माह-ए-मुहब्बत 9: हाजीपुर से पटना तक ऐसे पहुँची टीनएजर की प्रेम कहानी-Part 1

‘माह-ए-मुहब्बत’ में आपन बिहार पर चल रहे सच्ची प्रेम कहानियों की श्रृंखला में आज की कहानी तीन किश्तों में भेजी गयी है। लेखक की इच्छानुसार इसे तीन किश्तों में ही प्रस्तुत भी किया जायेगा, ताकि कहानी मौलिक रूप में कही जा सके।———————–

शाम का वक़्त था और बोरिंग रोड हमेशा की तरह उस रोज़ भी गुले-गुलज़ार था। जाम में फंसी गाड़ियाँ हमेशा की तरह पों-पों किये जा रही थी, टेम्पों वाले जंक्शन-जंक्शन-कुर्जी-कुर्जी चिल्लाये जा रहे थे और कोचिंग से निकलते लड़के-लड़कियों की हँसी-ठिठोली समां बाँध रही थी।

शुभम अभी-अभी कोचिंग से निकला था और मन ही मन कुछ सोचता पैदल चला जा रहा था। सारे कोचिंग्स की छुट्टी एक ही साथ होने के कारण रोड पर रंग-बिरंगे कपड़े पहने लड़के-लड़कियों की भरमार थी। कोई झुण्ड में था तो कोई शुभम की तरह अकेला। शुभम ने चौराहा पार ही किया था कि सामने से जाती लड़कियों के एक झुण्ड में उसे एक जाना-पहचाना चेहरा दिखा। शुभम की नज़रें एक पल के लिए उस चेहरे पर जा रुकी। उस लड़की ने भी शुभम को शायद नोटिस कर लिया था पर बिना देखे आगे बढ़ती रही। शुभम के दिल की धड़कन वहीं रुक गयी और शुभम से एक भी कदम बढ़ाया ना गया।
“ये तो कृति थी,” शुभम ने खुद से कहा।
“कितनी बदल गयी है पहले से..”
“पर आज भी उतनी ही खूबसूरत है”
“और कितनी खुश भी तो थी”
मन में यही सब सोचता शुभम धीरे-धीरे आगे तो बढ़ा पर उसके दिमाग में एक-एक कर के सारी पिछली बातें घूम गयीं।
शुभम कृति की ख़ुशी के बारे में सोचता, कभी अपने अधूरे प्यार के बारे में। कभी उसको कृति पर गुस्सा आता तो कभी लगता कि ठीक ही तो किया कृति ने उसे छोड़कर। अगर वो उससे इतनी लड़ाई ना करता तो शायद आज दोनों साथ होते। शुभम को वो सारी यादें ताज़ा हो गयीं जिन-जिन में कृति शामिल थी। वो सारे लम्हें एकदम से उसकी आँखों के सामने आ गए जो उसने कृति के साथ बिताए थे।
उसे हाजीपुर का अपना वो स्कूल, अपना वो कोचिंग सब याद आने लगा जहाँ उसका और कृति का प्यार परवान चढ़ा था।
हमेशा हँसने-हँसाने वाला शुभम थोड़ा मायूस हो गया था। दिमाग़ में बढ़ता शोर और दिल में बढ़ता दर्द उसे पागल कर रहा था। चलते-चलते वो S.K. Puri पार्क जा पहुंचा, इस उम्मीद में कि कुछ देर बैठ खुद के साथ अपना दर्द बाँट लेगा फिर अपने रस्ते चल पड़ेगा।
पार्क में घास पर बैठे-बैठे वो सब बातें याद करने की कोशिश करने लगा जो अक्सर उसे दर्द देती थी। 8th क्लास के पहले दिन, जब कृति नयी नयी आयी थी स्कूल में, से लेकर 10th के आख़िरी दिन तक जब दोनों उदास थे कि अब पता नहीं कहाँ जायेंगे, कैसे मिलना होगा, शुभम ने सब याद करने की कोशिश की।
“तीन साल पहले..”
हाजीपुर। इंडियन पब्लिक स्कूल। नया सेशन शुरू हुआ था और 8th क्लास का पहला दिन था। शुभम पहली बेंच पर बैठा दोस्तों से गप्पे मार रहा था और तभी पहले बसंत के पहली बहारों सी एक लड़की दरवाजे से अंदर आयी। शुभम की नज़र उस अंजान लड़की पर गयी और उस लड़की की नजरें सबसे आगे बैठे सीधे-साधे से लड़के शुभम की नजरों से जा टकरायीं।
“Is this 8th ‘C’? उस लड़की ने हँसते हुए पूछा।
शुभम से कुछ कहा नहीं गया। शुभम बस लड़की की खिलखिलाती हुई हँसी देखता रहा।
“Hello there, is it 8th ‘C’? इस बार उस लड़की ने और ज्यादा हँसते हुए पूछा।
“Yes, it is but who are you? New admission?” इस बार शुभम के दोस्त ने मोर्चा संभाला। इस बार लड़की ने कुछ नहीं बोला और वापस चली गयी।

“भाई लग रहा है अपने ही क्लास में एडमिशन हुआ है इसका,” शुभम के दोस्त से कहा।
“हाँ, लग तो रहा है पर चली क्यूँ गयी?” शुभम ने पूछा।
“पता नहीं यार! कही ऐसा ना हो कि ये दूसरे सेक्शन में चली जाए और हम लोग मुंह ताकते रह जाएँ,” शुभम के दोस्त से मज़ाकिया अंदाज़ में कहा।
वो लड़की तो चली गयी थी पर शुभम इस एक पल में बदल गया था। अभी तक बच्चों की तरह पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने से मतलब रखने वाला शुभम अचानक से किशोरावस्था में प्रवेश कर चुका था और दिल में घंटी बज चुकी थी उसके। हालाँकि अभी शुभम को इस एहसास की बिलकुल भी भनक नहीं थी। शुभम उस दिन घर लौटा तो उसके ख्यालों में वही बहारों सी हँसी वाली लड़की थी। शुभम के लिए ये एहसाह नया भी था और अंजाना भी। शुभम उस लड़की को फ़िर से देखना चाहता था या यूँ कहिये कि बस उसी को देखना चाहता था। ऐसा लग रहा था जैसे लड़कियों की हँसी से फूल झड़ने वाले सारे फ़िल्मी डायलॉग सच साबित हो गए थे। शुभम सच्चे दिल से दुआ कर रहा था कि वो नयी लड़की उसी के सेक्शन में आये।
अगले दिन हल्का बुख़ार चढ़ जाने के कारण शुभम स्कूल नहीं जा पाया। पूरे दिन घर पे बैठे-बैठे शुभम को बस एक ही बेचैनी थी। वो लड़की आज आयी होगी या नहीं, कहीं वो दूसरे सेक्शन में तो नहीं चली गयी होगी। इन्हीं सब सवालों के बीच अगला दिन आया और शुभम अच्छे से नहा-धोकर स्कूल पहूँचा।
क्लास में घुसते ही उसने पहली बेंच पर अपनी सीट पर कोई अंजाना बैग रखा देखा तो गुस्से से लाल हो गया और उसने वो बैग उठा कर पीछे फेंक दिया। असेंबली के बाद जब सब क्लास में लौटे तो उसने पाया कि वो लड़की उसी की क्लास में है। शुभम की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। पर वो लड़की थोड़ी परेशान लग रही थी। उसका बैग नहीं मिल रहा था। शुभम को अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था और धीरे से पीछे खसक ही रहा था कि उस लड़की ने उसे देख कर टोका। शायद इसलिए टोका क्योंकि वो उसको पहचान गयी थी और नए क्लास में पहली बार उसने उसीसे कुछ पूछा था।
“मेरा बैग नहीं मिल रहा है!” उसने शुभम से कहा।
“बैग नहीं मिल रहा है, कहाँ रखा था,” इस बार शुभम ने पूरे होशो हवास में अंजान बनते हुए कहा।
“यहीं 1st बेंच पर!”
“अच्छा रुको मैं देखता हूँ।” शुभम पीछे गया और वहाँ से बैग ले आया।

“यही बैग है क्या?”
“हाँ, यही है!”
“किसी ने पीछे रख दिया था,” शुभम ने धीरे से अपना बैग हटाते हुए कहा।
“थैंक यू सो मच!”
“मेंशन नॉट!” बोल कर शुभम पीछे बैठने चला गया।
हमेशा सबसे आगे बैठने वाला शुभम पहली बार पीछे बैठा था। उसे अजीब तो लग रहा था पर इस बात की ख़ुशी थी कि पीछे से वो उस लड़की को बिना किसी बाधा के अपलक देख सकता था।
जैसे-तैसे लंच तक शुभम ने समय काटा और लंच होते ही पहुँच गया आगे अपने दोस्तों के पास उस लड़की के बारे में इन्फॉर्मेशन जुटाने।
“भाई, नाम क्या है उसका?” शुभम ने जाते ही एक साँस में पूछ दिया।
“कृति नाम है शायद” दोस्त का ज़वाब आया।
“बेह, ये कैसा नाम हुआ बे!” शुभम ने मुँह बनाते हुए कहा।
“अब यही नाम है, पर तुमको इतना चुल काहे मच रहा है बे” दोस्त ने शक्की होकर पूछा।
“अरे कुछ नहीं, वो उस दिन आयी थी ना, बस इसीलिये क्यूरियोसिटी था।”
शुभम ने वहाँ तो बात टाल दी पर धीरे-धीरे बात कब आगे बढ़ गयी इसका अंदाज़ा उसे बिलकुल भी नहीं हुआ।
अब कृति को कुछ भी पूछना होता तो शुभम से ही पूछती थी। और कृति के चेहरे पर धूप पड़ती तो शुभम बिना उसके कहे उठकर खिड़की बंद कर देता। धीरे-धीरे जो खिचड़ी पकनी शुरू हो रही थी उससे शुभम और कृति दोनों अंजान थे पर पूरे क्लास को धीरे-धीरे इसका अंदाज़ा होने लगा था।
कृति आगे बैठती और शुभम पीछे। जब भी कृति पलटती तो दोनों की नजरें मिल जाती। ऐसा हो गया था कि शुभम भी नजरें गड़ाये बैठा रहता और कृति भी पलटने के बहाने ढूंढती रहती। एकाध बार तो ऐसा भी हो चूका था कि दोनों आँखों में आँखों डाले ही रह जाते कई मिनटों तक जब तक की क्लास में अचानक से उठती हो-हो की आवाज़ कृति को आगे पलटने पर मजबूर ना कर देती।
देखते-देखते अप्रैल से नवंबर आ गया था। सन्डे का दिन था। शुभम का स्कॉलरशिप का एग्जाम था। Town High School के बगल वाले Girl’s School में सेंटर पड़ा था। शुभम और उसके दोस्त सेंटर के बाहर खड़े आपस में अपनी-अपनी तैयारियों के बारे में डिस्कशन कर रहे थे कि सामने से एक लड़की आती दिखाई दी।
“अरे दीपक, देखो तो, वो जो सामने से लड़की चलती हुई आ रही है वो कृति है क्या?”, शुभम ने अपने दोस्त से कहा।
“नहीं यार, पागल हो गया क्या! कृति तो फ़ॉर्म ही नहीं भरी थी। यहाँ काहे आयेगी वो!”, उसके दोस्त ने ज़वाब दिया।
धीरे-धीरे जैसे वो लड़की चल कर सामने आयी ये साफ़ हो गया था कि वो लड़की कृति ही थी।
शुभम को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने पहली बार कृति को स्कूल यूनिफार्म से अलग किसी कपड़े में देखा था। और देख कर देखता ही रह गया था। काली जीन्स, पोल्का डॉट्स वाले धानी रंग का टॉप और खुले बालों में कृति बला की खूबसूरत लग रही थी। शुभम ने आज तक उससे सुन्दर कोई लड़की नहीं देखी थी। उसके लिए सब कुछ वहीं थम गया था और कृति स्लो-मोशन में आती दिखाई देने लगी थी। उस एक पल में शुभम ने हज़ार फ़ैसले एक साथ कर लिए थे। उसे ये भी पता चल गया था कि वो पिछले कुछ दिनों से जो महसूस कर रहा है उस एहसास को ही प्यार कहते हैं। हाँ, शुभम को प्यार हो गया था। उसने उसी पल पूरी ज़िन्दगी कृति के साथ बिताने का इरादा कर लिया था।
थोड़ी ही देर में कृति की स्लो-मोशन वॉक खत्म हुई और वो सीधे शुभम के पास आ पहुँची। दोनों ने एक दूसरे का हाल-चाल पूछा, फ़िर दोनों ने रॉल नंबर से अपने-अपने क्लासरूम ढूँढे। शुभम की दुआ यहाँ भी क़ुबूल हो गयी और दोनों के रॉल नंबर एक ही क्लासरूम में थे। दोनों ने क्लास में पहुँच कर एक दूसरे की तैयारियों के बारे में पूछा। टाइम होने पर फ़िर सब अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। यहाँ भी कृति आगे थी और शुभम पीछे। शुभम को ऐसा लगने लगा था जैसे पूरी कायनात उन दोनों को मिलाने की साज़िश करने लगी है। इस बार जब कृति पलटी तो शुभम उठ कर सीधा उसके पास चला गया। आँखों में आँखें डाल कर और हाथ मिला कर गुड लक कहा। पूरी क्लास बस शुभम को ही घूरे जा रही थी। किसी हीरो की तरह शुभम वापस चलता हुआ अपनी सीट पर आ बैठा। उसके बाद एग्जाम के तीन घंटे उसने बस ख्यालों में डूब कर ही निकाल दिया। कृति एकाध बार से ज्यादा पीछे नहीं पलटी थी।
परीक्षा ख़त्म हुई, मंडे आया और सब स्कूल पहुँचे। शुभम ने पहुँचते ही पहले कृति से उसके एग्जाम के बारे में पूछा फ़िर अपने दोस्तों में घोषणा कर दी कि उसको प्यार हो गया है। अपने भाई को प्यार हो गया इस से बड़ी क्या गुड न्यूज़ होती दोस्तों के लिए। कृति पर “लाइन मारने” वाले सारे लड़कों को एक-एक कर बुला कर समझा दिया गया कि अब भाई को प्यार हो गया है कृति से इसीलिए वो सब कृति को भाभी मान लें और आज से उसकी ओर ग़लती से भी ना देखें वरना अपना अंजाम सोच लें।

नोट- यह कहानी दिल्ली में ग्रेजुएशन कर रहे हिमांशु ने लिखी है, जो हाजीपुर, बिहार से हैं। आप भी अपनी या किसी अपने की कहानी हमें भेज सकते हैं, पढ़ेगा पूरा बिहार। पता न भूलें- [email protected]|

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