मुख्यमंत्री उम्मीदवार पुष्पम प्रिया चौधरी क्या बदल पायेगी ‘बिहार विधानसभा चुनाव 2020’ परिणाम?

पुष्पम प्रिया चौधरी खुद को बिहार चुनाव 2020 के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार घोषित कर बिहार के लोगों से जुड़ने के भरपूर प्रयास में है

कुछ दिनों पहले फेसबुक फीड चलाते हुए देखा कि चाचा जी ने कोई ‘पुष्पम प्रिया चौधरी’ नाम का पेज लाईक किया है। फिर दो दिन बाद दिखा कि वो पेज क्लास की एक लड़की, प्रोफेसर और कुछ रिश्तेदारों द्वारा भी लाईक कर दिया गया है। मन में सवाल आया आखिर ये है कौन जिसे सब लोग (जो बिहार से है) पसंद कर रहे है? फिर शुरू हुई जांच-पड़ताल।

पेज खोलकर देखा तो पाया कि हज़ारों की तादाद में लोगों ने उस पेज को पसंद और फोलो किया है। काला शर्ट-पेंट पहनें, मास्क लगाए एक लड़की बिहार के गांव-गांव जाकर लोगों से बात-विमर्श कर रही, उनके साथ की फोटों व अपने द्वारा किए गए काम व विचारों का लेखा-जोखा अपने इस पेज पर रोज़ाना अपलोड कर रही है ताकि ज़मीनी सतह पर पहचान बनाने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी अपने नाम और काम का परचम लहराया जा सके। और यह पैंतरा अक्सर अपनाया जाता है उन उम्मीदवारों द्वारा जिसे राजनीति में अपना हाथ आज़माना हो।

बिहार हमेशा से भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अहम मोहरा रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा जनपद में बंटे शासकों को एकत्र कर भारत के रूप में संगठित करने से लेकर शेरशाह के मुगल शासक हुमायूं को चुनौती देने, आपातकाल में ढकेलने वाली काँग्रेस की राजनीति या प्रधानमंत्री के विजय रथ को चुनौती देने तक, बिहार एक हुकुम के इक्के की तरह हमेशा कारगर साबित हुआ है।

इतिहास का चक्र एकबार फिर से बिहार के लोगों के पास वापस आ पहुंचा है, जहां बिहार के लोगों को तय करना है कि भारत के साथ-साथ उनके राज्य का भविष्य कैसा होगा?

और इसी भविष्य को सकारात्मक व उज्जवल बनाने के वायदें करती हुई पुष्पम प्रिया चौधरी खुद को बिहार चुनाव 2020 के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार घोषित कर बिहार के लोगों से जुड़ने के भरपूर प्रयास में है।

बिहार के चुनाव के दृश्य को रोचक बनाने वाली यह युवा नेता जनता दल (यूनाइटेड) के नेता और विधान परिषद के सदस्य (MLC) रह चुके विनोद चौधरी की बेटी हैं और लंदन के मशहूर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से इन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री ली है।

यूं देखा जाएं तो अक्सर बिहार में पितृसत्तात्मक विचारधारा का बोलबाला है। लड़कियों का राजनीति पर बोलना या तो बदतमीज़ी माना जाता है या फिर अनसुना कर दिया जाता है। ऐसे में पुष्पम का एक नेता के रूप में उभरना बिहार की महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण और प्रेरणा का स्रोत है।

लेकिन, पर, किंतु, परंतु!

बिहार की राजनीति और चुनाव पर बात हो और धर्म/जाति का झुनझुना नहीं बजाया तो क्या खाक राजनीति हुआ। यूपी-बिहार ऐसे राज्य है जहां उम्मीदवार का जीत उसका जाति पर निर्भर करता है। “विकास” की बातों का अर्थी सजाकर अक्सर जाति/धर्म के मुद्दों को अमृत पिलाया जाता है। जिसका परिणाम बिहार की जनता पलायन, भुखमरी और बेरोजगारी के रूप में प्राप्त कर रही है। फिलहाल, पुष्पम जाति व धर्म के तवे पर रोटी सेकने के बजाए “बिहारी विचारधारा” और खेती, उद्योग, धरोहर, शिक्षा, स्वास्थ्य, बच्चों/महिलाओं/वृद्धों के मसलें पर ज़ोर दे रही है। जिसे चुनावी मौसम में अक्सर दूसरे पायदान पर पाया जाता है, पहला आप जानते ही है।

बिहार की जनता जदयू, आरजेडी, बीजेपी और काँग्रेस सबको मौका दे चुकी है लेकिन आज तक इंडस्ट्री, शिक्षा, हेल्थ, सुरक्षा, काम के लिए पलायन और भ्रष्टचार जैसे बड़े मुद्दे पर कोई खास काम नहीं हुआ। सारी पार्टियां अपने इन सब वादों पर एक बार भी सफल न हो पाई। ऐसे में बिहार राज्य का कुछ वर्ग एनडीए और महागठबंधन से इतर नए विकल्प की ओर देख रहा है। और इसी चाहत ने पुष्पम जैसी नई युवा नेता की उम्मीदों को बल दिया है, जो चार महीने में बिहार और इसके 243 क्षेत्र और 72000 बूथ जीतने के सपने लिए लगातार कोशिशें कर रही है।

“बिहार को गति चाहिए, बिहार को पंख चाहिए, बिहार को बदलाव चाहिए।  क्योंकि बिहार बेहतर और बेहतर का हक़दार है।” इन शब्दों के साथ “प्लूरल्स” पार्टी पुष्पम प्रिया चौधरी के नेतृत्व में बिहार 2020 के चुनावों में मतदाताओं के लिए एक विकल्प के रूप में मौजुद रहेगा।

इस पार्टी का चिन्ह् एक सफ़ेद घोड़ा है जिसपर पंख लगे हैं। ग्रीक मिथक में इसे ‘पेगासस’ के नाम से जाना जाता है। इस घोड़े की खासियत थी कि वह ज़मीन पर दौड़ने के साथ-साथ आसमान में उड़ भी सकता था। इसे शक्ति और तीव्रता का प्रतीक माना गया है।

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चुनावी मौसम में “विकास” की शहनाई हर कोई बजाता है पर चुनाव के बाद “विकास” की मईय्यत में कोई शामिल भी नही होता। बिहार का भविष्य बिहारियों के हाथों में है। देखना काफी रोचक होगा कि कौन यह बाजी मारता है, लगातार 15 वर्षों तक राज करने के बाद भी नीतीश कुमार द्वारा नई पीढ़ी के वोटरों को 15 वर्षों के ‘पति-पत्नी के राज’ की ‘अराजकताओं’ की जानकारी दे कर या पुष्पम प्रिया चौधरी द्वारा बिहारी विचारधारा और विकास के मुद्दों को बढ़ावा देकर।

फिलहाल, हर बिहारी केवल यही चाहता है कि बिहार को दौड़ानें और उड़ाने से पहले कोई उसे अपने पैरों पर चलने के काबिल बना दे।

शिल्पा कुंवर 

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