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कोरोना त्रासदी में हाशिए पर खड़ा देश का बहुजन समुदाय

कोरोना वायरस को भारत में दस्तक दिए दो महीने से अधिक हो गये हैं| देश मे मरीजों की संख्या जहाँ पैतीस हज़ार के पार हो गयी है और समुचा देश एक महीने से अधिक समय से बन्द पड़ा हुआ है – ऐसे में कई मिडिल क्लास और अपर क्लास सोशल मीडिया पर बोर होने की पोस्ट डाल रहे हैं, कोई जिम करने कि सलाह दे रहा है तो कोई खाने के रेसिपी शेयर कर रहा है| कभी-कभार लोग सोशल मीडिया पर मजदूरों पर चिन्ता व्यक्त कर देते है तो कोई मुस्लिम पर हो रहे अत्याचारों को भी शेयर कर देते हैं| कई लोग ताली-थाली बजाने का काम और दिया जलाने जैसे कामों की प्रतीक्षा कर रहे हैं| कुछ ऐसे भी लोग है जो प्रवासी मजदूरों को गाली दे रहे हैं तो कुछ मुस्लिम समुदाय पर भी टिप्पणी कस रहे हैं| लेकिन इस देश में बहुत से लोग समाजिक सच्चाई से अवगत नहीं है| वो वाट्सऐप पर आयी हुए ख़बरों को अपने जानकारी का आधार मानते हैं और उसी आधार पर बहुजनों को गाली भी देते हैं – जब सरकार राशन दे ही रही है तो किस बात का रोना रो रहे हैं? डालगोना कॉफ़ी वाले लोगो को यह भी नहीं पता कि राशन मे किस प्रकार के खाद्य पदार्थ मिलते हैं?

फ़ेसबुक और वाट्सऐप यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए लोगों को यह भी नहीं पता कि देश मे गरीबों कि संख्या कितनी है? और उनमे से कितने लोग बहुजन समुदाय के हैं।

2011 का जनगणना रिपोर्ट यह बताता है कि देश मे कुल जनसंख्या का भाग 41% अति पिछड़ा वर्ग (OBC) है,  16.8% अनुसूचित जातिया और 8.6% अनुसूचित जनजातिया है , 14.2% मुस्लिम समुदाय के लोग है | अर्जुनसेन गुप्ता कमिटी के रिपोर्ट के अनुसार देश मे 84 करोड़ लोग गरीब है जिसमें से 77% लोग बहुजन समुदाय के है| देश मे जब भी कोई त्रासदी आई है तो उस त्रासदी का सबसे बड़ा शिकार भी बहुजन समुदाय के लोग ही हुए हैं और हमेशा की तरह कोई भी घोषणा करने से पहले देश के वंचितों के बारे में नहीं सोचा गया चाहे वो नोटबंदी हो या एन.आर.सी. और लॉकडाउन| लाकडाउन मे प्रवासी मजदूरों कि हृदय चीरने वाली तस्वीर यह बताती है कि गरीबो कि सुध नहीं ली गयी है!

इस लेख में हम पूरे देश का जायजा तो नहीं ले पाए है लेकिन देश के विभिन्न कोनों से बहुजन समुदाय के लोगो ने अपनी बात लॉकडाउन और गरीबी पर रखी है, उत्तरपुर्वी राज्य मेघालय की निवासी लियान्मा लालू का मानना है की मेघालय मे मुख्य रुप से गारो,  खासी, जयन्तिया आदिवासी समूह रह रहे हैं वह बताती है कि लाकडाउन मे शहर मे रह रहे लोगों को कम तकलीफ़े है,  लेकिन जंगली इलाकों मे दिक्कते बढ़ रही है, वहा कई आदिवासियों को राशन नहीं मिल पा रहा है, राज्य सरकार ने तो फ़िर भी कई लोगो की सहायता करने की कोशिश की है लेकिन केन्द्र सरकार की मदद उन आदिवासियो तक नहीं पहुंच पा रही है, कई लोग जंगल मे होने वाली सब्जियो और फ़लो पर अपना गुजारा कर रहे हैं, लियान्मा कहती है कि राज्य मे कई समूह ऐसे भी है कि उनके पास  ना तो रेडियो, और ना ही  टेलीविजन है। इसलिए उनके तक खबर पहुँचाने में दिक्कत हो रही है, वह कह रही है कि हमारे मुख्यमन्त्री ने लॉकडाउन तीन मई से आगे बढ़ाने का विचार रखा है ताकि महामारी के चेन को रोका जा सके,  लेकिन अभी भी उन लोगों के बारे मे नहीं सोचा गया है जो रोजाना कमाते है!

वहीं अरुणाचल प्रदेश के वसन्त कहते हैं कि उत्तरपुर्वी राज्यों मे कई जरुरी चीजे जैसे चावल, असम से आते हैं| लॉकडाउन के चलते ये आ नही पा रहे हैं जिनसे चावल बहुत महंगा हो गया है और इसे गरीब तबके के लोग खरीद नही पा रहे हैं वह यह भी बताते है कि कई आदिवासी समूह पूरी तरह जन्गलो के उत्पाद पर निर्भर हो गये हैं उनके पास इसके आलावा कोई राशन नही है| वसंत बताते है कि खाने का अभाव होने के कारण गरीब आदिवासी गुस्सा भी प्रकट कर रहे हैं उन्हे इस बात का डर है कि अगर सरकार ठीक से ध्यान नहीं दी तो विरोध की ज्वाला कही और ना बढ़ जाए!

केरल की निवासी फ़ातिमा रजीला का कहना है कि केरल जैसे राज्य मे भी गरीबों को दिक्कत हो रही है, वह कहती है कि तटीय इलाकों मे रह रहे मछुवारो को काफ़ी दिक्कते आ रही है| एक तो उनका रोजगार नहीं चल रहा और उसके साथ उनके पास निजी वाहन ना होने के कारण वह मेडिकल ईमर्जेन्सी मे भी घन्टो इंतज़ार करते हैं| इलाज के लिए, वह बताती है कि गरीब परिवार के लोगों को यहाँ पर राशन तो मिल गया है पर अन्य जरुरी सामग्री के लिए उन्हे दिक्कत हो रही है फ़िर भी वह केरल सरकार की सराहना करती है और उम्मीद करती है कि केरल सरकार इन समस्याओं पर जरुर ध्यान देगी|

यदि हम बहुजनो कि दयनीय स्थिति कि बात करे तो इनकी हालत खबर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बहुसंख्यक राज्यो मे मिलती जहाँ राज्य की लाखों आबादी अपना जीवयापन हेतु बाहर प्रवास करती है|

उत्तर प्रदेश के समाजिक कार्यकर्ता कुलदीप सन्खवार (पुर्व राज्यमंत्रि,  बसपा) बताते हैं कि बहुजन समुदाय कि स्थिति बहुत ही खराब है, राशन आने के बावजूद भी उच्च जाति के दबंग डीलर राशन वितरण नहीं कर रहे हैं,  वास्तव में जो राशन के हकदार है उन्हे राशन कार्ड नहीं मिला है, कई अपने सगे सम्बम्धियो को राशन दे रहे हैं,  वह यह भी बताते है कि यूपी के 20-25 लाख लोग अभी भी बाहर फ़से हुए हैं जिनमे से 70% लोग गरीब पिछड़े समुदाय से है, उनके पैसे से ही गाँव में उनका परिवार का गुजर-बसर होता था अब उन परिवारों को अपना जीवन यापन करने मे काफ़ी मुश्किले आ रही है|

यदि हम बिहार राज्य की बात करें तो बिहार में भी बहुजनो कि स्थिति दयनीय ही है| समाजिक कार्यकर्ता मुकेश राजभर बताते है कि जिले कि स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं है, वह क़वारन्टीन सेंटरों पर आये प्रवासी मजदूरों का वृतान्त सुनाते है तो आन्खे भर जाती है, कुदरा ब्लाक मे 900-1000 मजदूर विभिन्न राज्यों से आए है, जिनमें से कुछ ने ठेकुआ का सहारा लिया तो कुछ पानी पी कर ही काम चला लिये, कोइ पैदल चला, तो कोई साइकिल का सहारा लिया, प्रवासी मजदूरो मे से 70-75% बहुजन समुदाय के ही लोग है जिनके पास गाँव मे भी रोजगार का साधन नहीं है, किसी को बेटी कि शादी कि चिंता सता रही तो किसी को अपने बच्चों का पेट भरने कि चिन्ता खाये जा रही है| मुकेश यह भी बताते है कि दिल्ली- गुजरात जैसी जगह पर कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों की सैलरी भी बन्द हो गयी है|

गाँव के अधिकतर खेतों और जमीनों पर आज भी उच्च वर्ग का बोलबाला है| ऐसे मे उनके पास अथाह गरीबी से गुजरने का भय सताता है! मुकेश यह भी बताते है कि बिहार राज्य सरकार इन तबको के बारे मे नही सोच रही है, वह आशा और जीविका कार्यकर्ता को मास्क देने मे भी सक्षम नही है|

मुकेश का मानना है कि दलितों और मुसलमानों मे जानकारी का अभाव है मुसलमान एन.आर.सी से इतना डर गये है कि जब भी पुलिस इनके इलाको मे जाती है तो इन्हे एन.आर.सी का डर लगने लग जाता है और कई लोग बाहर नही आते हैं| वैसे ही निरक्षरता के कारण मुसहर टोली के लोग भी कोरोना को समझ नही पा रहे हैं उन्हे लगता है कि पुलिस के साथ डाक्टर, नर्स उन्हे जेल में बन्द करने के लिए आए है, इसलिए वह भी जाँच के लिए आगे नही आ रहे हैं!

वहीं बिहार के बक्सर जिले के विद्यासागर अपना विचार रखते हुए कहते हैं कि जहाँ एक तरफ कोरोना ने वैश्विक स्तर पर मानवीय एवं गैर मानवीय संसाधनों को क्षति पहुँचाया है तो दूसरे तरफ इसने ऐसे कई विमर्श पैदा कर दिए हैं जो भारत जैसे राष्ट्र के लिए नितांत विचारणीय हो जाता है।

सबसे अहम सवाल उठता है श्रमिक वर्ग का जो इस महामारी का सबसे बड़ा भुक्तभोगी बना है। श्रमिक वर्ग का मसला उन भारतीय राज्यों के लिए ज्यादा अहम हैं जिनके यहाँ प्रवासी श्रमिक ज्यादा संख्या में कार्यरत हैं। उदाहरण स्वरूप उत्तर भारत के श्रमिक भारत के तमाम राज्यों में रोजगार के लिए गए हुए हैँ। लेकिन इस महामारी ने तमाम औद्योगिक संस्थानों में ताला लगा दिया है। परिणामतः ये श्रमिक आज रोजगारहीन होकर दर-दर की ठोकरें खा रहें हैँ।

इस वैश्विक त्रासदी में उन श्रमिकों की स्थिति और दयनीय हो गयी है जो आर्थिक संसाधनों के अभाव में अपने गृह राज्यों की ओर वापस लौटने को मजबूर हैं लेकिन लॉकडाउन की वजह से वो बेघर और लाचार नजर आ रहें हैं|

इस संकट में सबसे ज्यादा प्रभावित बिहार राज्य के श्रमिक हुए हैं| बिहारी श्रमिक देश के तमाम राज्यों में फंसे हुए हैं लेकिन सरकारी उदासीनता और राजनीतिक षड्यंत्रों के कारण इनके भविष्य पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं ।

श्रमिकों में ज्यादातर समाज के निचले तबके से सम्बन्ध रखते हैं और ऐसे में उनकी स्थिति के बारे सोचना शायद अकल्पनीय है। इन श्रमिकों के साथ हो रहे इस अन्याय का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्या वो राजनीतिक पार्टिया हैं जिनके लिए ये श्रमिक केवल एक वोट मात्र हैं या वो नौकरशाही है जो अपने जिम्मेवारियों को संवेदनशीलता से नहीं निभा रही हैं ।

दलित समुदाय कि छात्रा रश्मि भी दलित बच्चों के पढाई को लेकर चिंतित है वो कह रही है कि बहुजन समुदाय के लोगो को खाने कि दिक्कत हो रही है ऐसे में वह कहाँ से डिजीटल शिक्षा ले पायेंगें? वह कह रही है कि पैसो के अभाव के कारण आने वाले सत्र मे कई दलित बच्चे गरीबी के कारण स्कूल-कॉलेजों मे नामान्कन ही नही करा पायेंगें|

इन सारे अनुभवों को देखकर लगता है कि बहुजन समुदाय के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक नही है, कॉरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित बिहार राज्य के बहुजन है, जहाँ कभी कोई मुसहर बच्चे की भुख से मौत हो जाती हैं तो किसी जिले में बच्चे घास खाने को मजबूर है तो कही एमबुलेन्स ना पहुँचने के कारण बच्चे की मौत हो जाती है, तो कही डीलर अनाज वितरण से इंकार कर देता है, तो कई लोगो को राशन कार्ड होते हुए भी दबंगई के कारण राशन नहीं मिल पाता|

बिहार सरकार दुसरे राज्य के लोगों से अपील कर रही है कि उनके मजदूरों को खाना खिलाया जाए, इतने वर्ष बाद भी बिहार के लोग काम के लिये दुसरे राज्यो पर निर्भर हैं!

सभी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार से निवेदन है कि किसी भी निर्णय लेने से पूर्व वन्चितो के बारे मे जरुर सोचे, देश की 70% आबादी बहुजन है, उन्हें भी महत्व दिया जाए| योजनायें केवल कागजों पर ही नहीं वास्तविक रुप से भी लागू हो| देश और राज्य के किसी भी निर्णय मे बहुजनो की राय जरूर शामिल हों और इसके लिए देश के बहुजन मिन्नत नहीं कर रहे बल्कि अधिकार स्वरूप बोल रहे हैं|

– ऋतु (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय मे बिहार के डोम समुदाय पर शोध कर रही है) 

जयंती विशेष: ओबीसी आरक्षण के जनक और पिछड़ों के मसीहा थें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बीपी मंडल

देश में वर्षों से शोषित, गरीब और दबे-कुचले दलित और पिछड़ों वर्गों के लिए आरक्षण किसी वरदान से कम नहीं है। समाज के इन पिछड़े वर्गों को सामाजिक , वित्तीय और शैक्षणिक स्तर पर प्रोत्साहित कर मुख्यधारा से जोड़ने के मकसद से इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। चूकी देश की बहुसंख्यक आबादी पिछड़ा है इसलिए आज आरक्षण एक राजनीति मुद्दा भी है । कुछ ही दिन पहले केंद्र में वर्तमान मोदी सरकार ने संसद में पिछड़ा आयोग को संवैधानिक मान्यता दिलाने की बात कही है तो हाल ही के चुनावों में आरक्षण एक प्रमुख मुद्दा रहा है ।

 

आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पिछड़ा वर्ग आयोग के पहले अध्यक्ष स्व. बी पी मंडल का 99वीं जयंती है। बीपी मंडल ओबीसी आरक्षण के जनक है । इसलिए अगर भीमराव अम्बेडकर को दलितों का मसीहा कहा जाता है तो बीपी मंडल को पिछड़ों का मसीहा कहा जाता है ।

 

बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल यानी बी. पी. मंडल को ईमानदारी ,निर्भिकता और स्वाभिमान से सुसज्जित व्यक्तित्व के रुप में जाना जाता है । सामाजिक परिवर्तन की धारा को निर्णायक मोड़ देनेवाले महापुरुषों में मंडल आयोग के जनक बी. पी. मंडल का नाम अग्रगण्य है|जिले के मुरहो निवासी व स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी लाल मंडल के पुत्र बीपी मंडल ने सामाजिक न्याय के लिए काम किया। 47 दिनों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहकर जिस तरह से उन्होंने शासन और प्रशासन के सफल संचालन में अपनी भूमिका निभाई, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षर में दर्ज है। स्व. बीपी मंडल का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 25 अगस्त 1918 को उस समय हुआ था जब उनके पिता जिन्दगी और मौत से जूझ रहे थे। उनके जन्म के बाद ही 26 अगस्त 1918 को उनके पिता का निधन हो गया। बीपी मंडल की प्राथमिक शिक्षक उनके गांव मुरहो स्थित कमलेश्वरी मध्य विद्यालय में हुई तथा उन्होंने सिरीज इंस्टीच्यूट मधेपुरा (शिवनंदन प्रसाद मंडल विद्यालय, मधेपुरा) से ग्रहण किया। इसके बाद दरभंगा, भागलपुर और पटना से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसी बीच उनकी शादी समस्तीपुर जिले के आधारपुर निवासी सीतावती देवी से हुई। उनके भाई कमलेश्वरी प्रसाद मंडल भागलपुर के एमएलसी थे। उनके निधन के बाद वह भागलपुर से जिला परिषद सदस्य बनकर राजनीतिक जीवन में प्रवेश किए और इसके बाद सांसद, विधायक तथा मुख्यमंत्री बन कर समाज की सेवा की।

 

 

मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद मसीहा बन गए

1977 में हुई लोक सभा चुनाव के बाद मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर बीपी मंडल को उसका अध्यक्ष मनोनित किए।  देश में ओबीसी की स्थिति के आंकलन के लिए बनाए गए मंडल आयोग के अध्यक्ष के रूप में मंडल ओबीसी के मसीहा के रूप में सामने आए। 1978 में आयोग के अध्यक्ष रूप में 31 दिसम्बर 1980 को  इसके प्रस्तावों को राष्ट्र के समक्ष उन्होंने पेश किया। यद्यपि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में एक दशक का समय लग गया पर इसकी सिफारिशों ने देश के समाजिक व राजनैतिक वातावरण में काफी दूरगामी परिवर्तन किए। कहना गलत न होगा कि मंडल कमीशन ने देश की भावी राजनीति के समीकरणों की नींव रख दी। राष्ट्र के प्रति बी0पी0 मंडल के अप्रतिम योगदान पर 1 जून 2001 को उन पर डाक टिकट जारी किया गया।

 

” गांव में रहने वाला लल्लू नाम का लड़का अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा हासिल नहीं कर पाता है, उसके घर में अगर टीवी न हो और उसे वे सारे अवसर उपलब्ध न हों जो शहर में रहने वाले मोहन के पास हैं, तो क्या होगा? लल्लू अगर मोहन से मेधावी हुआ भी, तब भी वह अंग्रेजी में उससे तेज नहीं होगा, सामाजिक संपर्कों के मामले में भी उसका आत्मविश्वास कम होगा और मोहन के साथ वह प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। लल्लू अगर ज्यादा योग्य है, तब भी आप अंत में मोहन को ही ज्यादा योग्य ठहराएंग।” – बीपी मंडल 

 

उनकी जलाई जिंगारी आज तीव्र अग्नि बन गई है- 

13 अप्रैल 1982 पटना में हृदय-गति रुकने से मृत्यु हो गई |अश्रुपुरित जनसैलाब के बीच राजकीय सम्मान के साथ इनका अंतिम संस्कार गाँव मुरहो में किया गया। आज भी यहां हर साल सरकारी तौर पर जयंती सामारोह आयोजित किया जाता है।

नीतीश सरकार ने इन लोगों को न्यायिक सेवा में 50 फीसदी आरक्षण का दिया तोहफा

नीतीश कैबिनेट ने उच्च न्यायिक सेवा जिला न्यायाधीश और बिहार असैनिक सेवा, न्याय शाखा के पदों पर सीधी नियुक्ति नियमावली को संशोधित किया है. साथ ही सिविल सेवा मे महिलाओं के 35 फीसदी आरक्षण को न्यायिक सेवा में भी लागू कर दिया गया है.

नए प्रावधान के मुताबिक सीधी नियुक्ति मे अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए 21 फीसदी, पिछड़ा वर्ग के लिए 12 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 1 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है.

 

नई व्यवस्था में एससी और एसटी का आरक्षण तो पूर्ववत रहेगा लेकिन अति पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ा कर 21 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही पिछड़ा वर्ग को भी 12 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। नई व्यवस्था सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा अधिसूचना जारी करने की तिथि से प्रभावी होगी। सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव डी.एस.गंगवार और कैबिनेट विभाग के प्रधान सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा ने बताया कि अनारक्षित और आरक्षित दोनों श्रेणियों में क्षैतिज रूप से (आरक्षण के भीतर आरक्षण) महिलाओं को 35 प्रतिशत और अस्थिजनित निश:क्त को 1 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा।

 

हाईकोर्ट से भी मिल चुकी है मंजूरी

सरकार ने मामला कैबिनेट में लाने से पहले हाईकोर्ट और बीपीएससी के पास भेजा था। इसे दोनों संस्थाओं ने सहमति दे दी है। अपर जिला न्यायाधीश और मुंसिफ मजिस्ट्रेट के 1075 पदों भर्ती में नई आरक्षण व्यवस्था लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। कैबिनेट ने बिहार उच्च न्यायिक सेवा (संशोधन) नियमावली 2016 और बिहार असैनिक सेवा (न्याय शाखा) भर्ती संशोधन नियमावली 2016 में संशोधन कर दिया है।

 

कैबिनेट की बैठक में कुल 14 एजेंडो पर मुहर लगी. इसके अलावा, सूबे मे उद्योग के बढ़ावा देने के लिए बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन अधिनियम 2016 के तहत राज्य निवेश प्रोत्साहन पर्षद का गठन करने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है.

पर्षद का अध्यक्ष विकास आयुक्त को बनाया गया है. यह पर्षद 2.5 करोड़ रुपए के निवेश के लिए विकास आयुक्त को शक्ति देगा वहीं 10 करोड़ रुपए की रेखा उद्योग विभाग मंत्री के लिए रखी गई है.

10 से 20 करोड़ की राशि के लिए वित्त और उद्योग मंत्री को संयुक्त रुप से निर्णय लेंगे और इसके उपर की राशि की निवेश के लिए कैबिनेट की मंजूरी का प्रावधान किया गया है.

आरक्षण: पूरे देश में आंदोलन करेंगे लालू प्रसाद यादव..

पटना: लालू प्रसाद आंदोलन से निकले नेता है।  आंदोलन से उनका बहुत पुराना रिश्ता रहा है।  जेपी आंदोलन से राजनीति में कदम रखा तो मंडल आंदोलन से राष्ट्रीय राजनीति में छा गये।  

 

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एक बार फिर लालू यादव देश में एक बडा आंदोलन करने की तैयारी कर रहे है।

आरजेडी ने केंद्रीय विश्व विद्यालय में प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आरक्षण खत्म करना केन्द्र की मोदी सरकार की बड़ी साजिश करार दिया है। इस पर आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने कहा है कि बीजेपी का दलित विरोधी चेहरा उजागर होने लगा है। उन्होंने  कहा आरक्षण मामले पर पूरे देश में आंदोलन करेंगे।

 

राजद अध्यक्ष ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि पिछड़ा और दलित विरोधी चेहरा बीजेपी का उजागर हो गया। इसे रोल बैक करें नहीं तो खामियाजा भुगतना पड़ेगा। हम चेतावनी दे रहे हैं। पूरे देश में आन्दोलन होगा। आरक्षण हमारा अधिकार है। महा जंगलराज देश में हो गया है। CJI ने भी कहा है कि उनको ऊंगली दिखाया जा रहा है। इस सरकार को एक क्षण भी रहने का अधिकार नहीं है।

 

लालू प्रसाद ने कहा कि आरक्षण कोई भीख व दया नहीं है। चुनाव के समय भागवत जी ने ईमानदारी से स्वीकार किया था क़ि आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए। बार-बार मोदी जी की तरफ से आरक्षण जारी रहने की दलील दी गयी क़ि आरक्षण जारी रहेगा। लेकिन 3 जून को associate प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर की बहाली में आरक्षण समाप्त कर दिया गया। संसद में महागठबंधन इसे गंभीरता से उठाएगा।

 

गौरतलब है कि बिहार चुनाव में भी लालू यादव ने आरक्षण को बडा मुद्दा बनाया था।  मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को लालू यादव ने पूरे चुनाव प्रचार मे ऐसे भुनाया कि बीजेपी बिहार के रण में टिक न सकी।  फिर लालू प्रसाद आरक्षण को देश भर में मुद्दा बना बीजेपी को खेरना चाहती है। एक तरफ आरक्षण लालू ताकत है तो बीजेपी की कमजोरी है।  हांलाकि प्रधानमंत्र नरेंद्र मोदी ने खुद आरक्षण में कोई छेड-छाड़ नहीं करने का आश्वासन दिया है।