निश्चय यात्रा पर निकले नीतीश कुमार के नाम सोचने को मजबूर कर देने वाला एक खुला पत्र।

​नीतीश बाबु,

सादर प्रणाम

बचपन में जब चिट्ठी लिखना सिखाया जाता था, तब ऐसे ही लिखना शुरू किये थे। भूल-चूक की माफ़ी की गुहार लगा रही हूँ। लोग एगो-दुगो परिवार से परेशान हो जाते हैं, आप तो इतने सारे परिवारों के मुखिया हैं, आपकी परेशानी का आलम हम तो कब्बो सोचियो नहीं सकते हैं।

खैर, सुनने में आया कि आप ‘निश्चय यात्रा’ पर निकले हैं। अब इसका मतलब तो हम जैसा आमआदमी को समझ में आवे से रहा, मगर एतना जरूर लग रहा है कि जैसे पहिले के जबाना में राजा लोग निकलता था अपने प्रजा का हाल-चाल जानने, वैसे ही शायद आपहुँ निकले हैं।

जानते हैं नीतीश बाबु, राजा जब महल से निकलने वाला होता है न, तो उससे ज्यादा मेहनत उसके सिपाहियों को करनी पड़ती है, उसके प्रजा को करनी पड़ती है। ना-ना! राजा के स्वागत के लिए नहीं, बल्कि अपना दर्द राजा से छुपाने के लिए।

आप तो निकले होंगे हाल-चाल जानने, अपने शासन का प्रभाव जानने, मगर आप वही जान पाएँगे जो आपको जनवाया जायेगा। परजा अपने राजा के लिए एतना तो करिये सकती है न!

ये खाली आपके साथ नहीं हो रहा है, सब राजा लोग के साथ हुआ है, अतः इसको अपने ऊपर तो लेबे मत कीजियेगा।

आपका निश्चय यात्रा ‘आरा’ आ रहा है। इहें हमारा घर पड़ता है। आप आ रहे हैं, सब स्टेट रोडवा चकचकाता हुआ मिलेगा। स्कूल-कॉलेज मस्त, एकदम लीपा-पोता हुआ। अस्पताल में रोज़ से जादे मरीज दिखेंगे, स्कूल में रोज़ से जादे लइकन। पार्क-सार्क बनल मिलेगा। पेड़-वेड़ रंगल मिलेगा। ट्रैफिक तो एकदम सरसरा के भागेगा। पुलिस अंकल ना वर्दी में पैसा लेते दिखेंगे, ना ही बिन वर्दी वाला से लिवाते दिखेंगे। हमलोग का वश चला तो एककगो चिरईं को भी दाना दे दें, ताकि कम से कम आपके आने पर सुनर से चहचहाये। गऊ माता जो एन्ने-उन्ने चरती दिखती हैं, सब एक लाइन में चरेगी। एकदम खुशनुमा ना दिखे समां तो कैसा स्वागत! है कि नै!

ई शराबबंदी वाला जो हुआ न, मानव सृंखला जो बना, बहुते गज़ब था। मतलब मज़ा आ गया। सही चीज़ हुआ है बिल्कुल। बाकिर जानते हैं, अंदर के बात तो ई है कि नशा का खाली रूप बदला है, बन्द थोड़े हुआ है। दवा दुकान वाले बताते हैं अचानक से कोरेक्स पीने वाले लोग बढ़ गए हैं, अल्प्राजोलम से नींद पाने वाले बढ़ गए हैं। पहले गुमनामी की ज़िंदगी जीने वाली दवाएं जैसे एक्सटेसी, हैश, एलएसडी, आइस, एफड्रइन, मारीजुआना, हशीश कैथामिन, चरस, नारफेन, लुफ्रिजेसिक, एमडीएमएस अचानक से मशहूर हो गईं हैं। बड़े-बड़े लोग कोकीन के सहारे और मध्यम वर्गीय लोग कैथामिन के सहारे पर टिक गये हैं। गरीब भी नशा करने में अमीरों की बराबरी करने से नहीं चूकते, उनके लिए तो एक्सटेसी, एसिड, स्पीड, हेरोइन आदि एैसे नशीले पदार्थ भी तो उपलब्ध हैं ही। न्यूज़ वाले कहते हैं “पहले बिहार नशीले पदार्थों का उत्पादक हुआ करता था, अब बिहार ही इसका बाज़ार बन चूका है”। नेपाल, बांग्लादेश के रास्ते से आसानी से इसकी तस्करी हो रही है।

गुटखा-सिगरेट तो लॉन्ग टर्म में जान लेते हैं नीतीश बाबु, मगर ई खतरनाक दवाओं से जान तो आजे-कल में न जायेगा।

आप भी कहेंगे कि क्या हँसुआ के बियाह में खुरपी के गीत गाने लगे हम भी। अब नशाबंदी के समर्थन में पूरा बिहार से 3 करोड़ से जादे लोग लाइन लगा के खड़ा हो गया, तब भी हमको नशा ही नशा दिख रहा है। अँधेरे की तरफ मुड़ चुके युवा ही दिख रहे हैं। बाकी कलाम बाबा कह के गये हैं न “सफल होना बड़ी बात नहीं, उसे बरकरार रखना बड़ी बात है”। और जब आप सफल हो रहे हैं तो इस सफलता को बनाये रखने की उम्मीद भी तो आपसे ही की जायेगी न।

खैर! एगो-दुगो और बात है! कह दें?

पिछले साल रोड बनाने में बिहार भारत का नंबर वन राज्य रहा। लेकिन राष्ट्रीय राजमार्गों की हालत खास अच्छी नहीं दिखती। अब देखिये न, NH30 तो जेतना बना नहीं है उतना टूटा ही हुआ है। आप कहेंगे ये बिहार सरकार के जिम्मे नहीं, मगर लाखों लोगों का राह है ये साहेब! कमर भी सड़क जैसा ही टूटने लगा है लोगों का!

पटना बिहार की राजधानी है। बड़ी खुस हैं हमलोग, परकासपर्ब में आये लोगों ने पटना की बड़ी तारीफ करी। मगर पटना से बाहर निकलते ही ये छवि धुमिल हो गयी न साहेब।

खाली पटना, गया और राजगीर ही तो बिहार का हिस्सा नहीं है न! इतना कुछ है और भी जिलों भभुआ, वैशाली, भागलपुर, मिथिलांचल, बेगुसराय आदि में, उसका कुच्छो सोच रहे हैं का साहेब? ऊ का है कि हमको भी तो लगना चाहिए न, हमपर भी नज़र है हमारे राजा की!

बिहार की तरक्की से मन गदगद है वैसे, इसको बनाये रखने की गुज़ारिश के साथ

भारतीय गणतंत्र की जान
आपकी विश्वसनीय एवं मासूम प्रजा

आपन बिहार से आपकी जनता!

नोट- अशुद्धियाँ जानबूझ के की गईं हैं। क्षमा करते हुए भावसंगत होने की कृपा करें।

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