कोरोना के दौर में बिहार की स्वास्थ व्यवस्था से जुड़े कुछ मूलभूत प्रश्न व सुझाव

चिकित्सा व्यवस्था में एक शब्द सबसे ज्यादा प्रचलित है और वह है ‘रेफर’ और यह शब्द कही ना कही उस व्यवस्था में कमी व अकुशलता का घोतक है

बिहार सरकार स्वास्थ के कई मोर्चे पर कोरोना महाबीमारी के साथ लड़ रही है और हम सबको इस लड़ाई में सरकार के साथ है। लेकिन हमें यह आकलन करना होगा की अगर राज्य की वर्तमान स्वास्थ सेवाएँ संबन्धित प्रयास से हम कोरोना को मात दे भी दें, तो क्या राज्य की स्वास्थ्य चिकित्सा सेवाएँ खास कर ग्रामीण चिकित्सा सेवाएँ उस लायक है की आगे आने वाली कोई महाबीमारी से लड़ा जा सके। राज्य की चिकित्सा सेवाओं का जाल पंचायत स्तर तक फैला हुआ है, लेकिन पंचायत व प्रखण्ड स्तर पर मौजूद स्वास्थ केंद्र की स्थिति क्या है हम सब जानते है? जिला स्तर पर ही बमुश्किल से चिकित्सा की मुलभूत सेवाएँ जनता प्राप्त हो पाती है।

चिकित्सा व्यवस्था में एक शब्द सबसे ज्यादा प्रचलित है और वह है ‘रेफर’ और यह शब्द कही ना कही उस व्यवस्था में कमी व अकुशलता का घोतक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार 400 आबादी पर एक नर्स होनी चाहिए लेकिन बिहार मे यह 5000 से अधिक व्यक्तियों पर एक नर्स है। इसी प्रकार 1000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन राज्य में संख्या 18,000 की आबादी पर एक डॉक्टर है जबकि देश मे 11,082 आबादी पर एक डॉक्टर है। राज्य में एक लाख लोगों पर अस्पताल का एक विस्तर है।


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राज्य में एलोपैथिक डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति पर बात करें तो राज्य मे कुल 11,734 पद स्वीकृत है, जबकि 6000 के करीब ही डॉक्टर है। इसमे भी करीब 2000 डॉक्टर कांट्रैक्ट पर और 2300 स्थायी है। बिहार में प्रथम रेफेरल यूनिटों में से केवल 15 प्रतिशत ही काम कर रहे है जबकि इन पर स्थानीय ग्रामीण सेवाओं का पूरा भार टीका होता है। बिहार में स्वास्थ सेवाओं की सुविधा कुछ शहरों तक सीमित रह गई है जिसमे पटना, भागलपुर, दरभंगा प्रमुख रूप से शामिल है। वह भी इसलिए की इन शहरों में सरकारी मेडिकल कॉलेज स्थापित है। हालाँकि यहाँ से भी स्वास्थ सेवाओ की कमी की खबरे आते रहती है फिर भी राज्य के बहुत बड़ा आबादी इनपर ही आश्रित है।

नीति आयोग की ओर से जारी किए गए हेल्थ इंडेक्स ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। इस इंडेक्स के मुताबिक़, स्वास्थ्य के मामले में 21 बड़े प्रदेशों में बिहार को 20 वाँ स्थान प्राप्त हुआ।

इंडेक्स से साफ़ ज़ाहिर होता है कि उत्तर भारत के राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट अधिक गहरा है. रिपोर्ट के अनुसार संदर्भ वर्ष 2015-16 की तुलना में 2017-18 में स्वास्थ्य क्षेत्र में बिहार का संपूर्ण प्रदर्शन सूचकांक 6.35 अंक गिरा है। इसका एक प्रमुख कारण कारण बिहार सरकार के बजट मे स्वास्थ बजट में कमी लाना भी है।

पॉलिसी रिसर्च स्टडीज़ (पीआरएस) का एक रिपोर्ट बताती है की 2016-17 वर्ष मे स्वास्थ बजट 8,234 करोड़ था, वही 2017-18 वर्ष के बजट मे यह खर्च घट कर 7,002 करोड़ हो गई। लगभग 1000 करोड़ की कटौती। शहरी स्वास्थ सेवाओं पर बजट में 18 प्रतिशत की कमी आती है और ग्रामीण स्वास्थ बजट में 23 प्रतिशत की कमी आती है।

बिहारवासियों को सोशल डिस्टेन्सिंग या फ़िज़िकल डिस्टेन्सिंग क्यों जरूरी है?

मेरा मानना है की राज्य की इन स्वास्थ सेवाओं के लचर व्यवस्था के पीछे कही ना कही हम जनता ज़िम्मेवार है क्योंकि स्वास्थ सेवा हमारे लिए चुनाव में कोई मुद्दा रहता ही नही। जबतक तक हम अपने मूलभूत सुविधाओं के प्रति जागरूक व सचेत नही होंगे और सरकार से इन सुविधाओं के मांग नहीं करेंगे तब तक सरकार इन मुद्दों की ओर आकर्षित नही होगी। इसलिए मेरा बिहारवासियों की सलाह है की  कोरोना से बचाव का एक मात्र उपाए सोशल डिस्टेन्सिंग या फ़िज़िकल डिस्टेन्सिंग ही है।

एक अँग्रेजी की कहावत है “prevention is better the cure” लेकिन बिहार के संदर्भ में अगर मैं इस कहावत में बदलाव कर यह कहूँ  “prevention is only one option” क्योंकि cure होने के लिए आपके पास कोई व्यस्व्था नही है।


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स्वास्थ व्यवस्था संबन्धित जनता से मेरा प्रश्न

“बिहारवासियों से यह अपील है कि वे अपने परिवार के साथ घर मे ही बन्द रहे और सरकारी आदेश का कड़ाई से पालन करें। क्योंकि इटली जहाँ की चिकित्सा व्यवस्था सबसे अच्छी मानी जाती है वहाँ पर सरकार व जनता के लापरवाही के कारण वहां मरीज इतने संक्रमित हो गए कि वहाँ की चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई। अपने राज्य की चिकित्सा व्यवस्था कितनी दयनीय है यह तो आप सब जानते ही होंगे। सोचिए आप लापरवाही करेंगे तो क्या हाल होगा आपका और आपके परिवार का। खासकर ग्रमीण क्षेत्रो के लोग अपने स्वास्थ्य का सबसे ज्यादा ध्यान रखे क्योंकि आपके ग्रमीण क्षेत्रो में स्वास्थ्य व्यवस्था कोरोना बीमारी से लड़ने के लिए नही बना है। इसलिए इस अदृश्य बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय खुद को घर के अंदर सीमित कर लें।

घर मे अपने परिवार के साथ रहने के दौरान यह भी सोचिए कि क्या आपने कभी अपने स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता, मुद्दे पर वोट दिया या निकट भविष्य में अपने मुलभुत मुद्दे पर वोट देंगे.? अगर नही तो इसके लिए कही न कही हम सब जनता भी जिम्मेदार है।

आप अपने जनप्रतिनिधियों से भी सवाल भी करे कि उन्होंने आपने क्षेत्र के शिक्षण संस्थानो व सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के विकास में क्या क्या काम किये विधायक व सांसद रहते हुए। क्यों आज आजादी के इतने सालों बाद भी एक प्रखंड स्तरीय अस्पताल अपने क्षेत्रों के मरीजों को राजधानी के अस्पतालों में रेफर कर देते है। क्या राज्य की सारी सुविधाएं राजधानी केंद्र में ही होनी चाहिए.? प्रखंड स्तर पर यह सुविधा नही होनी चाहिए? ऐसे प्रश्न आप अपने जनप्रतिनिधियों से आज सोशल मीडिया व आगामी चुनावों में जरूर पूछे।

वे जनता के टैक्सपेयर्स पैसे से अपना ईलाज देश व विदेशों में करवाते है और जो जनता टैक्स देती है उनका ईलाज की कोई गारंटी नही होती।

अभी आपके पास सवाल भी बहुत है और उस पर सोचने के लिए समय भी। कृपया विचार करें घर मे खुद को सुरक्षित रखते हुए”।

राज्य में संक्रमण न फैले इसके लिए सरकार को सुझाव

कोरोना के संक्रमण से बचाव हेतु सरकार के प्रयास को सफल बनाने हेतु मेरा यहाँ कुछ सुझाव है जो राज्य को कोरोना से लड़ने में काफी मददगार साबित हो सकता है। इस कोरोना महामारी में बाहर के मजदूरों को अपने गृह राज्य लायाजा रहा है तो इस स्थिति में एक सामाजिक वैज्ञानिक होने नाते मेरा सुझाव सरकार से जुड़े नीति निर्धारको के लिए कुछ इस प्रकार है.:-

सर्वप्रथम जो प्रवासी या निवासी बाहर प्रदेशों लाया जा रहा है उसके लिए सरकार ने उचित स्वास्थ्य पैमाना बनाया होगा । इसमे दौरान मेरा सुझाव यहि है की उन लाये जा रहे प्रवासियो को जाँचके दौरान उनके पहने गए चप्पलें व जूते वही फेक दिए जाए या उनको पूरी तरह सेनिटीज करने के बाद उनकी यात्रा करवाई जाए। क्योंकि विगत कुछ अध्ययन के दौरान यह देखा गया हौ की यह बीमारी जूतेव चप्पलों से भी फैल सकती है।

दूसरा यह की जो प्रवासी मजदूर राज्य में आ रहे है उनको कम से कम 28 दिन का क्वारंटीन पीरियड में रखा जाए। क्योंकि बहुत सारे अध्ययन यह दिखाते है की बहुत सारेलोगोमें यह लक्षण 14 दिनके बाद ही परिलक्षित होता है। इसका ताजा उदाहरण दूसरे लोकडौनके दौरान राज्य की बढ़ती कोरोना संक्रमण मरीजो की संख्या है।

तीसरा, जो प्रवासी मजदूर आ रहे है उनके रखने हेतु जो क्वारंटीन सेंटर में गाँवों मे या अन्य जगहों में बने हुए है उनमें उनके खाने के लिए स्टील के थाली के जगह पत्तो से बना पत्तल वाला प्लेट का प्रयोग किया जाए ताकि उनके खाने के बाद उसे जलाया जा सके। पेड़ के पत्तो वाला ही क्यों थेर्मोकोल वाला क्यों नही?.. तो थेर्मोकोल से वातावरण दूषित होता है और अगर उसे नही जलाया गया स्थानीय जानवरों के पत्तल में बचे खाने को चाटने के दौरान यह संक्रमण की फैलने की सम्भवना बनी रहती है।


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अंततः बिहार के जनता से अपील बा…

“रउवा सब से अपील बा की आप सभी सरकार के स्वास्थ सेवाओं के भरोसे मत बैठी जा, काहे की सरकार रउआ सब के भरोसे बईठल बा अउ  आप सबहिं लोगो के सहयोग मांगता। जब आप अनेरिये बात पर वोट दे दिहिला ई समय त सच मे और सही बात पर सहयोग मांगता सरकार। सबहीन रउआ लोगो से अपील बा अपने अपने तरफ से पूरा सहयोग करी सरकार के। सरकार अउ डॉक्टर जइसन कहता रउआ सब ओइसही करी।  काहे के सरकार के रउआ सबहिं के बहुत चिंता बा।”

लेखक – जोखन शर्मा (पीएचडी शोधार्थी, ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय)

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