बिहारी घूर: आ गईलाs, भागs तारे कि न, अपना दुआवरा पर घुर न लगावे के?

कंपकपाती ठंड! गाँव में बबवा के सबसे बड़का घुरा का घमंड! बुढवा सबके दुवार पर से भी बहारन सोहारन बिटोर के अपने दुवारी पर अलाव के एवरेस्ट का पहाड़ खड़ा कर देता| रात में जानबूझ के घुर नहीं फुकता कि कही कोई रात में खोरखार के ताप नहीं जाए| सबेरे होते ही बबवा देह पर कम्बल ओढ़े जैसे माचिस का तीली टिपता, मनोजवा दोनों हाथ मलते हुए बैठता-“बाबा खैनी खिलावs मरदे?”

“आ गईलाs भागs तारे कि न, अपना दुआवरा पर घुर न लगावे के? “, बुढवा पिनिक के बकबकाने लगता तबतक पूरा गाँव का भीड़ ही उसके घुर को घेर के बैठ जाता|

“अरे बाबा तो पूरा धधोर कर दिए, जियो बाबा रे सोनुआ पतलो लाओ, साला धधोर खत्म हो गया”, मनोजवा फिर से पछुआडा सेकते हुए चिल्लाता| तबतक बबवा का पोता सोनुआ अपने बोरा में से बटोरा हुआ आम, लीची का पत्ता उझिल देता है| आग की थोड़ी सी धीमी लौ में, धुए से कुलबुलाए अब बबवा मन ही मन कुढ़ते हुए सोनू को चिल्लाता – “रे सोनुआ! अलुआ पका ले|” तबतक नाक से पोटा पोछते सोनू महराज अलुआ घुर में घुसा देता| फिर मनोजवा सोनुआ की तरफ देख के धीरे से मुस्कुराते हुए पूछता – “अच्छा सोनू तोहरा आँख से धुआ निकाल दे?”
“चुप साले!आँख से कही धुआं निकलता है?” सोनुआ चिढ जाता तब तक मनोजवा घुर से एक लुती निकाल के सोनुआ को निचे से दाग देता| अब सोनुआ का रोने का स्पीकर स्टार्ट और आँख से लोर का धुआं भभकाना स्टार्ट हो जाता ….

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