिडिया से लेकर जमीन तक उनके समर्थक हैं| यह सब चीज़े बीजेपी में राजनीती करने के लिए मुफ़ीद है। बीजेपी के टिकट से अगर वे जीत जाते तो केंद्रीय नेतृत्व की नजर अनपर पड़ सकती थी।

उनकी राजनीति बीजेपी मतलब था कि गिरिराज सिंह, अश्वनी चौबे और सुशील मोदी जैसे बड़े नेताओं की चमक धूमिल होना। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी ने गुप्तेश्वर पांडेय को टिकट इन्हीं नेताओं के कारण नहीं दिया है। जो पार्टी रातों – रातों रात पैराशूट से कैंडिडेट उतारती हो उसको अचानक स्थानीय कार्यकर्ता के लिए प्रेम आ जाए, यह बात पचती नहीं।

– अविनाश कुमार (लेखक aapnabihar.com के संपादक हैं)

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जीतनराम मांझी की हम पार्टी बिहार के इन सात सीटों पर लड़ेगी चुनाव, उम्मीदवारों की घोषणा

बिहार चुनाव के लिए एनडीए ने अभी सीटों का पूरी तरह से बटवारा नहीं किया है मगर खबर मिल रही है कि अब इसपर आम सहमति बन गई है और आज शाम तक इसकी घोषणा भी हो जाएगी।

सीटों के घोषणा के पहले ही पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों को टिकट देने शुरू कर दिया है। जदयू ने पहले चरण के सीटों के टिकट बांटना शुरू कर दिया है। इसके साथ जीतन राम मांझी ने भी सात सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।

जिन प्रत्याशियों के नाम की घोषणा की गई है उनमें पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी, बाराचट्टी से ज्योति देवी, कुटुम्बा से श्रवण भुईंयां, कस्बा से राजेंद्र यादव, सिकन्दरा से प्रफुल्ल मांझी, टेकारी से अनिल कुमार और मखदुमपुर से देवेंद्र मांझी उम्मीदवार होंगे।

बताया जा रहा है कि चुनाव से ठीक पहले महागठबंधन से एनडीए में सामिल हुए जीतनराम मांझी को यही सात सीट गठबंधन कोटे से मिला है।

गौरतलब है कि मांझी महादलितों में मुसहर समुदाय से आते हैं| गया के आसपास के इलाक़ों में उनका प्रभाव माना जाता है| राजनीति में आने के बाद से वे फ़तेहपुर, बाराचट्टी, बोधगया, मखदूमपुर और इमामगंज से भी चुनाव लड़े और जीत हासिल की. हालांकि, गया सीट से सांसद के रूप में निर्वाचित होने का उनका सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है।

2015 के विधानसभा चुनावों में जीतनराम मांझी की पार्टी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन, पार्टी एक सीट ही जीत पाई थी।

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नीतीश के साथ बीजेपी ने कर दिया खेल, बिहार में एक नहीं दो एनडीए लड़ रहा चुनाव

कोविड -19 के कारण देश की आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ी हुई है मगर बिहार की राजनीतिक तापमान पूरा गर्म है। चुनाव (Bihar Election 2020) का बिगुल फूंक चुका है, पहले चरण के लिए नॉमिनेशन भी शुरू है मगर अभी तक राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।

हालांकि महागठबंधन (Mahagathbandhan) ने अपनी सीटों का बंटवारा कर लिया है। इस बार महागठबंधन में आरजेडी (RJD) 144, कांग्रेस 70 और वामदल 29 सीटों पर चुनाव लडेगी। वहीं दूसरी तरफ एनडीए (NDA) में कोहराम मचा है, जिसके कारण अभी तक गठबंधन की स्थिति साफ नहीं हुई है।

एनडीए में चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और उनकी पार्टी के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इसके साथ चिराग पासवान ने घोषणा किया है कि लोजपा सिर्फ जदयू के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारेगी, केंद्र में बीजेपी के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा और बिहार में भी वह बीजेपी  (BJP)के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेगी। बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के नारे के साथ लोजपा ने नारा दिया है कि मोदी से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं।

तो अब सवाल उठता है कि इस बार बिहार चुनाव में दो एनडीए चुनाव लड़ रही है। एक एनडीए बीजेपी और जदयू का तो दूसरा एनडीए बीजेपी और लोजपा का?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि लोजपा के इस चाल के पीछे बीजेपी है। बीजेपी चुनाव बाद के प्रस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश में है। एक तरफ वह नीतीश के साथ चुनाव में जाकर महागठबंधन को टक्कर देना चाहती है तो दूसरी तरफ लोजपा को नीतीश के खिलाफ खड़ा करके अपने ही सहयोगी और चतुर राजनेता नीतीश कुमार को ‘ औकात ‘ में रखना चाहती है!

लोजपा दोहराना चाहती है अपना 2005 का मॉडल?

बिहार में 2005 में विधानसभा का चुनाव फरवरी-मार्च में हुआ था। उन दिनों केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्‍व में एनडीए की सरकार थी और रामविलास पासवान मंत्रिमंडल के प्रमुख चेहरों में थे। लेकिन चुनाव के ठीक पहले इस्‍तीफा देकर उन्‍होंने लोक जनशक्ति पार्टी बनाई और बिहार में लालू, नीतीश के खिलाफ अकेले ताल ठोंक दी। बताते हैं कि उस वक्‍त नीतीश चाहते थे कि रामविलास उनके साथ रहकर लालू परिवार के खिलाफ छिड़ी मुहिम में शामिल हों लेकिन रामविलास अकेले ही मैदान में उतरे।

2005 में विधानसभा के आम चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी का प्रदर्शन काफी अच्‍छा रहा। 29 सीटों पर पार्टी ने जीत हासिल की। किसी को बहुमत नहीं मिली। अगर लोजपा उस समय जदयू को समर्थन देती तो सरकार बन सकती थी मगर सीएम पद को लेकर नीतीश को समर्थन न देने के चलते आखिरकार बिहार में किसी की सरकार नहीं बन पाई थी। प्रदेश में मध्‍यावधि चुनाव कराने पड़े थे।

कहीं दाव उलटा न पड़ जाए

दो के झगड़े और तीसरे के अरमान के बीच कहीं महागठबंधन के तेजस्वी यादव कही मुख्यमंत्री बन के निकाल जाए! एनडीए में चल रहे इस ताना तनी से सबसे ज्यादा खुश तेजस्वी यादव होंगे। लोजपा के अलग चुनाव लडने से बीजेपी को कोई नुकसान हो न हो मगर गठबंधन के जिन सीटों से जदयू चुनाव लड़ रही है वहां वह एनडीए को नुकसान पहुंचा सकती है। लोजपा भी मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है, ऐसे में संभव है कि रामविलास के समर्थकों के साथ बीजेपी के नीतीश विरोधी वोट भी लोजपा को मिले। इससे एनडीए के वोटों का बटवारा होगा, और महागठबंधन के उम्मीदवारों को जीतने की संभावना बढ़ेगी।

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Ease of Doing Business में बिहार का रैंक 26, पड़ोसी राज्य यूपी और झारखण्ड टॉप 5 में शामिल

आपको लॉकडाउन के समय बिहार के मजदूरों की बदहाली याद होगी| याद होगा कि आक्रोशित युवा कैसे ट्विटर पर रोजगार इन बिहार नाम से ट्विटर ट्रेंड करवा रहे थे| लोगों के जनाक्रोश को भांपते हुए 15 साल से हुई सरकार, अचानक चुनाव से पहले जाग जाती है और राज्य में उद्योग लगवाने की बड़ी-बड़ी बात करने लगते हैं| मगर बिहार सरकार के दावे की पोल खुद केंद्र सरकार ने खोल दी है|

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों देश के सभी राज्यों एवं केंद्र शाषित प्रदेशों की Ease of Doing Business की रैंकिंग जारी किया| इस रैंकिंग में बिहार ने 36 राज्यों में से 26 वीं रैंक हासिल की है।

वही बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश को दूसरी और झारखण्ड को पांचवी रैंक मिले हैं| 

इस रैंकिंग को घरेलू और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने, कारोबारी माहौल में सुधार लाने और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए जारी किया जाता है| इससे पहले साल 2018 में इस तरह की रैंकिंग जारी हुई थी। इस रैंकिंग को श्रम कानून, जमीन की उपलब्धता, निर्माण की अनुमति, पर्यावरण पंजीकरण, सूचना तक पहुंच और सिंगल विंडो सिस्टम जैसे मानकों पर मापा जाता है।

इस साल आंध्र प्रदेश ने इस रैंकिंग में शीर्ष पर अपने आप को बरकरार रखा है। वहीं, दूसरे स्थान पर तेलंगाना की जगह उत्तर प्रदेश ने ले ली है। वहीं तेलंगाना एक स्थान खिसककर तीसरे स्थान पर आ गया है। इस रैंकिंग में इस बार चौथे स्थान पर मध्य प्रदेश, पांचवें पर झारखंड, छठे पर छत्तीसगढ़, सातवें पर हिमाचल प्रदेश और आठवें स्थान पर राजस्थान रहा है। उत्तर प्रदेश ने रैंकिंग में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। 2017-18 की रैंकिंग में यह 12वें स्थान पर था, जो अब दूसरे स्थान पर आ गया है। वहीं, हिमाचल प्रदेश भी 2017-18 की रैंकिंग में 16वें स्थान पर रहा था। वहीं, यहां बिहार 26वें और त्रिपुरा सबसे नीचे 36वें पायदान पर है|

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस किसी राज्य में कारोबार करने के स्थिति के बारे में बताता है| बड़े निवेशक इसी रैंकिंग को देखकर राज्य में निवेश का फैसला लेते हैं| बिहार में उद्योगों की काफी कमी है| और राज्यों के अपेक्षा बिहार को नए निवेश की सबसे ज्यादा जरुरत है ताकि लोगों को अपने घर में रोजगार दिया जा सके, राज्य के वित्तीय स्थिति में सुधार लाया जा सके और भयंकर गरीबी और पलायन को रोका जा सके|

राज्य में कारोबारी माहौल बनाना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए मगर यह रैंकिंग देखकर लगता है की नीतीश सरकार की उद्योग निति भगवान भरोसे है|

 

बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल, उनकी पत्नी और उनकी मां को भी हुआ कोरोना

चुनाव जीतने के चक्कर में नेता खुद को और अपने परिवार को खतरे में डाल ही रहे हैं, इसके साथ अन्य लोगों को भी कोविड- 19 के चपेट में ला रहे रहें। ताज़ा उदाहरण बिहार बीजेपी का मुख्यालय है, जहां अभी तक 70 से भी ज्यादा पॉजिटिव केस निकल चुका है। अभी खबर आ रही है कि – प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल भी कोरोना संक्रमित हो गए हैं। संजय जायसवाल की पत्नी और मां की रिपोर्ट भी कोरोना पॉजिटिव आई है।

इससे पहले पार्टी के पांच अन्य पदाधिकारी भी कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ज्ञात हो इसके साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास से भी कोविड- 19 के कई मामले आए चुके हैं। बिहार के मुख्य सचिव के कार्यालय में पॉजिटिव केस मिलने के बाद वे आज कल अपने घर से काम कर रहे हैं।

इस सब के बावजूद बीजेपी अपने कार्यालय से वर्चुअल रैली जारी रखी हुई है। सरकार के सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख चिराग पासवान के साथ विपक्ष के तमाम नेता राज्य में विधानसभा टालने की बात कह रही है। मगर कोरोना के इतने गंभीर स्थिति होने के बाद भी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं।

इधर, नेता प्रतिपक्ष व राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर कहा है कि बिहार प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व विधायकों समेत कई बड़े नेता संक्रमित हो चुके हैं। उन्होंने बिहार में कोराना संक्रमण फैलाने का भाजपा के ऊपर आरोप लगाया है।ते ने अपने ट्वीट में स्वास्थ्य मंत्री पर भी निशाना साधा है।

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मुख्यमंत्री आवास में भी कोरोना की दस्तक, फिर भी कोरोना टेस्टिंग में बिहार सबसे पीछे

बिहार में कोरोना ने राज्य के मुख्यमंत्री आवास तक अपनी दस्तक दे दी है| मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भतीजी कोरोना पॉजिटिव मिली हैं| उनका इलाज पटना के एम्स में चल रहा है| इस सब के बावजूद राज्य कोरोना टेस्टिंग के मामले में देश के अधिकतर राज्यों से पीछे है| निति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत द्वारा साझा आंकड़ों के अनुसार, बिहार में देश के 19 प्रमुख राज्यों में प्रति मिलियन सबसे कम कोविड -19 परीक्षण दर है।

आंकड़ों के अनुसार, बिहार प्रति मिलियन मात्र 2,197 टेस्ट कर रहा है, जो कि दिल्ली में किए गए प्रति मिलियन टेस्ट से लगभग 15 गुना कम है, जो चार्ट में सबसे ऊपर है। यहां तक ​​कि पड़ोसी राज्य झारखंड भी 4,416 प्रति मिलियन की टेस्टिंग दर के साथ बिहार की तुलना में दोगुना परीक्षण कर रहा है।

कांत ने 19 प्रमुख राज्यों में किए जा रहे परीक्षणों का आंकड़ा साझा किया था। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिल्ली में अब होने वाले प्रति मिलियन टेस्टिंग का अन्य राज्यों द्वारा अनुकरण किया जाना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है। टेस्टिंग पर राज्यों को आंका जाना चाहिए। हम टेस्टिंग, ट्रेसिंग और त्रीटिंग की 3T रणनीति के साथ केवल # कोविद -19 के खिलाफ सफल हो सकते हैं। यह कार्य करने और तेजी से कार्य करने का क्षण है।

बिहार में कोरोना मरीजों का आंकड़ा 12 हजार को पार कर गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मंगलवार सुबह जारी अपडेट के मुताबिक, बिहार में कुल मरीजों की संख्या 12 हजार 125 है, जिसमें 97 लोगों की मौत हो चुकी है| कोरोना से अब तक 8997 लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि एक्टिव केस की संख्या 3031 है|

वहीं मुख्यमंत्री आवास में कोरोना का मामला आने के बाद हरकंप मच गया है| ज्ञात हो कि सीएम नीतीश कुमार की भतीजी भी सीएम आवास में ही रहती हैं| सोमवार को उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी. इसके बाद उन्हें पटना के एम्स में भर्ती कराया गया था| पूरे सीएम आवास को सैनिटाइज किया गया था और परिवार के बाकी सदस्यों को होम क्वारनटीन कर दिया गया था|

हालांकि, सीएम नीतीश कुमार होम क्वारनटीन हैं या नहीं? इसकी सूचना नहीं है| सीएम नीतीश कुमार ने चार जुलाई को ही अपना कोरोना टेस्ट कराया था, जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी|

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बिहार सरकार ने नेस्ले और बाटा समेत 24 कंपनियों को राज्य में निवेश का प्रस्ताव भेजा

बिहार में अवसरों की कमी और उसके तलाश में लोगों के दूसरे राज्य में पलायन करने की समस्या तो दशकों थी मगर कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन में यह समस्या मुख्यधारा में आ गयी| बिहार चुनाव से ठीक पहले राज्य का चुनावी मुद्दा बदल गया| जिस राजनीति में जाति और धर्म का बोलवाला था वहां अब अचानक से रोजगार, कारखाने और मजदूरों की बात होने लगी है| जिस ट्विटर पर लोग “पाकिस्तान जाओ” जैसे मुद्दे ट्रेंड करवाते थे, वहां अब युवा #IndustryinBihar जैसे हैशटैग ट्रेंड करवा रहे हैं और क्षेत्र में लोगों से मिलने जा रहे विधायकों से जनता “रोजगार कहाँ है?” जैसे सवाल पूछी रही है|

सरकार जनता से बनती से बनती हैं और जनता जब जागरूक हो जाये तो सरकार पर दबाव बनेगा ही| सरकार ने यह तो घोषणा किया ही है कि बिहार लौटकर आ रहे सभी श्रमिकों को रोजगार तो दिया ही जायेगा इसके साथ बिहार सरकार ने अब बड़े कंपनियों को बिहार में निवेश करने का निमंत्रण भी देना शुरू कर दिया है|

बिहार सरकार ने नेस्ले, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, जुबलिएंट फूड व पराग मिल्क समेत 24 कंपनियों को राज्य में निवेश करने का प्रस्ताव दिया है| उद्योग मंत्री श्याम रजक ने पत्र पर इन कंपनियों को बिहार में फैक्ट्री लगाने पर होने वाले फायदे को गिनाये हैं|


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उन्होंने पत्र में लिखा है कि राज्य का मक्का के उत्पादन में देश में दूसरा स्थान, हनी में चौथा और सब्जी में 7वां स्थान है यानी फूड प्रोसेसिंग के लिए प्रचुर रॉ मेटेरियल्स उपलब्ध है। यही नहीं, राज्य की विकास दर 11.3 फीसदी है और इस विपरीत परिस्थिति में भी 10.5 ग्रोथ रेट बनाए हुए है।

रजक ने कहा है कि आईटीसी जैसी बड़ी कंपनी राज्य के फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में निवेश की है। वहीं फूड प्रोसेसिंग सेक्टर बिहार औद्योगिक नीति-2016 के प्राथमिक सूची में है और औद्योगिक नीति के तहत उद्यमियों के लिए ब्याज सब्सिडी, 30 दिन के अंदर डीम्ड क्लियरेंस और जीएसटी प्रतिपूर्ति जैसी सुविधाएं दी जा रही है। निवेशकों के मदद के लिए निवेश आयुक्त का पद सृजित कर उनकी पोस्टिंग की गई है।

निवेशकों को मिलेगा बड़ा बाज़ार

बिहार सरकार ने निवेशकों को बिहार में निवेश करने से होने वाले फायदे को बताते हुए यह भी कहा कि यहाँ उनको राष्ट्रीय तथा अंतराष्ट्रिय बाज़ार भी मिलेगा| बिहार में खुद में एक बड़ा बाज़ार है इसके साथ उत्तर-पूर्व के राज्य, बंगाल, यूपी, झारखंड और ओडिसा को आसानी से उत्पाद भेजे जा सकते हैं। यही नहीं, यहाँ से नेपाल और भूटान और बांग्लादेश भी कम्पनी अपना उत्पाद भेज सकते हैं|

इन 24 कंपनियों को भेजा निमंत्रण

सायजी इंडस्ट्रीज, जीआरएम ओवरसीज, जुबिलेंट फूडवर्क्स, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन कंज्यूमर हेल्थकेयर, बाटा इंडिया, रिलेक्सो फुटवेयर, मिर्जा इंटरनेशनल, खादिम इंडिया, हाइडसाइन, प्रिंसपाइप्स, आस्ट्रल पॉली तकनीक, फाइनोलेक्स इंडस्ट्रीज, जैन इरीग्रेशन, केआरबीएल, एलटी फूड, चमनलाल सेतिया एक्सपोर्ट, नेस्ले इंडिया, हैटसंग एग्रोप्रोडक्ट, टेस्टी बाइट इटेबल, प्रताप स्नैक्स, हिंदुस्तान फूड, हेरिटेज फूड, डीएफएम फूड, पराग मिल्क फूड, आदि|


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Industry in Bihar: क्या बिहार में टेक्नोलॉजी एजुकेशन और आइटी इंडस्ट्री नहीं फल फूल सकता है?

भोपाल, बैंगलोर, बंगाल, पंजाब, नोएडा, जयपुर आदि की सारी इंजीनियरिंग कॉलेजे बिहारी छात्रों से भरी हुई है। क्यों भरी हुई है ? कारण बस इतना है की हमारे यहाँ बिहार में शिक्षा व्यवस्था ठेहुने के बल रेंग रहा है। ऐसा नहीं है की हमारे यहाँ इंजीनियरिंग कॉलेजे नहीं है लेकिन जानबूझकर उनका हाल ऐसे किया गया है कि न तो वहाँ ठीक से पढाई होती है और न कैरियर व कैम्पस प्लेसमेंट आदि के लिए कम्पनियाँ आती है।

Women’s Institute of Technology (WIT) एक ऐसा प्लेटफार्म हो सकता था जहाँ से पढ़के मिथिला की बेटियाँ किसी अच्छे आईटी एमनसी में आराम से काम कर सकती थी। लेकिन LNMU के इस कॉलेज में न अच्छे स्तर के लैब्स की सुविधा है और न टेक्नोक्रेटिक इनवायर्मेंट। केवल कम्यूटर साइंस और आईटी ओरिएंटेड इस कॉलेज में अगर कैम्पस प्लेसमेंट्स के लिए बड़ी आईटी एमएनसी’ज नहीं आती तो ये सिर्फ LNMU का नकारापन है।

परिणाम भोगती है इलाके की लड़कियां की चार साल डिग्री करके, लाखों खर्च होने के बाद भी वो सरकारी नौकरियों की तैयारी या शादी की तरफ धकेल दी जाती है।

दरभंगा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (DCE) एक ऐसा प्लेटफार्म हो सकता था जहाँ अगर बढिय्या इंफ्रास्ट्रक्चर, लैब्स, कैम्पस, हॉस्टल, प्रोफेशर्स, प्लेसमेंट्स, इवेंट्स आदि की सही व्यवस्था होती तो ये एडुकेशनल-माइग्रेशन रोकने का माध्यम बन सकता था। लेकिन 2008 में इसे LNMU से हटाकर उस AKU (पटना) का हिस्सा बना दिया गया जिसका 6 एकड़ का कैम्पस भी आजतक बनके तैयार नहीं हुआ है, ये नहीं हुआ की एलएनएमयू की व्यवस्था सुधारी जाए। यदि राज्य सरकार सहूलियतें और सुविधा देने के लिए तैयार होंगी तो क्या बिहार में प्राइवेट टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट्स नहीं खुलेंगे ? सैकड़ों में खुलेंगे।


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नीतीश कुमार जी स्वयं इंजीनियर रहे हैं, राज्य में आईआईटी, एनआईटी के अलावा दर्जनों इंजीनियरिंग कॉलेज हैं पर यदि पिछले 13 सालों में मुख्यमंत्री महोदय से कोई आईटी, सॉफ्टवेयर या नॉलेज पार्क बनवाके आईटी-टेक्नोलॉजी कम्पनियों को नहीं बुलाया जा सका तो इसका साफ मतलब है कि ये सब कभी उनके ध्यान और प्रायरिटी में रहा ही नहीं।

लाखों बिहारी इंजीनियर बैंगलोर-पुणे-हैदराबाद-मुम्बई के आईटीहब्स में हैं, जिनके लाखों का पैकेज-टैक्स उस राज्य का जीडीपी और राजस्व बढ़ाता है। वो वापस आना चाहते हैं पर राजनीतिक नेतागण चाहते ही नहीं की पढ़े-लिखे-जागरूक लोग बिहार में रहें, नहीं तो इनकी राजनीतिक रोटियां कैसे सीखेंगी।

सबसे आसान है टेक्नोलॉजी और आईटी-सॉफ्टवेयर कम्पनियों को बुलाना। कोई कच्चा-माल, मशीन्स, लोकल बाजार नहीं चाहिए, बस इंफ्रास्ट्रक्चर-बिजली-सड़क बनाके लीज पर दे दीजिए और 5 साल के लिए टैक्स छूट के साथ सुरक्षा की गारंटी। वो खुद आएंगे और रोजगार-सम्भावनाओं की असीम मौके लेके आएंगे। दरभंगा, भागलपुर, हाजीपुर, गया आदि कमाल के विकल्प हैं इन आईटी-नॉलेज-सॉफ्टवेयर पार्क्स के लिए पर इन नेताओं ने इस सबके लिए कभी कुछ नहीं किया।

2015 में जब रविशंकर प्रसाद “कम्यूनिकेशन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलोजी” मंत्री बने थे तो उन्होंने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की थी की दरभंगा और भागलपुर में आइटी पार्क खोलने जा रहे हैं। मुजफ्फरपुर और बक्सर में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलोजी (NIELIT) खोलने जा रहे हैं। पांच साल बीत गया, दुबारा सरकार बन गई, दूसरे टर्म का भी एक साल बीत गया, राज्य में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है। लेकिन अबतक कोई अपडेट नहीं है।

– आदित्य मोहन 


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मजदूरों को अपने राज्य में ही रोजगार देने के लिए बिहार ने तीन लाख 44 हजार योजनाएं शुरू की

बिहार में स्पेशल ट्रेन से रोज हजारों मजदूर बिहार श्रमिक स्पेशल ट्रेन से लौट रहे हैं| रोजगार के लिए दूसरे राज्य में गये ये मजदूर लॉकडाउन के बाद बेरोजगार हो गयें हैं और इन्हें मजबूरन अपने गाँव लौटना पड़ रहा है| एक साथ लाखों मजदूर बिहार आ रहे हैं, इनके जीवन यापन के लिए इन्हें रोजगार देना भी एक बड़ी चुनौती है|

बिहार सरकार इन मजदूरों को अपने ही राज्य में रोजगार देने की तैयारी कर रही है| सरकार की माने तो लॉकडाउन के दौरान अब तक 12 विभागों के तीन लाख 44 हजार योजनाएं शुरू की गई हैं, जिसके तहत एक करोड़ 34 लाख कार्य दिवस का सृजन किया गया है।


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राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के सचिव अनुपम कुमार ने बताया, “मनरेगा, जल-जीवन-हरियाली, नल-जल, सड़क निर्माण आदि कार्यों को शुरू कराया गया है।”

मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने बिहार लौट रहे सभी मजदूरों का स्किल सर्वे करने का निर्देश दिया है| जिसके आधार पर सभी विभाग इनके लिए रोजगार श्रृजन करेगी|

प्रवासी मजदूरों का एप से होगा स्किल सर्वे

लाखों की संख्या में बिहार लौट रहे मजदूरों को राज्य में ही रोजगार देने सरकार उनकी स्किल सर्वे कर रही है| इसके लिए सरकार ने एक विशेष एप बनाई है| सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के सचिव अनुपम कुमार ने सभी जिले के डीएम को ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार दिलाने का निर्देश दिया है|

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को कहा है कि रोजगरों का स्किल सर्वे अच्छे तरीके से की जाये ताकि क्व़ारनटिन से जब ये मजदूर निकलेंगें तो उनके क्षमता का बेहतर उपयोग हो पाए|


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स्पेशल ट्रेन से लौट रहे मजदूरों को 500-500 रूपये देगी नीतीश सरकार, मगर ये है शर्त

श्रमिक ट्रेन से बिहार आ रहे लोगों को ट्रेन का किराया देने की जरुरत नहीं है| उसका किराया राज्य और केंद्र सरकार मिलकर रेलवे को दे रही है| इसके साथ बिहार के मुख्यमंत्री ने एक बड़ा ऐलान किया है| स्पेशल ट्रेन से बिहार आने वाले लोगों को बिहार सरकार ट्रेन के किराया के साथ 500 रूपये और देगी|

सोमवार को मुख्यमंत्री ने एक विडियो जारी करते हुए घोषणा यह घोषणा की| उन्होंने कहा कि आपको रेल किराया नहीं देना होगा| यह हमारी जिम्मेदारी है| बिहार वापस आने वाले छात्र, मजदूर और अन्य लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रखंड मुख्यालय में बने  क्वारंटाइन केंद्र में उनके खाने-पीने, रहने, चिकित्सा, शौचालय की बेहतर व्यवस्था की गई है।

गौरतलब है कि यह 500 रूपये उन्हें ही मिलेगी जो श्रमिक स्पेशल ट्रेन के जरिये बिहार पहुचेंगे और 21 दिन का क्वारंटाइन पूरा करेंगें| प्रत्येक व्यक्ति को रेल किराया के अतिरिक्त 500 रुपये दिया जाएगा या बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम एक हजार रुपये दिया जाएगा।

नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि बाहर फसे लोगों को बिहार सरकार उनके खाता में 1000 रूपये भेज रही है| अभी तक 19 लाख लोगों के खाते में पैसा भेजा दिया गया है| बाकी बचे लोगों के खाते में भी जल्द पैसा भेजा जायेगा|

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बिहार के नियोजित शिक्षकों के मौत से आहात एक शिक्षिका का नीतीश कुमार के नाम एक ख़त

आदरणीय नीतीश चच्चा

प्रणाम!

कोरोना से प्रभावित लोगों में आपका नाम न आने से मैं सुनिश्चित हूँ कि आप सकुशल अपने तमाम सुरक्षा प्रसाधनों के बीच सुरक्षित और खुश महसूस कर रहे होंगे| मुझे उम्मीद है कि दुनिया के सभी अच्छे शासकों की तरह आप भी अपनी जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित होंगे| मुझे यह भी उम्मीद है कि आप अपने लोगों को इस खतरनाक परिस्थिति से उबार लेंगे| यूँ भी लोग कहते हैं कि बिहारियों की जिजीविषा की तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती|

आप सोच रहे होंगे कि हम कौन हैं, जो प्रणाम-पाति करके आपको इतना लम्बा सा खत लिख रहे हैं| दरअसल हमारी पहचान आपके समक्ष बहुत ही छोटी है| आप जहाँ देश के २९ मुख्यमंत्रियों में जगह रखते हैं, वहीं हम देश की १२१ करोड़ जनसंख्या का वो हिस्सा हैं जिसकी भागेदारी से लोकतंत्र जीवित होता है| यह प्यासे के लिए एक बूंद जैसा भी है, पर एक बूंद की कीमत जानने के लिए प्यास होनी भी तो ज़रूरी है| है कि नहीं!

यही प्यास लिए आप हर पांचवें साल हमारे पास आते हैं और हम एक बूंद बनकर सजदे में खड़े मिलते हैं| पिछली बार भी आप आये थे जीतने के लिए| आप जीत भी गये थे, बाकी…| बाकी में बाकी लग गया था| हालाँकि हम राजनीतिशास्त्र के अल्पज्ञ हैं और अपने आप को राजनैतिक लोगों के बीच खड़ा कर सकने में भी असक्षम हैं| वो तो यह साल फिर से वही पांचवां साल है, तो गाहे-बगाहे याद आ जाती हैं ये बातें|

बिहार, जिसके शासक हैं आप, विगत पंद्रह वर्षों से, उसकी प्रसिद्धि प्राचीन काल से ही ‘शिक्षा’ को लेकर रही है| किसी प्रदेश के विकास का पहला पायदान आज भी शिक्षा ही है| विगत वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की प्रगति को विशेषज्ञों द्वारा जांचा-परखा जाएगा, पर आज हम इससे जुड़ी धुरियों की स्थिति तो देख ही सकते हैं|

प्रदेश की शिक्षा चार स्तंभों पर टिकी है| पहला अभिभावक, दूसरा छात्र, तीसरा शिक्षण तंत्र और चौथा शिक्षक| पहला स्तम्भ यानी अभिभावक पर बात करना बेईमानी होगी, क्योंकि बिहार अशिक्षित जनसंख्या वाला राज्य रहा है| यहाँ के शिक्षित ६१ प्रतिशत लोगों में असल में शिक्षित अभिभावक की तलाश मुश्किल है| कुल मिलाकर पहला स्तम्भ मरम्मत या पूरी तरह से बदलाव की मांग करता है| दूसरा स्तम्भ यानी छात्र, जिसके ऊपर भावी सुसंस्कृत नागरिक बनने के साथ शिक्षित अभिभावक बनने का भी दायित्व है, हमेशा की तरह आज भी एक मजबूत स्तम्भ है पर यह स्तम्भ बाकी स्तंभों के उचित कार्य करने से ही स्वस्थ्य दिखाई देता है|

तीसरा स्तम्भ शिक्षण तंत्र है| शैक्षणिक विधि-व्यवस्था, जिसके निर्देशों के पर ही बाकी सतम्भों का कार्य निर्भर है| इस तंत्र द्वारा आपने विगत वर्षों में समुचित प्रयास किये हैं जिससे यह स्तम्भ मजबूत बन सके| परन्तु आपके प्रयासों ने विद्यालयों को भोजनालय में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| हालात तो ऐसे हैं कि विद्यालय भोजन ग्रहण कराने के मुख्य उद्देश्य से खोले जाते हैं और बीच में कभी समय बचे तो अधिगम कार्य भी करा लिए जाते हैं|

चौथा स्तम्भ, शिक्षक, सबसे दयनीय स्थिति में अपने-आप को सम्भालते हुए आपके प्रदेश की शिक्षा का दायित्व निर्वहन करता है| बाक़ी तीनों स्तंभों की कमियों को छुपाता, सबकी मार झेल यह खुद को मजबूत दिखाने का प्रयास करता है| पर इसका महत्त्व बाक़ी तीनों स्तंभों द्वारा उपेक्षित है| ऐसे में यह शिक्षा रूपी भवन टिके तो कब तक?

एक तरफ शिक्षकों को शिक्षकेत्तर कार्यों में संलिप्त रखा जाता है वहीं दूसरी तरफ उन्हें समय पर वेतन न देकर उनके कार्यों की उपेक्षा भी की जाती है| पदाधिकारियों द्वारा विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के उद्देश्य से विद्यालय भ्रमण करना और विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों पर ध्यान न देना भी विद्यालय समाज को शैक्षणिक गतिविधिओं से दूर करता है|

प्रत्येक वर्ष नियोजित शिक्षक एक ही मांग के साथ हड़ताल पर जाते हैं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगती है| उचित मांगों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद दंडात्मक कार्यवाई निश्चित ही उन्हें उपेक्षा का शिकार बनाती है|

इसका व्यापक मनोवैज्ञानिक असर समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा तथा पुनः शिक्षकों के मनोबल पर पड़ता है, जिससे कक्षा में वो अपना सौ प्रतिशत दे सकने में समर्थ नहीं हो पाते|

यदि सरकार को लगता है कि ये शिक्षक योग्य नहीं हैं तो फिर सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि उनके छात्रों का भविष्य कैसे बनेगा| इस परिस्थिति में क्या सरकार योग्यता सम्बन्धी जाँच परीक्षा नहीं ले सकती? और यदि ये शिक्षक योग्य हैं तो फिर इन्हें अपने कार्य का उचित वेतन क्यों नहीं दिया जाता? क्या शिक्षकों की उपेक्षा सम्पूर्ण शिक्षण तंत्र की उपेक्षा नहीं है? क्या यह बिहार को सौ प्रतिशत शिक्षित प्रदेश बनाने में एक बड़ा अवरोध नहीं है? क्या हर साल के हड़ताल और तालाबंदी में छात्रों की शिक्षा बाधित नहीं हो रही, शिक्षकों की ऊर्जा भंग नहीं हो रही या फिर इन बातों का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता?

अपने वृहत परिवार के मुखिया का पदभार संभालते हुए आपने भी शिक्षकों का मनोबल तोड़ने में महती भूमिका निभाई| शिक्षक अपनी प्रतिष्ठा बचाएं तो आपकी धुरी हिल जाएगी और आपकी धुरी बचाएं तो अपने स्वाभिमान को भी दाव पर लगाना पड़ेगा|

आपके प्रदेश में शिक्षकों की सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यंत निंदनीय है| स्थिति यह है कि यदि बेरोजगारी इस हद तक हावी न हो तो कोई बच्चा, अपने सपने में भी शिक्षक बनने का ख्वाब नहीं देखता| यहाँ शिक्षण कार्य कर रहे लोगों का सर्वे कराएँ कि वो आपके शिक्षण तंत्र से कितने संतुष्ट हैं, आपको जवाब मिल जाएगा|

बहरहाल! मैं अब वो कहना चाहती हूँ जो कहने के लिए मैंने इतनी भूमिका गढ़ी है| कोरोना काल के इस विकट विषम परिस्थिति में जितने चिंतित आप अपने राज्य के लिए हैं, एक मुखिया के तौर पर, ठीक उतना ही चिंतित वह शिक्षक भी है, जो अपने परिवार का मुखिया है| आप तो पद से विमुक्त होकर अपने आप को इस वृहत परिवार की नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त कर सकते हैं परन्तु जब एक परिवार का मुखिया अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं निभा पाता न तो वो जीवन से ही विमुक्त कर लेता है खुद को| पिछले दिनों अंतिम साँसें भी गंवा चुके साठ से अधिक नियोजित शिक्षकों ने शायद यही कहना चाहा आपसे|

बिहार में नियोजित शिक्षक, जिनको पूर्ण वेतनमान तक हासिल नहीं है, जिनको राज्यकर्मी का दर्जा तक नहीं मिला, जिनकी कोई निश्चित सेवा-शर्त नहीं है, जिनकी वेतन वृद्धि तक रुकी हुई है, उनसे इस समय केन्द्रीय कर्मचारियों की भांति महंगाई भत्ता भी छीन लिया जाना कितना न्याय संगत फैसला है? इतने कम वेतन के साथ परिवार की सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन उन्हें भी तो करना होता है, कम-से-कम उनसे जीने का हक तो न लिया जाए|

आप अपने शिक्षकों का मनोबल तोड़ने की बजाए उन्हें उचित व्यवस्था दे सकते हैं, उन्हें उच्च-स्तरीय प्रशिक्षण दिलवा सकते हैं, उनसे जुड़कर उत्साहवर्धन करके उनके ज्ञान का पूरा सदुपयोग कर सकते हैं| फिर अपने ही शिक्षकों पर ये दोषारोपण कितना जायज है? अपनी ही जनता पर शासक का यह अविश्वास किस हद तक सही है?

बिहार की अशिक्षा का एक प्रमुख कारण अव्यवस्थित योजनायें हैं, जिनका नियंत्रण न सिर्फ सुदृढ़ शिक्षण तंत्र वरन सुशासन का भी मजबूत आधार बन सकता है|

बाकी सब कुशल-मंगल हो! हमारा प्रदेश कोरोना की लड़ाई जल्द-से-जल्द जीते| आप स्वस्थ रहें, स्वस्थ फैसले लें और अपनी कृति बनाये रखें! इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पुनः प्रणाम!

– नेहा नूपुर