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हर साल बिहार बोर्ड के रिजल्ट आने पर अपना मुंह फाड़ के चिचियाने वाले लोग, जरा सुनों

पिछले तीन सालों से देख रहा हूँ कि बिहार बोर्ड सम्बंधित किसी भी रिजल्ट के आने के तुरंत बाद मीडिया और कुछ ज्यादा ही बौद्धिक टाइप के बाहरी लोग हो-हल्ला मचाना शुरू करते हैं, बिहार के शिक्षा व्यवस्था का मजाक उड़ाते हैं और ट्रोल करते हैं। शिक्षा व्यवस्था पे प्रश्न से दिक्कत नहीं है, ये तो स्वतः जगजाहिर है कि किन हालातों में पढ़के बिहारी छात्र बाहर आते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं| लेकिन जब आप शिक्षा व्यवस्था पे सवाल के स्थान पर आप बिहारी छात्रों का मजाक बनाने लगते हैं या उनकी डिग्री के विश्ववसनियता पर सवाल कर देते हैं तो कष्ट होता है।

साहब, आपको मजा आता है किसी रिजल्ट के तुरंत बाद दुनिया को कैटेगरीकली ये बताने में कि “अरे, बिहार से पढ़ने वालों की डिग्री का क्या भरोषा? जरूर सेटिंग करके पास किए होंगें या चोरी-चीटिंग ही इनके पास होने का जरिया रहा होगा”। हाँ, मानते हैं की कुछ लोगों ने ऐसा किया होता है और वो गलत हैं लेकिन उनके कारण पूरे बिहार के छात्रों को या उनकी डिग्री-मेहनत को गलत कह देना कहाँ तक सही है? आप कितना जानते हैं कि किन स्थितियों में बिहारी छात्र पढ़के आते हैं? कभी पहले आपको चिंता होती है की कैसी व्यवस्था के तले वो अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं?

साहब, बिना मास्टर के भी कई स्कूल चलती हैं हमारे यहाँ। कई जगह कमरा नहीं होता तो पेड़ के नीचे या खुले आसमान के नीचे भी बोरा-चटाई बिछा के पढ़ते हैं हमारे छात्र। पीने का पानी-शौचालय तक की सुविधा नहीं होती। आपके या आपके बच्चों के स्कूलों-ट्यूशनों में पंखे-ऐसी के बिना पढाई नहीं होती होगी लेकिन हमारे गांवों के स्कूलों में बिजली छोड़िए लायब्रेरी-लेबोरेटरी-स्पोर्ट्स-बेंच-डेस्क तक नहीं होती।

हमारे यहाँ कई बच्चे खेती-बाड़ी के साथ-साथ पढाई करते हैं, भैंस-बकरी भी चराते हैं और स्कूल भी जाते हैं। इतनी मेहनत और त्याग-लग्न से पढ़के वो नम्बर लाते हैं, जरा सा खुश होते हैं तभी पता चलता है की देश के मीडिया ने एक ऐसा माहौल बना दिया है की जैसे बिहार से पढ़के आने वाले सारे छात्र और उनकी डिग्रीयां फर्जी है।

सोचिए उस बच्चे के मन पर क्या गुजरता होगा…कई बच्चे जो मेरिटोरियस होते हैं उनके गारजीयन को लगता है कि यहाँ के व्यवस्था में तो उनके बच्चे पढ़ नहीं पाएंगे, इसलिए वो अपने बच्चों को दिल्ली-कोटा आदि जगहों पर भेजते हैं न की शौक से। और वहाँ से भी जब रातें काली करके बच्चे पढ़ते-लिखते हैं और सफलता पाते हैं तब आपको अटेंडेंस आदि सूझने लगता है। आप ही बताइए की करें क्या वो बच्चे ?

तब आप ये तर्क बिल्कुले मत दिजिएगा कि इसी से तो व्यवस्था सुधरेगा, आपको व्यवस्था की फिक्र होती तो आप बांकी दिनों में स्कूलों में जाते| और वहाँ की व्यवस्था पर लिखते-बोलते या कुछ करते| आप सरकार को घेरते न की बच्चों को टारगेट करते। कितनी बार आप जैसे लोग साथ आते हैं जब हम विश्वविद्यालय सुधार के लिए प्रयास-आंदोलन करते हैं? हमारी किस्मत पे कुछ चोर-नालायक नेतालोग क्या बैठ गए, आप हमसबको फर्जी कहने लगिएगा?

इसलिए ये सब छोड़ दीजिए, ये सब आपके लिए सिर्फ मौका होता है। आप अपने साथ काम कर रहे उन बिहारियों का बस मजाक उड़ाते हैं या नीचा दिखाना चाहते हैं जिनके सामने प्रोफेशनली आप टीक नहीं पाते। इतना ही शक हो बिहारी शिक्षा व्यवस्था-डिग्रीयों और कैपेबिलिटी पर तो अपने ही आसपास के किसी भी परेल्लेल पोजिसन्ड बिहारी के पास बैठ जाइएगा और एक घण्टे का सेशन रख लीजिएगा। कैरीकुलर-प्रोफेशनल-फील्ड या टेक्निकल नॉलेज के अलावा एक ही घण्टे में आपको राजनीति-इतिहास-भूगोल-साहित्य-विज्ञान-ज्ञान-अध्यात्म और असली जीवल का अनुभव तक सब समझा देगा।

बांकी जिसको बेसी दाबी है, आ जाइएगा हवेली पे। आप होंगें, हम होंगें और कैमरा साला लाइव होगा|

– आदित्य मोहन 

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