ऐ तिस्ता बिटिया! जिस वीरगाथा को बाँचते देखते-सुनते नहीं अघाते थे, अब किससे यह उम्मीद करें?

बात बहुत दिनों की नहीं, करीब डेढ़-दो सौ साल पहले की रही होगी। अंग्रेजो से मुक्ति के लिए पूरा देश छटपटा रहा था। कम उम्र के बागी नौजवान हो या, अधेड़ उम्र के सेनानी, सभी अपनी पूरी ताकत से, दमखम से अंग्रेजों को निकाल बाहर करने में दिन-रात एक किये हुए थे। बागियों के लिए क्या दिन और क्या रात.! न तो परिवार का ठिकाना और न ही खुद के रहने-खाने का कोई समुचित जुगाड़.! बस, मन मे एक लगन और लौ लिए सभी चल पड़े थे, माँ भारती के कदमो को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने हेतु..!

मैं कोई बहुत बड़ा वीर-बाँकुरा नही था, और न ही कोई असामान्य दिखने वाला विशाल व्यक्ति था., मैं तो बस माँ भारती के गुलामी को तोड़ने वाले दीवानों की टोली का एक हिस्सा भर बन गया था।

यह दूसरी बात कि, मेरे त्याग,वीरता, शौर्य को देखते-समझते हुए माँ भारती की कृपा से सभी देशवासियों ने मुझे स्वतंत्रता-संग्राम के अग्रणी सेनानियों में स्वीकार कर लिया था.!

उन दिनों मैंने कभी नहीं सोचा था कि, आने वाले स्वतंत्र भारत मेंं से किसी भी माँ भारती-पुत्र की गाथा भी गायी जाएगी.! माँ भारती की कृपा हुई, हम गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने में सफल भी हुए और माँ भारती के स्वर्णिमता की नयी कहानी लिखी जाने लगी.!

ये देखो बिटिया.! तुम भी कहोगी कि, इतनी पुरानी कहानी मैं तुम्हे क्यो सुना रहा हूँ.?

मतलब है इसका, बिटिया.!
हम माँ भारत के पुत्रों ने बेड़ियों को तोड़ने में भले ही अपनी जान का उत्सर्ग किया है, पर क्या हमें इतना भी स्नेह-सम्मान-अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि, हमारी वीर गाथाओं को स्वतंत्र भारत के नयी पीढ़ी के नौनिहालों को सुनाया जाए.?
बहुत दिनों से इसकी प्रतीक्षा थी बिटिया कि, कोई तो हो जो, हमारी जीवनी-कहानी-शौर्य गाथा को लयबद्ध कर के, माँ भारती के पूरे कुनबे को सुना सके.!
तेरे जन्म पर बड़े खुश हुए थे हम, कि जिस बिटिया की तमन्ना थी, आयी है और आने वाले दिनों में स्वर्णिम इतिहास को माँ भारती पुत्रो को बाँचने का काम भी सकल होगा.!

जिस कहानी को स्वतंत्रता के कई दशकों बाद भी जन मानस तक पहुँचने में काफी समय लगा, उसी बलिदानी कहानी को तुमने इतनी सहजता-सरलता से और इतने कम समय मे ही अधिकांश को कैसे बाँच दिया, बिटिया.?

अभी तो तुम्हारी शुरुआत थी, माँ भारती के शौर्य-कथा को सरहदों के पार भी जाकर बाँचना था, और तो और मेरी कथा के साथ ही माँ सीता-माँ राधा की कहानी पर भी तो काम करना था.!
जो बिटिया इतनी जल्दी और कम समय मे इतने बड़े कथानक को नए प्रयोगात्मक रूप से पूरे देश के सामने बाँच सकती है, भला वह बिटिया तनिक शारीरिक आघात से कैसे हार गयी.?

मुझे तो विश्वास ही नही हो रहा कि, जिस वीरगाथा को बाँचते हुए देखना, देवलोक से भी हम देखते-सुनते नही अघाते थे, अब किससे यह उम्मीद करें, हम.?
तुमने तो अपना सर्वस्व झोंक दिया था, भारतीय संस्कृति और संस्कार को बचाने में., फिर यह घोर अन्याय कैसे हो गया.? निश्चित रूप से ईश्वर से कहीं न कहीं चूक हुई है, जब ईश्वर से मिलूँगा तो अपनी बात रखूँगा जरूर.!

कहीं परमपिता ईश्वर यह न कह दें कि, तिस्ता बिटिया को सुनने और देखने की ईच्छा देवलोक में देवो और देवियों को हो गयी थी, सो बिटिया को बुलाना पड़ा.!

मेरे हिसाब से यह गलत हुआ है, क्योंकि भू-लोक में सभी देव तो तुम्हे देख ही सकते थे, फिर बुलाने की क्या जरूरत थी.? नुकसान यह हुआ कि, भू-लोक के लोग अब तुम्हे नही देख पायेंगे.! डर तो यह भी है कि, तुमने जो संकल्प लिया था, माँ भारती-पुत्रों के संस्कार और संस्कृति को बचाने की कवायद की, कहीं उसकी आँच या लौ धीमी न पड़ जाए..!

तुम्हे बचाने में तुम्हारे पापा जी ने जो भी किया, हम नमन करते है, उनकी जिजीविषित बिटिया-स्नेह को., यह अद्भूत था। यह भी पता चला कि, इसी दशहरे समय, अरुणोदय भी पटना के बिटियाओं वाले विद्यालय में तुम्हारा एक बड़ा कार्यक्रम करवाने को नियत कर चुका था, पर ईश्वर की ईच्छा और होनी के सामने भला किसका चला है.!

अब अधिक नही लिख पा रहा हूँ, पर यह कह कर अपनी बात जरूर रखूँगा कि, अंग्रेजो की गोली से जख्मी हाथ को खुद ही काट कर माँ गंगा को समर्पित करने में भी मैं न तो हिचकिचाया था और न ही दर्द से कराहा था, पर तुझ जैसी बिटिया के देवलोक-वापसी से मन व्यथित भी है, आत्मा रो भी रही है.!

तुम्हे बहुत दूर जाना था अभी, दो-चार पगों में ही तुझसे हिसाब ले लिया गया.!
तुम्हे ईश्वर अपने शरण मे रखे, इस विश्वास पर कि, भू-लोक में तुम्हारी वापसी फिर से हो, ताकि माँ भारती भी तुम्हे पुनः पाकर हर्ष कर सके.!
अपना ख्याल रखना बिटिया, शुभाशीष..!

( पुरखा बाबू वीर कुँवर सिंह जी, देवलोक)

अरुणोदय 

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