मैं बिहार हूँ और बिहार होना अपने-आप में एक ज़िम्मेदारी है

 

मैं बिहार हूँ और बिहार होना अपने-आप में एक ज़िम्मेदारी है। मैं अक्सर अपने गौरवशाली अतीत, खराब वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य की आस को अपने कंधे पे ढ़ोता हूँ, एक साथ। बिहार होना कभी-कभी मुझे ज़िम्मेदारी महसूस करवाता है कि मेरा जगा रहना जरूरी है। जगा रहना और जगाना मेरा इतिहास रहा है, जब भी देश को जरूरत हुई है, मैंने आगे बढ़ के अलख जगाया।

 

तब भी जब पूर्व में देश छोटे-छोटे राज्यों में बंटे थे, मेरे ही मगध ने उसे एक सूत्र में पिरोया। जब वही मगधी धनानन्द सत्ता-मद में चूर हो गया, तब भी मेरे ही पुत्र चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में चाणक्य ने उसे हटवाया। मेरे ही मिथिला ने राम को सीता दिया तो वो पूर्ण हो मर्यादा पुरुषोत्तम बने। मेरे ही बोधगया ने गौतम को ज्ञान दिया और वो सिद्धार्थ से बुद्ध बने। मेरे वैशाली के महावीर ने ही जैन धर्म की नई रोशनी जलाई, मेरे बेटे गुरु गोबिंद सिंह ने सिक्ख धर्म को एक नई मजबूती दी। मेरे अशोक ने सम्पूर्ण भारत को एक किया और राजधर्म को नई परिभाषा दी।

 

मैंने हमेशा सत्ता के खिलाफ बजे बिगुल को पहला स्वर दिया। मेरे चंपारण ने गांधी के सत्याग्रह को देश में पहली जमीन दी, जेपी के सम्पूर्ण क्रांति को मैंने ही पहली चिंगारी दी। मेरे ही बेटे शेरशाह सूरी ने मुगलिया हुकूमत को हटा दिल्ली का तख़्त हथिया लिया था। इसलिए मुझे लगता है कि मेरा जगा रहना जरूरी है, जब भी जरूरत होगी मुझे फिर उठना होगा, नए क्रांतिगीत को स्वर देने।

 

कभी कभी इतिहास के गौरव का बोझ इतना बढ़ जाता है कि अपने वर्तमान हालत को देख मैं दुखी हो जाता हूँ ! दिनकर, कालीदास, राजेन्द्र प्रसाद, नालंदा, विक्रमशिला की धरती पर आज साक्षरता दर इतनी कम हो, मन तो दुखता ही है। जिस पाटलीपुत्र और मगध के एश्वर्य और समृद्धि को लिखने में मेगास्थनीज, ह्वेंसांग और फ़ाहियान ने अति कर दिया, वो बिहार अगर आज सबसे गरीब हो जाए तो कष्ट तो होता ही है। वात्स्यायन, विद्यापति, आर्यभट्ट, समुद्रगुप्त, कुँवर सिंह, कनाद, सुश्रुता, चरक, सीता आदि की धरती इस हाल में पहुँच जाए तो भीतर तक एक हूक तो उठता ही है।

 

पर एक भरोसा है अब भी कि फिर से जगूँगा। कभी न कभी तो सत्ता इस 10 करोड़ से ऊपर की जनसंख्या का महत्व समझेगी। जब उसे ये भान हो जाएगा कि कृषी और कृषी आधारित उद्योग, विज्ञान-तकनीकी आधारित उद्योग और सर्विस सैक्टर की असीम संभावना है मेरे यहाँ। कभी तो मेरे बेटे फिर से अंगड़ाई लेंगे बदलाव की। तब दिन बहुरेंगे मेरे और मैं नयी दिशा दूँगा भारत के भविष्य को। तब तक मेरा जगा रहना जरूरी है!

 

आज भले ही निज मुश्किल के बीच खड़ा लाचार हूँ,

पर हमेशा डूबने के बाद पुनः उगने का भी आसार हूँ!

मैं बिहार हूँ!

 

लेखक : आदित्य झा

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