बिहारी फिल्म उद्योग का भगीरथ कहे जा रहें आइएएस गंगा कुमार से ‘आपन बिहार’ की विशेष बातचीत

सिर्फ 22 साल की उम्र में आईएएस की कठीन परीक्षा पार करने वाले गंगा कुमार अब बिहार राज्य फ़िल्म विकास एवं वित्त निगम के एमडी बनकर बिहार की छवि सुधारने में अहम योगदान दे रहे हैं। बिहार, जहाँ आने से यहीं के एक्टर्स डरने लगे थे, वहाँ कई बड़े इवेंट्स ऑर्गेनाइज़ कराकर गैर बिहारी स्टार्स को भी बिहार आने को मजबूर करना कोई आसान काम नहीं। शायद यही वजह है कि पटना फिल्म महोत्सव के बाद इन्हें ‘बिहारी फिल्म इंडस्ट्रि का भागीरथ’ भी कहा जाने लगा है। यह नाम इन्हें मीडिया ने नहीं वरन् भोजपुरी के सुपरस्टार रवि किशन ने दिया है। इनके प्रयासों,समर्पण और कर्तव्य निर्वहन करने के संकल्प से इन्होंने सभी नामचीन हस्तियों को प्रभावित और प्रेरित किया है। बिहार की विरासत पर अब तक पाँच किताबें भी लिख चुके हैं।

गंगा कुमार और उनकी पत्नी स्नेहा

गंगा कुमार और उनकी पत्नी स्नेहा

 

इतना ही नहीं, अपने आईएएस की सरकारी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए गंगा कुमार जी कई गैर सरकारी संगठनों से जुड़कर अपनी सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारियाँ भी निभा रहे हैं। बिहार समेत पूरे भारतवर्ष की समृद्ध संस्कृति और वैभवपूर्ण गौरवशाली इतिहास को संरक्षित रखने की संभावना तलाशते श्री गंगा कुमार कैंसर पीड़ितों के लिए भी एक जीवन की तलाश को प्रयासरत हैं। जीवनसाथी के रूप में प्राप्त श्रीमती स्नेहा कैंसर पीड़ितों की जिंदगी में हौसला की प्रेरणा देने के लिए ‘हौसला’ नामक संस्था भी चलाती हैं।

आईएएस गंगा कुमार पटना फिल्म फेस्टिवल के सफल आयोजन के बाद से एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इसके बाद बोधगया विनाले को लेकर निरंतर व्यस्त हैं। ये हमेशा कहते हैं “या तो मैं काम कर सकता हूँ, या फिर इंटरव्यू ही दे सकता हूँ”। सात दिनों तक चले महोत्सव के बाद गंगा कुमार जी ने ‘आपन बिहार‘ से कई मुद्दों पर विस्तृत बात की है। पेश है कुछ अंश-

 

Ganga kumar

प्रश्न- पटना फिल्म फेस्टिवल के बाद आपको बिहारी फिल्म इंडस्ट्री का भागीरथ कहा जाने लगा है। क्या कहेंगे आप इस पर?

 

गंगा कुमार- आपलोगों ने मुझे बिहारी फिल्म इंडस्ट्रि का भागीरथ कहा इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद! लेकिन मैं कोई भागीरथ नहीं हूँ। वो एक महान हस्ति थे, मैं एक छोटा सा हस्ति हूँ। सरकार का जो निर्णय होता है, उसी निर्णय के आलोक में एक ‘रेस्पोंसिबल सिटिजन’ और ‘रेस्पोंसिबल सिविल सर्वेंट’ के तौर पर मेरी जिम्मेदारी है। मैं कोशिश किया हूँ कि जो भी बेस्ट पॉसिबल वे में हो सकता है, वो हम करें।

 

प्रश्न- Pff को सफल बनाने में किन-किन चुनौतियों का सामना करना पडा?

 

गंगा कुमार- हर अच्छे काम में चुनौती आती है और आती रहेगी। हमारा कर्म होता है उन चुनौतियों का डट कर सामना करें और उसको सॉल्व करें।
इसबार मेजर चुनौती थी कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ें, फिल्म देखने की आदत डालें, लोगों में आर्ट एंड फिल्म के बारे में समझ बनाएँ, बॉलिवुड के इमिनेंट पर्सनालिटी से जनता को रूबरू कराएँ।
इसके अलावा इंट्री सिस्टम के बारे में लोगों का कहना था कि इंट्री पर पैसा रखेंगे तो लोग नहीं आयेंगे। मैं हमेशा कहता था कि कहीं भी आप देखो, सब जगह इंट्री फी 1000-1200 होता है, हम 50 ₹ भी तो रखें 7 दिन के लिए, शुरूआत तो करें।
बिहार की धरती प्रतिरोध की जननी रही है, क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है, ऐसे में बहुत जरूरी है कि यहाँ के लोग भी नई चीजों को फॉलो करें।
हमें बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि 1100 से ज्यादा लोगों ने टिकट खरीद कर इंट्री किया है, ये हमारे लिए बहुत बड़ी एचिवमेंट है।
चुनौतियाँ और भी बहुत सारी हैं। अगली बार से पूरी प्लानिंग में पहले से तैयारी शुरू करें। मुझे लगता है इस बार पूर्णरूपेण नहीं कर पाया, कोशिश करूँगा अगली बार से कि यंग जेनेरेशन को भी जोड़ूँ और उनको कला एवं फिल्मों की समझ बनाऊँ, तभी हमारा राज्य तरक्की करेगा।

 

प्रश्न- आपकी संस्था बोधगया विनालय कराने जा रही है । यह बोधगया विनालय क्या है और इसका क्या मकसद है?

 

गंगा कुमार- बोधगया विनालय, हमारी संस्था है ‘कैनवास’, उसके द्वारा हमलोग बिहार में पहली बार करा रहे हैं। ये न सिर्फ बिहार में बल्कि पूरे हिंदुस्तान में कोच्ची विनालय के बाद बोधगया विनालय आयोजित हो रहा है। काफी अच्छा चल रहा है।
इसमें हमने करीब 90-91 कलाकार देश-विदेश से बुलाए हैं, 20 से ज्यादा देश के लोग पार्टिसीपेट कर रहे हैं। थीम में चार चीजें हैं- डिस्प्ले आर्ट एक्जीविशन, फिल्म ऑन आर्ट, डिस्कशन ऑन आर्ट, फ्यूचर ऑफ आर्ट।

Ganga kumar

प्रश्न- जैसा कि ‘बिहार’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जनक रहा है। बिहार अपने इन विरासतों को कैसे संरक्षित कर सकता है?

 

गंगा कुमार- बिहार की सभ्यता एवं संस्कृति महान रही है| दुनिया भर के सिविलाइज़ेशन की बात करूँ तो बिहार का कल्चरल सिविलाइज़ेशन और मोनुमेंटल सदियों पुराना है| कहीं न कहीं हमलोग सभ्यता-संस्कृति को साइड किये हैं या किसी कारणवश हुआ, जिसे, मुझे लगता है, पुनः दुरुस्त करने की जरूरत है एवं लोगों के बीच में इसको ले जाने की जरूरत है|
उसके लिए दो चीजें महत्वपूर्ण हैं- एक तो सिविलाइज़ेशन है क्या, ये लोगों को बताओ और इनसब चीजों को यंग जेनेरेशन के बीच लाओ| मुझे लगता है सरकार के साथ व्यक्तिगत रूप से हमसभी लोगों की नैतिक एवं सामाजिक जिम्मेदारी होती है कि इसको (सभ्यता एवं संस्कृति को) आगे बढ़ाएं|
हम लड़ाई-झगड़ा तो दिखाते हैं, मगर उससे ज्यादा जरूरी है सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत के बारे में प्रचार करें| इसके लिए दुनिया के विभिन्न कोने में फैले बिहारिओं को भी चाहिए कि वो अपने राज्य के बारे में प्रचार करें|

 

प्रश्न- बिहार के लोगों को व्यक्तिगत तौर पर अपने महान संस्कृति के अस्तित्व को बचाने एवं इसे प्रचारित करने के लिए क्या करना चाहिए?

 

गंगा कुमार- बिहार की मिट्टी ने आपको जन्म दिया है, इतना बड़ा बनाया है, इसका महत्त्व हमें समझना होगा| अगर आप सक्षम हैं तो नैतिक एवं सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि आप बिहार के लिए कुछ करें|

 

प्रश्न- बिहारी कालाकारों की कमी नहीं है मगर क्या कारण है कि उन्हें अपनी कला प्रदर्शनी के लिए दुसरे राज्यों पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ता है?

 

गंगा कुमार- बिहारी कलाकारों की कमी नहीं है| हर जगह बिहारी हैं और इनके संरक्षण की बहुत आवश्यकता है| संरक्षण नहीं होने के पीछे 2 कारण ही मुझे नज़र आते हैं- माहौल डेवेलोप करना और कल्चरल फीलिंग डेवेलोप करना| यकीन करें ये फीलिंग सिर्फ समाज ही क्रिएट कर सकता है|

 

प्रश्न- आप और आपकी संस्था कला और संस्कृति के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बहुत काम कर रही है। cancer के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए एक ‘हौसला‘ नाम की महीम भी चला रही है। इसके बारे में कुछ बताएँ?

 

गंगा कुमार- ‘ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन’ हमारी संस्था है जिसमें मेरी वाइफ ‘स्नेहा’ प्रेसिडेंट हैं| इसमें हमलोग चार एक्टिविटीज करते हैं| एक तो समय-समय पर गाँव में कैंसर जागरूकता अभियान चलाते हैं| डॉ. की टीम लेकर जाते हैं|
दूसरी एक्टिविटी आर्ट एंड कल्चर पर होता है, जो ‘बिहार एक विरासत’ संस्था के द्वारा हमलोग करते हैं| तीसरा एजुकेशन के फील्ड में स्किल डेवलपमेंट से जुड़ी एक्टिविटी है| चौथी एक्टिविटी है- ‘हौसला’| इसमें कैंसर पीड़ितों के लिए एक सपोर्ट ग्रुप है| बेसिकली इन हाउस प्लेटफार्म देते हैं कि कैसे आप खुद को खुश रखें| बहुत तरह की आर्ट एक्टिविटी कराते हैं| इसके अलावा कैंसर पीड़ितों के लिए अपना एक टोल-फ्री नंबर भी है- 1800-345626|
ये एक बहुत बड़ा प्लेटफार्म है जिसको मेरी वाइफ देखती हैं| सुमित हमारा पूरा आईटी का काम देखते हैं| इसी तरह और भी कई लोग हैं|
इसके अलावा हमारा एम्फोसियम चलता है जिसमें करीब 16 देश के लोग जुड़े हैं| साल में 4 बार कार्यक्रम कराते हैं, जिसमें दुनिया भर से 12 लाख से अधिक लोग जुड़ते हैं| हमारा अपना स्नेह ऐप भी है जिसे मनीषा कोइराला जी ने फॉर्मल लॉन्च किया था|
 Ganga kr

प्रश्न- आपने बिहार के स्वर्णिम इतिहास पर कई किताबें लिखी हैं। अपने ऑब्जेक्टिव्स के बारे में बताएँ।

गंगा कुमार- मुझे बहुत अच्छा लगता है कि मैं बुक्स लिखूँ| बिहार की आर्ट एंड कल्चर पर 5 किताबें मैंने लिखी हैं| आगे एक सिरिअल भी लाने का प्लान है- ‘बिहार एक विरासत’| हमारा वेबसाइट भी है- biharekvirasat.com जिसमें बिहार के फ़ूड एंड फेस्टिवल्स एवं बिहार की किताबें, उनसबको हम लोगों के बीच फ्री ऑफ़ कॉस्ट लेके जा रहे हैं| हमारा ऑब्जेक्टिव कभी भी पैसा कमाना नहीं रहा है|

 

प्रश्न- आप पांच वर्षों से बिहार सरकार में प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं। इन पांच वर्षों बिहार में काम करने का कैसा अनुभव रहा?

 

गंगा कुमार- बिहार में कार्य करने का अनुभव बहुत अच्छा रहा है| मैं इसके लिए व्यक्तिगत रूप से माननीय मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार जी एवं प्रिंसिपल सेक्रेटरी ऑफ़ सीएम श्री चंचल कुमार सर का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी| इतनी क्रिटिकल चीजें सौंपीं| मुझे बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन के 5 करोड़ की संस्था को 1000 करोड़ से ऊपर ले जाने का मौका मिला| उन्हें मुझ पर भरोसा था और मैंने कोशिश की कि जो भी हो सकता है मैं करूँ| मेरी ये नैतिक जिम्मेदारी होती है कि सरकार अगर मुझपर भरोसा करती है तो किसी भी तरह मैं उसे पूरा करूँ|

 

प्रश्न- पटना फिल्म फेस्टिवल के अलावा आपके नेतृत्व में कई फिल्म से संबंधित इवेंट होने वाले हैं। इस सब से बिहारी फिल्म इंडस्ट्री पर क्या प्रभाव पडे़गा या क्या असर दिख रहा है?

 

गंगा कुमार- मुझे लगता है पटना फिल्म फेस्टिवल या रीजनल फिल्म फेस्टिवल के दूरगामी असर होंगे| बाहरी कलाकार बिहार आयेंगे तो एक माहौल बनेगा कि लोग बिहार में शूटिंग की संभावना तलाशेंगे और कल्चरल विरासत जो थी बिहार की उसे दुनिया के पटल पर लाया जा सकेगा|

 

प्रश्न- बिहार के युवाओं में आईएएस अफसर बनने का क्रेज रहता है। आप मात्र 22 वर्ष के उम्र में आईएस बन गये। अपनी प्रेरणा के बारे में कुछ बताएँ। सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं को कुछ मार्गदर्शन दें।

 

गंगा कुमार- साढ़े बाईस साल की उम्र में मैं सिविल सेवा ज्वाइन किया था| मैं गाँव का लड़का था जहाँ छठी-सातवीं में ABCD सिखाई जाती थी| मन में तमन्ना थी कि मुझे पढ़ना है| मुझे लगता है कि जब मैं कर सकता हूँ तो कोई भी कर सकता है| धीरे-धीरे हालात ने मुझे खुद से इतना स्ट्रोंग बना दिया कि अब हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और बहुत सारी यूनिवर्सिटी से मेरा जुड़ाव हुआ|
मेरे पूरे परिवार का, माता जी का खास तौर पर, स्नेह था और उनका हमेशा कहना था कि तुमको आगे बढ़ना है| गाँव की समस्याओं में, परिवार की समस्या में बाद में फँसना है| पहले राज्य के लिए, देश के लिए तुम्हें सिविल सेवा में जाना है| तो इसलिए मैंने कोशिश की और मुझे लगता है मेरे पेरेंट्स हमेशा सही कहते थे| छोटी-छोटी चीजों में फंसोगे तो बड़े चीज़ के बारे में कभी नहीं सोच पाओगे|
मैं सारे यंग जेनेरेशन को ये कहना चाहता हूँ “छोटी चीजों में मत फँसो| फलाना तुम्हारा कपड़ा लेके भाग गया, रोड पर कोई ठोकर मार दिया या कोई गाड़ी में लग गया तो लड़ रहे हैं, इत्यादि-इत्यादि बहुत सारी चीजें| क्योंकि सबकी एनर्जी लिमिटेड है| टाइम 24 आवर्स को तुम कैसे यूटीलाइज़ करोगे, वो बड़ा महत्वपूर्ण होता है| तो छोटी चीजों में मत फँसो, बड़ी सोच रखो, उसको रीयलिस्टिक अप्प्रोच में कैसे लायें इसके बारे में सोचो और उसको एक्सीक्यूट कैसे करें इसपर ध्यान दो| ये बहुत जरूरी है| जो इसपर रहा वो आगे निकला, जो नहीं रहा वो, अनफोर्च्युनेटली, मेडियोकर बन के रह जाता है| मैं मेडियोकर लोगों को बहुत पसंद नहीं करता हूँ| मुझे लगता है वो आये हैं, खायेंगे, जियेंगे और मर जायेंगे| तो ऐसे लोग मुझे कम पसंद आते हैं| मुझे वैसे लोग काफी पसंद आते हैं जिनमें आईडिया है, क्रिएटिविटी है, आउट ऑफ़ वे ही सही सोचते हैं, एक्सीक्यूट करना चाहते हैं| वैसे लोगों को मैं बहुत पसंद करता हूँ, मदद भी करना चाहता हूँ|

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