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बिहार का भोज जिसमें पानी परोसने के लिए बच्चों में तो जूठे पत्तल उठाने के लिए बड़ों में होड़ मचती है

भोज, हकार और बीजे, ये तीन शब्द हमारे गाँव में होने वाले भोज से संबंधित है। भोज मतलब पार्टी। ज़मीन पर बैठना, केले के पत्तल पर खाना और अपने घर से ले गए लोटे या गिलास से पानी पीना, ये तीन इस भोज की खासियत होती है। ऐसे भोज चंद हलवाई और ग्रामीण के सहयोग से आयोजित होता है, जिसमें पानी परोसने के लिए बच्चों में तो जूठे पत्तल उठाने के लिए बड़ों में होड़ मचती है। लोग तबतक खाना शुरू नही करते जबतक की हर पत्तल पर खाना न परोस दिया जाए और यह तबतक खत्म नही होती थी जबतक कि आखिरी व्यक्ति भी खाना न खाना छोड़ दें।

 

“होए जय ठाकुर” से शुरू होने वाले इस भोज में हर व्यंजन क्रमानुसार परोसे जाते है और खाने वाले व्यक्ति को यह पता भी नही होता कि अगला आइटम क्या आने वाला है। इस भोज का निमंत्रण कार्ड से नही, भोज देने वाला घर घर जाकर खुद देता है या फिर किसी से दिलवाता है। इस दावत देने के तरीके को “हकार” बोलते है। ये हकार भी कई तरह का होता है- (1) घर जाना, (2) समदरका (3) चुल्हियालेबार ।

घरजाना में प्रत्येक घर से एक व्यक्ति निमंत्रित होता है। इस टाइप के भोज के दिन हर घर में बच्चें बिचारे ठगे महसूस करते है क्योंकि इसमें कोई एक ही जाता है और अमूमन मौका बड़े सदस्य को मिलता है। हम तो कई बार लंकाकाण्ड शुरू कर देते थे बालकाण्ड के दौर में। समदरका में सभी पुरुष सदस्य आमंत्रित होते है। चुल्हियालेबार का शाब्दिक अर्थ यह है कि आज घर में चूल्हा नही जलेगा, बल्कि नीप पोत के महिलाएं भी भोज में शामिल होंगी या फिर उनके घर खाना आएगा।

 

….लेकिन केवल हकार से काम नही चलता। गाँव में लोग तबतक खाना खाने नही जाते जबतक की उन्हें “बीजे” की आवाज नही सुनाए दें। मुझे अच्छी तरह से याद है, गांव में दो चार ऐसे व्यक्ति होते थे, जिनकी आवाज़ में दम होता था। वो किसी की छत पर चढ़कर तेजी से आवाज़ लगाते- “बीजे भेलौ हो भाईलोग!” यह आवाज़ सुनते ही लोग घर से लोटा/गिलास लेकर निकल पड़ते थे। लाउडस्पीकर ने इस “बीजे” परंपरा को ही नष्ट कर दिया। या तो अब होता नही, होता है तो माइक से ही काम चलाते है। अब उतनी उत्सुकता भी नही रहती। एक रोमांच होता था उस बीजे की आवाज़ सुनने के बाद, नई पीढ़ी उसे महसूस ही नही कर पाएगी कभी। बीजे खत्म हुआ, अब डीजे आ गया। इतना शोर होता है अब शादियों में कि रात में मंगल गीत नही, फ़िल्मी गाने सुनाए देते है। पिछले एक दशक में इन गीतों में भी बदलाव हुए।

शारदा सिन्हा जी की मनमोहक गीत आधी रात में भी बजती थी तो बड़ी सुहावनी और मन को सुकून पहुंचाने वाली होती थी। अब उटपटांग भोजपुरी गीत या कानफोड़ू बॉलीवुड के गानों के साए में शादियां होती है, लाउडस्पीकर के जरिये लोगों को रातभर जगाया जाता है। मैं पिछले 4 वर्षों से 50 से 100 व्यक्तियों का कम से कम 200 से भी अधिक आयोजन करवा चुका हूँ, मुझे लाउडस्पीकर से इतनी चिढ़ है कि मजबूरीवश दो चार बार इस्तेमाल किए, वरना कभी नही करता। लाउडस्पीकर ने परंपराओं को तो खत्म किया ही, उत्सवनुमा प्रत्येक आयोजन के मर्म और विधि विधान को शोर शराबें में नष्ट कर दिया। मंदिरों में समूह की आवाज़ जब कानों में पहुँचती है, सुकून और शांति मिलती है। लाउडस्पीकर ने इसे कर्कश बना दिया है।

 

-अभिषेक रंजन, सामाजिक कार्यकर्ता

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