बिहार का यह गाँव जिसने देश को दिये 300 आईआईटियन

​खराब शिक्षा व्यवस्था के लिए बदनाम बिहार में इन दिनों हर कोई टॉपर घोटाले की चर्चा कर रहा है. बिहार में छात्रों को टॉप कराने के लिए बकायदा घोटाला किया जा रहा है. लेकिन इसी बिहार में ऐसे भी बच्चे हैं जो अपनी मेहनत से मुकाम पाते हैं और उन लोगों के सामने बड़ा उदाहरण पेश कर रहे हैं जो हमेशा बिहार कि मेधा का मजाक बनाते हैं।

बिहार के गया जिले का पटवा टोली गांव ‘IIT हब’ बनकर उभरा है. रविवार को आए IIT इंट्रेंस के रिजल्ट में तमाम सुविधाओं से महरूम इस गांव के एक-दो नहीं, बल्कि एक बार फिर 20 छात्रों ने कामयाबी पाई है. एक गांव से इतने स्टूडेंट का एक साथ IIT में सफल होना दूसरों के लिए भले सुखद हैरानी पैदा करता हो.
इन गांव वालों के लिए यही चुनौती बन जाती है कि वे अगले साल इससे बेहतर परिणाम दिखाएं. दरअसल, हाल के वर्षों में गांव के अंदर ही लोगों ने ऐसा सिस्टम बनाया है और यही कारण है कि 10 हज़ार की कुल आबादी वाला ये गाँव पीछले 25 वर्षों में देश को 300 आईआईटियन दिया है.

92 में एक बुनकर के बेटे जितेंद्र सिंह ने IIT में सफलता पाई. IIT मुंबई में दाखिला मिला.जितेंद्र अपने गांव का रोल मॉडल बने. सभी जितेंद्र जैसा बनने की चाहत रखने लगे.और यहीं से शुरू हुई साल-दर-साल गांव के बच्चों के IIT में कामयाब होने की कहानी. जो इस साल भी बदस्तूर जारी रही. इस गाँव से कई लोग दुनिया के अलग-अलग देशों की बड़ी कंपनियों में बड़े पदों पर काम भी कर रहे हैं. वे अपने गांव के बच्चों को स्टडी मटीरियल से लेकर हर तरह के संसाधन तो उपलब्ध कराते ही हैं, उन्हें टिप्स भी देते हैं.

लगभग 10 हजार की आबादी वाले पटवा टोली गांव में लोगों का पेशा बुनकरी ही था. गांव में अधिकतर पटवा जाति के लोग है. सालों से बुनकर का काम करने वाले इस समुदाय के सामने नब्बे के दशक में रोजी-रोटी का संकट आया. तभी उस पीढ़ी के बुनकरों ने अपने बच्चों को इस पेशे से हटकर पढ़ाने और कुछ नया करने की सोची. 1992 से चली इस कोशिश ने आज पूरे गांव को नई दिशा दे दी है.

विकलांग होते हुए भी बिहार के इस लाल ने आईआईटी प्रवेश परिक्षा में लहराया परचम

अक्सर दिव्यन्गता (विकलांगता) को बेबसी और लाचारी का पर्याय माना जाता है. समाज में दिव्यांग जनों को दया के भाव से देखा जाता है. लेकिन महान खगोल वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग को अपना आदर्श मानने वाले शंकर सिंह ने इन सारी मान्यताओ और वर्जनाओ को दरकिनार करते हुये एक ऐसा आदर्श स्थापित किया है जो न केवल अन्य दिव्यांगो को प्रेरित करती है बल्कि सामान्य लोगो के लिये भी प्रेरणा स्रोत है. पोलिओ के कारण ९० प्रतिशत शारीरिक क्षमता खो देने वाले  शंकर ने अपनी बौद्धिक क्षमता से वो सभी कार्य किये है और कर रहे है जो उनकी उम्र के सामान्य लड़के सोच भी नहीं सकते.

हालाँकि उम्र के इस छोटे से पड़ाव में शंकर को कई भेद भाव और असफलताए भी देखने को मिली लेकिन इन सबसे प्रभावित हुये बिना वो निरंतर प्रयास कर रह रहे है. शंकर ने प्रतिष्ठित नवोदय विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की थी लेकिन सरकारी नियमो के कारण उन्हें विद्यालय में प्रवेश नहीं मिला. इससे बिना प्रभावित हुए शंकर ने गाँव के ही सरकारी विद्यालय में अध्ययन जारी रखा . अपनी कुशाग्र बुद्धि से इन्होने राष्ट्रीय स्तर के  नेशनल साइंस टैलेंट सर्च एग्जाम- 2008 और नेशनल टैलेंट सर्च एग्जाम- 2008 उत्तीर्ण किया एवं साथ ही साथ 2010 में शंकर को अजब-दयाल सिंह शिक्षा सम्मान भी दिया गया.

सन 2013 में शंकर ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओ में से एक  आई आई टी- संयुक्त प्रवेश परीक्षा 176वी रैंक से उत्तीर्ण किया. शंकर के इस प्रयास में पटना स्थित कन्हैया सिंह के विज़न क्लासेज और साहिल स्टडी सेंटर ने खूब मदद की. इतने अच्छे रैंक लाने के बावजूद बोर्ड परीक्षा में  मात्र 2 अंको की कमी के कारण शंकर का दाखिला नहीं हो पाया. लेकिन शंकर ने हार नहीं मानी. शंकर ने स्नातक पाठ्यक्रम (विज्ञान)  में दाखिला लेकर अपने आदर्श स्टीफन हाकिंग की तरह अपने लक्ष्य पर अग्रसर है। अपने पढाई के इतर शंकर सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और जन कल्याण के कार्यो में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है. अपने और अन्य गाँव के लडको की अच्छी शिक्षा के लिये शंकर ने अपने घर में कंप्यूटर युक्त पुस्तकालय की स्थापना भी की थी. गाँव के प्रतिभाशाली और गरीब बच्चे जो शहरों में महँगी शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते है, उन्हें शंकर अपने देख रेख में विभीन्न प्रतियोगी परीक्षाओ के लिये तैयारी कराते है. शंकर के छात्र NTSE और Olympiads जैसी परीक्षाओ में बाजी मार चुके है.

इसके अलावा शंकर नियमित रूप से सामान्य ज्ञान और IIT-JEE की तैयारी के लिये MIG-20 परीक्षाओ का आयोजन करते है. प्रतियोगी परीक्षाओ की तयारी कैसे हो इसके लिये शंकर नियमित रूप से प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लेख भी लिखते है .

अभी पिछले वर्ष भोजपुर जिले में आयी भयावह बाढ़ में शंकर ने अपनी संस्था पुरुषार्थ ट्रस्ट और अन्य संस्थाओ केसाथ मिलकर कई गाँव में भोजन और दवा वितरण का कार्य भी किया था. शंकर बडहरा प्रखंड के गाँव में आर्सेनिक युक्त भूमिगत जल के प्रति लोगो और प्रशासन को जागरूक करने का प्रयास भी करते रहे है. इन सामाजिक कार्यो के अतिरिक्त अप्रत्यक्ष राजनितिक गतिविधियों में भी सक्रिय है. शंकर का एक मुहिम  राजनीति को समाज कल्याणकारी भावना, शुचिता और गुणवत्ता से युक्त बनाने को लेकर भी है. शंकर का मानना है कि देश की दश और दिशा राजनीति ही तय करती है. इसलिए अगर देश की दशा और दिशा सुधारनी है तो सबसे पहले राजनीति और जनता के प्रतिनिधियों की दशा और दिशा सुधारनी होगी.

अपने इस मुहिम के अंतर्गत शंकर ने बिहार विधानसभा -2015 के चुनाव के दौरान एक सराहनीय प्रयास किया. बडहरा विधानसभा के उम्मीदवारों को इन्होने एक मंच पर लाकर जनता के सामने उनसे क्षेत्र के विकास सम्बन्धी विषय पर चर्चा करायी और जनता के सवालों से रूबरू कराया. बिहार पंचायत चुनाव के संपन्न होने के बाद विजयी मुखिया और प्रखंड प्रमुख को शंकर ने सम्मानित करके इनसे बिना भेद भाव और राम राज्य को आदर्श मानते हुये कार्य करने की शपथ दिलवाई. शंकर एक RTI एक्टिविस्ट के रूप में भी सक्रिय है. इन्होने RTI के माध्यम से अपने गाँव के मध्य विद्यालय में चल रहे मध्याह्न भोजन योजना में भ्रष्टाचार को उजागर किया था. प्रभु श्री राम को अपना आदर्श मानने वाले शंकर राम नवमी शोभा यात्रा का आयोजन भी करते है जिसमे क्षेत्र के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है.  शंकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर बिहार पुलिस  के सिंघम कहे जाने वाले पटना के निवर्तमान SP शिवदास लांडे ने शंकर को स्वयम सम्मानित किया था.  शंकर अपनी संघर्ष के प्रेरणा के रूप में स्टीफन हाकिंग के साथ साथ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी आदर्श मानते है. शंकर के अनुसार नरेन्द्र मोदी और महेंद्र सिंह धोनी सामान्य पृष्ठभूमि से होते हुये जिस तरह की सफ़लता अर्जित की है वो उन्हें हमेशा उर्जा देती है कि वो आगे चलकर कुछ ऐसा ही काम करे ।जिससे देश का नाम रौशन कर सके.

२२ वर्ष की उम्र में शंकर ने शारीरिक अक्षमता को दरकिनार करते हुये एक शिक्षाविद, सामजिक कार्यकर्ता, प्रशासनिक और राजनैतिक सुधारक के रूप में जो यात्रा शुरू की है उम्मीद है कि वो  वास्तव में काबिल-ए-तारीफ़ है और आशा की जाती है कि समाज और देश के लिये उपयोगी साबित होगी. शंकर के इस प्रयास में जिन 2 लोगो का अमूल्य योगदान है उनका परिचय देना भी नितांत आवश्यक है. शंकर के,मार्गदर्शक एवं भाई -डॉ.गिरीश कुमार सिंह, बड़े भाई रंजीत सिंह और उनके भांजा- सौरभ सिंह ने सेवा का जो आदर्श प्रस्तुत किया है वो आज बहुत कम ही दिखता है. इन तीनो लोगो ने शंकर के संघर्ष में कई त्याग किये है जिनके कारण शंकर को सफलता मिली है।

जेईई मेन्स एग्जाम में कैसे लाए अच्छे मार्क्स? | पढ़े एक्सपर्ट आईआईटीयन की सलाह

जेईई मेन्स की उल्टी गिनती शुरू, 2अप्रैल को है परीक्षा, कट ऑफ क्या होगा? इस सोच में समय व्यर्थ नहीं करें-आईआईटियन शंकर

सीबीएसई की ओर से ज्वाइंट इंजीनियरिंग एंट्रेन्स एग्जाम (जेईई) मेंस- 2017 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। जेईई मेन आईआईटी, एनआईटी और इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स धनबाद में प्रवेश के लिए पहले चरण की परीक्षा है।
जेईई मेन को उत्रीण करने वाले छात्र ही एडवांस 2017 में बैठने के लिए पात्र होंगे। 2 अप्रेल को ऑफलाइन एवं 8 व 9 अप्रेल को ऑनलाइन परीक्षा होगी। ऑफलाइन परीक्षा में मात्र 10दिन शेष रह गए हैं। स्टूडेंट्स को बी बोल्ड, बी कूल, बी रिलेक्स, बी पॉजिटिव एण्ड बी कोन्फिडेण्ट का सिद्धांत अपनाना चाहिए।

फिजिक्स में कंसेप्ट के साथ प्रेक्टिस जरूरी:-
शान्त चित्त दिमाग मुस्कुराहट की कुंजी होती है और यही मुस्कुराहट सफलता की कुंजी बनती है। इसलिए हमेशा मुस्कुराते रहें।

रैंक लाने में फिजिक्स का बहुत बड़ा योगदान होता है। यदि स्टूडेंट बेसिक कंसेप्ट के साथ तैयारी करे तो बेहतर स्कोर कर  सकता है। हर तरह के फॉर्मूले के प्रश्नों का अभ्यास आपके सफलता के अवसरों को बढ़ा देगा।

कट ऑफ क्या होगा? इसकी गणित में समय नष्ट न करें। अनावश्यक आकलन तनाव उत्पन्न करता है और एेसे में कोई काम सही नहीं हो सकता।
*पिछले 10 से 15 साल के पेपरों को सॉल्व करे और अपनी पोटेंशल को आके,
मॉडर्न फिजिक्स, फ्ल्यूड, वेब्स एंड साउंड, रोटेशन मैकेनिक्स एंड इलेक्ट्रॉनिक में बहुत कंसेप्ट हैं, जिनकी प्रेक्टिस जरूरी है। इलेक्ट्रीसिटी, मैग्नेटिज्म, ऑप्टिक्स, थर्मोडायनामिक्स को गहराई से रिवाइज करे।
पिछले कुछ सालों के पेपर का विश्लेषण करें तो क्लास 11 की यूनिट डायमेंशन चेप्टर से लेकर क्लास 12 की मॉडर्न फिजिक्स तक के हर चैप्टर को पढे़ं।
डेरीवेशन एंड रिजल्ट की प्रेक्टिस जरूर करें। किसी भी प्रश्न को हल करने के लिए बेसिक कंसेप्ट व डेरीवेशन का ही प्रयोग करें।
कुछ और नया न करें, जो साल भर अच्छा तैयार किया है, उस पर गौर करें और पूर्ण विश्वास रखें कि आप जंग के लिए तैयार हैं और यह सोचे की आप ही जीतेंगे।
*इस रणनीति से हल करें पेपर:-
आपने -आपके स्ट्रोंग जोन को समझे और पेपर की शुरुआत आपने इंटेरैटिंग सब्जेक्ट से करे।और हा फस्र्ट राउण्ड में सरल यानी स्टेटिक मेमोरी तथा नॉलेज पर आधारित आर्गेनिक और इनऑर्गेनिक के प्रश्नों को धैर्य से हल कर ले। सरल प्रश्नों को पहले हल करने से आपका आत्मविश्वास प्रबल होगा और आप सैकण्ड राउण्ड  में कठिन प्रश्न भी आसानी से हल कर पाएंगे।
और अंतिम कुछ दिनों में कुछ नया न करे । शांतचित मन से तैयारी के और सोचे की मै जेईई क्वालीफाई करूँगा। आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी।
आईआईटियन शंकर
यंगेस्ट एडुकेशनिस्ट
बड़हरा ,भोजपुर

कोटा बना सुसाइड सेंटर, एक और बिहारी छात्र ने किया आत्महत्या

कोटा: राजस्थान का कोटा शहर सुसाइड साईट बनता जा रहा है। कुछ दिन पहले बिहार के ही मुंगेर जिले की एक छात्रा के अप्रैल में कोटा में सुसाइड कर लेने की खबर आई थी। आज  बिहार के एक और छात्र ने राजस्थान के कोटा में सुसाइड कर लिया। भागलपुर से मेडिकल की तैयारी करने गए छात्र निखिल नयन ने बाथरूम में फव्वारे वाले नल में फांसी का फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली।

 

 बिहार के भागलपुर के निखिल नाम के छात्र ने कोटा में खुदकुशी कर ली है। कुछ दिनों पहले ही वह मेडिकल की तैयारी करने कोटा गया था। 

हैरत की बात ये है कि निखिल के सुसाइड करने के दो दिन बाद इस घटना का पता चला।

निखिल कोटा के एलेन कोचिंग संस्थान नें मेडिकल की तैयारी करने गया था। निखिल जिस कमरे में रह रहा था वह दो दिनों से बंद था तो आस-पास रहने वाले छात्रों को शक हुआ, इसके साथ ही उसके कमरे से बदबू आने लगी तो छात्रों ने पुलिस को सूचना दी।

मंगलवार देर रात जब निखिल के कमरे का दरवाजा तोड़ा गया तो उसका शव बरामद हुआ जिससे सड़ांध आ रही थी। मामले की तहकीकात की जा रही है। निखिल के हॉस्टल के छात्रों से भी पूछताछ की जा रही है। मौके से पुलिस को सुसाइड नोट नहीं मिला है, लेकिन शुरूआती जांच में पता चला है कि पढ़ाई के तनाव की वजह से आत्महत्या किया है।

पुलिस ने शव को अपने कब्जे में ले लिया और उसके परिजनों को इत्तला दे दी है, परिजन आज शाम तक वहां पहुंचेंगे। मामले की तहकीकात की जा रही है। छात्रों से भी पूछताछ की जा रही है।

 

कोटा में सुसाइड की यह पहली घटना नहीं है। 

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अप्रैल में मुंगेर की छात्रा ने कर लिया था सुसाइड

इससे पहले बिहार के ही मुंगेर जिले की एक छात्रा ने अप्रैल में कोटा में सुसाइड कर लिया था। पुलिस ने उसकी लाश हॉस्टल के कैम्पस से बरामद की थी। सुसाइड की पूरी घटना हॉस्टल में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी।

वैष्णवी (16) न्यू राजीव गांधी नगर के गुरु वात्सल्य हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। दसवीं बोर्ड का एग्जाम देकर ही वह कोटा में आईआईटी जेईई की तैयारी करने आ गई थी। वैष्णवी के पेरेंट्स ने बताया कि वह साइंटिस्ट बनना चाहती थी।

 

हॉस्टल में लगे सीसीटीवी कैमरे में वैष्णवी की रात की सारी एक्टिविटी कैद हो गई। वैष्णवी ने रूम में हाथ की नस काटी थी। पुलिस को वैष्णवी के कमरे के बाहर खून मिला है। हॉस्टल की गैलरी से होते हुए चौथी मंजिल पर जाकर वहां से छलांग लगा दी। वो छत से कूदी तो पीठ के बल जमीन पर गिरी।

 

इससे पहले बिहार के छात्रों के बीच हुई थी खूनी वारदात

कोटा में छात्रों के बीच हिंसक भिड़ंत में एक कोचिंग छात्र की मौत हो गई। उस पर बड़ी संख्या में आए अन्य छात्रों ने हथियारों से हमला किय, जिसमें18 साल के सत्य प्रकाश तीन साल से कोटा में रहकर कोचिंग ले रहा था। इस हमले में उसकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसका साथी संदीप बुरी तरह घायल हो गया। सत्यप्रकाश बिहार के नवादा का रहने वाला था।

 

अपने बच्चे को डाक्टर और इंजीनियर बनाने का सपना पूरा करने के लिए कोटा भेजने वाले माता-पिता को एक बार ठीक से विचार जरुर करना चाहिए।  वैसे माता – पिता को भी अपने आप में आत्म चिंतन करना चाहिए जो अपने बच्चेपर डाक्टर और इंजीनियर बनने का दवाब देते है।  एक बार सोचिये जरूर, यह आपके बच्चे के जिंदगी का सवाल है।

 

 

बिहार के इस गाँव के हर घर में एक IITians पैदा लेता है, इस बार फिर 50 छात्रों ने किया आइआइटी मेन्स परीक्षा क्रैक किया।

गया: प्राचीन काल में बिहार विश्व गुरू के नाम से प्रसिद्ध था।  पूरे विश्व से लोग ज्ञान प्राप्ति के लिए बिहार आया करते थे।  बिहार ज्ञान की भूमी रही है।  समय के साथ बिहार की वह पहचान कायम नहीं रह सका मगर बिहार ज्ञान की भूमी आज भी है।  बिहारी लोगों के काबलियत इसका प्रमाण है। 

जिस गया के पावन भूमी पर बुद्ध को ज्ञान मिला था उसी गया जिले एक गाँव  मानपुर के पटवाटोली बस्ती के बच्चे फिर शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का नाम हर साल रौशन कर रहें है।

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लगभग साढ़े तीन दशक पूर्व से शिक्षा जगत में विख्यात बिहार का मैनचेस्टर के नाम से मशहूर पटवाटोली मोहल्ले में पूर्व के भांति इस बार भी 50 छात्रों ने आईआईटी मेन्स में सफलता हासिल किया है।

 

बुनकरों की इस बस्ती की एक खासियत इसे देश में खास बनाती है। अभावों में जी रही इस बस्ती की नई पौध सपने देखती है तथा उन्हें पूरा करने का हुनर भी जानती है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि यहां हर साल आइआइटियंस पैदा हो रहे हैं। वर्ष1992 से शुरू हुआ यह सिलसिला आज तक जारी है। यहां से इस साल भी 11 बच्चों ने आइआइटी की प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंकिंग पाई है। पटवा टोली के बच्चों ने इस साल भी अपना रिकॉर्ड कायम रखा है। इससे इलाके में खुशी का माहौल है।

 

गाँव के पूर्व छात्रों द्वारा गठित नव प्रयास नामक संस्था के मदद से गाँव में स्टडी सेंटर चलाये जा रहें है।  पूर्व छात्र जो आइआइटी में सफल हो चुके है वह समय निकाल गाँव आ कर बच्चों को पढाते हैं,  उनकी प्रोबलेम सोल्व करते है, उनका मार्गदर्शन करते है तथा उनको प्रोत्साहित भी करते रहते हैं।

 

अभी पटवा टोली में पांच स्टडी सेंटर चल रहे हैं। यहां के बच्चों के सफलता के पीछे उनकी काबिलियत और मेहनत के साथ-साथ ऐसे सेंटर्स का भी अहम योगदान है। यहां पढने वाले छात्रों का कहना है, ‘‘यहां पढ़ाई करते हुए एक रुचि पैदा होती है। एक प्रतियोगी माहौल मिलता है। इससे पढ़ाई में निखार आता है।’’

 

आज पटवा टोली के सफल छात्र माइक्रोसॉफ्ट, ओरेकल, सैमसंग, हिंदुस्तान एयरनॉटोकिल लिमिटेड जैसी प्रमुख देशी-विदेशी कंपनियों में काम कर रहे हैं।

 

सीमित संसाधनों के वाबजूद ये बच्चे सफलता के मिशाल कायम कर रहें है।  यह बिहार की वही पावन भूमी है जहां बुद्ध को ज्ञान मिला था,  दशरथ मांझी ने अपने मेहनत, जूनून और हिम्मत के दम पर अकेले पहाड़ तोड़ दिया था।  आज उसी भूमी पर एक बार फिर इतिहास दोहराया जा रहा है।  मेहनत, जूनून और हिम्मत तो बिहारी के DNA में है।

बिहार के सिर्फ आनंद कुमार नहीं बल्कि अभयानंद के सुपर 30 से भी 300 में से 270 छात्रों ने किया IIT JEE क्रैक..

पटना: सिर्फ पटना सुपर30 के संचालक आनंद कुमार ही नहीं बल्कि बिहार के पूर्व D. G. P अभयानंद भी हर साल गरीब मेधावीं बच्चों को आईआईटी में दाखिला करवाते है।  

 

पढाने का जुनून हो, कुछ अलग करने का जुनून हो तो वक्त की कमी तो बस बहाना है। आइजी अंकल के नाम से मशहूर बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद को भी एक एेसा ही जुनून है- बच्चों को पढाना और आइआइटी की तैयारी कराना।

 

इस साल भी उनके द्वारा देश भर में संचालित रहमानी सुपर 30 से 270 बच्चों को आइआइटी की परीक्षा में उत्तीर्णता हासिल की है। वे कहते हैं जब बच्चों का रिजल्ट आता है तो उनको एसे खुशी महसूस होती है जैसे उनका खुद का रिजल्ट आया हो।

 

इस बार 270 बच्चों ने आइआइटी क्रैक किया है।

अभयानंद बताते हैं कि इस बार उनके रहमानी सुपर थर्टी और देश के बाहर सीएसआर के तहत चल रहे संस्थानों से 270 बच्चों ने आइआइटी क्रैक किया है। तीन सौ बच्चे इस कतार में थे। वह कहते हैं कि मेरी यह धारणा बन रही है कि अब हर समाज के लोग यह कोशिश कर रहे हैं बच्चे पढ़ें। उन्हें यह समझ में आ गया है कि यह सरकार के बूते की बात नहीं। समाज की मदद से ही आंकड़ा बढ़ रहा है। यह अच्छा है।

 

बिजी शिड्यूस से वक्त निकालकर प्रसिद्ध गणितज्ञ आनंद कुमार के सुपर-30 में फिजिक्स पढ़ाना शुरू किया। वहां बच्चे उन्हें आइजी अंकल कहते थे। एडीजी बनने के बाद भी बच्चे उन्हें इसी नाम से पुकारते थे।
उनके शिक्षक रहते सुपर-30 आइआइटी को रिकार्डतोड़ सफलता मिली। फिर कुछ कारणों से अभयानंद सुपर-30 से अलग हो गए और इसी साल आइजी अंकल के पढाने के जुनून के कारण ही रहमानी सुपर 30 की स्थापना हुई। इसके बच्चे हर साल आइआइटी में अपनी सफलता का परचम लहराते रहे हैं, इस बार भी रहमानी क्लासेज के 270 बच्चों ने आइआइटी क्रैक किया है। यह अभयानंद जी का ही कमाल है।
रिटायरमेंट के बाद और मेहनत की।
सुपर-30 से अलग होने के बाद उन्होंने मुस्लिम बच्चों को पढ़ाने की योजना बनाई। यहीं से जन्म हुआ रहमानी सुपर 30 का। वली रहमानी ने जगह उपलब्ध करायी इसीलिए इसका नाम रहमानी सुपर 30 पडा।  मुस्लिम बच्चों ने भी सफलता हासिल की। बच्चों के आइजी अंकल एडीजी हुए और डीजीपी होने के बाद कुछ वर्ष पहले रिटायर भी हो गए हैं मगर पढ़ाने और पढऩे का सिलसिला आज भी लगातार जारी है।

 

बिहार के लिए आनंद कुमार अभयानंद जैसे लोग गौरव है जो बार बार बिहार और बिहारी का नाम रौशन करते रहते है।

 

 

 

JEE advance results: बिहार से ही पढ़, पटना का इशान बना गुहाटी जोन का टॉपर

पटना: आइआइटी में प्रवेश के लिए आयोजित जेईई एडवांस परीक्षा का रिजल्ट जारी हो चुका है।  बिहार से कई छात्रों के सफल होने की खबर मिल रही है।  आनंद कुमार के सुपर 30 से भी 28 बच्चों ने सफलता हासिल की है तो पटना के ही इशान तरूणेश गुवाहाटी जोन का टॉपर बन बिहार का नाम रौशन किया है।  

IIT advance topper ishan trunesh

ईशान तरूणेश

 

पटना के ईशान तरूणेश ने देशभर में 33वां स्थान लाया है। ईशान अपने जोन गुवाहाटी समेत बिहार का भी टॉपर बना है। इसे 372 में 269 अंक मिले हैं।

आपको बता दे कि शान मुजफ्फरपुर के आईजी सुनील कुमार का बेटा है। पेपर-1 में ईशान को 140 और पेपर-2 में 129 अंक मिला है। सीबीएसई 12वीं में ईशान ने 93.2 प्रतिशत अंक लाया था।  साथ ही इशान जेईई मेन में भी 296 अंकों के साथ बिहार टॉपर भी बना था।

 

उसकी मेहनत और लगन देखकर पहले ही हमलोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि वह टॉप करेगा। ईशान आईआईटी मुंबई से कंप्यूटर साइंस से बीटेक करना चाहता है। इशान कहते है इशान कहता है कि इस परीक्षा में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है। लगतार अध्ययन से ही सफलता मिलती है। टॉपर बनने के लिए तीनों विषयों पर ध्यान देना होता है। ऐसा नहीं कि किसी एक विषय के सहारे आप टॉपर बन जाएं।

 

गुवाहाटी जोन में टॉप-100 में सिर्फ ईशान ने ही जगह बनाई है। इसके अलावा कोई भी छात्र टॉप-100 में नहीं हैं।  खास बात यह है कि इशान कि पढ़ाई दरभंगा के स्कूल से शुरू हुआ और अभी तक बिहार में ही पढ़ाई किया है।

इशान के इस रिजल्ट ने बिहार के तमाम छात्र और अभिभावक को एक रोशनी मिली है कि बिहार में रहते बिहार के एजुकेशन सिस्टम में अभी भी बहुत जान बाकी है।

 

 

 

 

JEE Advance Result : बिहार के छात्रों ने फिर किया धमाल, पटना सुपर30 के 28 छात्रों ने मारी बाजी..

पटना: देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा ज्वॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई) एडवांस 2016 के नतीजे घोषित कर दिए गए हैं.  प्राप्त जानकारी के मुताबिक हर बार के तरह इस बार भी बिहारी छात्रों ने धमाल मचा दिया है।  

 

पटना के आनंद सुपर-30 में से 28 छात्रों ने सफलता हासिल की है तो वही ईशान तरुनेश बिहार और गुवाहाटी जोन के टॉपर बने हैंं. देशभर में ईशान को 33वीं रैंक मिली है. ईशान मुजफ्फरपुर के आईजी सुनील कुमार के पुत्र हैंं. इसके अलावा अश्विनी कुमार बिहार के सेकंंड टॉपर बने हैं. अश्विनी कुमार छपरा के एडीजे ओमप्रकाश के बेटे हैं.

 

साथ ही बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद द्वारा देश भर में चलाए जा रे अभयानंद सुपर 30 से 270 छात्रों ने सफलता के झंडे गाडे है।  अभयानंद ने दावा किया है कि सुपर-30 के अलग-अलग केंद्रों के 338 स्टूडेंट्स जेईई एडवांस में श्‍ाामिल हुए थे, जिनमें से 270 स्टूडेंट ने सफलता हासिल की है.

स्टूडेंट की सफलता को लेकर सुपर-30 में खुशी का माहौल है. सभी ने एक-दूसरे को मिठाई और आम खिलाकर बधाई दी.

 

ज्ञात हो कि इस बार जेईई एडवांस 2016 परीक्षा आईआईटी गुवाहाटी द्वारा आयोजित की गई है और जेईई मेन क्वालीफाई करने के बाद दो लाख स्टूडेंट्स ने 22 मई को एडवांस का एग्जाम दिया था. आज रिजल्ट घोषित होने के बाद सफल उम्मीदवारों की ऑल इंडिया रैंक भी घोषित कर दी जाएंगी.

जेईई एडवांस्ड के जरिए ही छात्रों को देश की तमाम आईआईटी और आईएसएम (इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद) के इंजीनियरिंग कोर्सेज में प्रवेश मिलेगा। इसके अलावा आईआईएसईआर, राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में भी आईआईटी एडवांस्ड के स्कोर से ही दाखिला मिलता है।

जयपुर के अमन बंसल (AIR – 1) ने परीक्षा में टॉप किया है। यमुना नगर के भावेश ढींगरा (AIR – 2) को दूसरा, जबकि जयपुर के ही कुणाल गोयल (AIR – 3) को तीसरा स्थान मिला है।

 

 

 

देखिए गणित के भगवान कहे जाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह का क्या हाल है?

आज जानिए बिहार के एसे गणितज्ञ के बारे में जिनका लोहा पूरी अमेरिका मानती है। इन्होंने कई ऐसे रिसर्च किए, जिनका अध्ययन आज भी अमेरिकी छात्र कर रहे हैं। जो NASA से IIT तक अपनी प्रतिभा से सबको चौका दियें।  मगर वह आज अपने ही देश और राज्य में गुमनामी का जिन्दगी जी रहे है।  मानसिक बीमारी सीजोफ्रेनिया से ग्रसित हैं। इसके बावजूद वे मैथ के फॉर्मूलों को सॉल्व करते रहते हैं। इनका हालत देख आपके आँखें भी नम हो जाएंगी। 

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बिहार के वसिष्ठ नारायण सिंह जी कोई गणित का भगवान कहता है तो कोई जादूगर। एक जमाना था जब इनका नाम गणित के क्षेत्र में पूरी दुनिया में गूंजता था मगर आज बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले महान गणितज्ञ डा. वशिष्ठ नारायण सिंह वर्षों से सीजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी की वजह से कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं।  इसमें कोई सक नहीं की अगर वह आज ठीक होते तो अभी तक गणित का  इनको नोवेल प्राईज जरुर मिल गया होता।

 

 

डा वशिष्ठ नारायण सिंह ने न सिर्फ आइंस्टिन के सिद्धांत E=MC2 को चैलेंज किया, बल्कि मैथ में रेयरेस्ट जीनियस कहा जाने वाला गौस की थ्योरी को भी उन्होंने चैलेंज किया था।
ऐसा कहा जाता है कि अपोलो मिशन के दौरान डा सिंह नासा में मौजूद थे, तभी गिनती करने वाले कम्प्यूटर में खराबी आ गई। ऐसे में कहा जाता है कि डा वशिष्ठ नारायण सिंह ने उंगलियों पर गिनती शुरू कर दी। बाद में साथी वैज्ञानिकों ने उनकी गिनती को सही माना था।
अमेरिका में पढ़ने का न्योता जब डा वशिष्ठ नारायण सिंह को मिला तो उन्होंने ग्रेजुएशन के तीन साल के कोर्स को महज एक साल में पूरा कर लिया था।

 

2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपूर जिले के बसंतपुर गाँव में जन्मे महान गणितज्ञ “डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह” की प्राइमरी और सेकेंडरी की स्कूली शिक्षा नेतरहाट विद्यालय से हुई.

पटना साइंस कॉलेज ने प्रथम वर्ष में ही उन्हें B Sc (Hons) की परीक्षा देने की अनुमति दे दी. 1969 में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, बर्कली से Reproducing Kernels and Operators with a Cyclic Vector विषय पर PhD की उपाधि मिलने के बाद डॉ वशिष्ठ नारायण NASA के Associate Scientist Professor पद पर आसीन हुए. 1971 में उनकी शादी हुई परन्तु कुछ ही वर्षों बाद बीमारी की वजह से वे अपनी पत्नी से अलग हो गए.

1972 में भारत वापस आकर IIT कानपुर ,TIFR मुंबई, और ISI कलकत्ता के लेक्चरर बने. 1977 में मानसिक बीमारी “सीजोफ्रेनिया” से ग्रसित हुए जिसके इलाज के लिए उन्हें रांची के कांके मानसिक अस्पताल में भरती होना पड़ा. 1988 ई. में कांके अस्पताल में सही इलाज के आभाव में बिना किसी को बताए कहीं चले गए. 1992 ई. में सिवान,बिहार में दयनीय स्थिति में डॉ वशिष्ठ नारायण को लोगों ने पहचाना.

 

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एक बूढ़े आदमी हाथ में पेंसिल लेकर यूंही पूरे घर में चक्कर काट रहे हैं. कभी अख़बार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते हुए.
घर वाले उन्हें देखते रहते हैं, कभी आंखों में आंसू तो कभी चेहरे पर मुस्कराहट ओढ़े.
यह 70 साल का ‘पगला सा’ आदमी अपने जवानी में ‘वैज्ञानिक जी’ के नाम से मशहूर था.

 

पटना में उनके साथ रह रहे भाई अयोध्या सिंह बताते है, “अमरीका से वह अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वह आज भी पढ़ते हैं. बाकी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी, पेंसिल लानी पड़ती है.

 

इनका यह हालत देख बहुत दुख होता।  बिहार और देश का नाम पूरी दुनिया में रौशन करने वाले का अपने ही देश में यह हाल देखा नहीं जाता।