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अब्दुल बारी सिद्दीकी झूठ बोल रहे हैं या उनके बेटे ने झूठ बोलकर लिया है हार्वर्ड में एडमिशन?

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देश में कुछ लोगों को जब तक सत्ता का सुख मिल रहा था, तब तक वो कहते थे “सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा।” वहीं जब जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर किया तब वे कहने लगे “सारे जहां से “असुरक्षित” हिन्दुस्तान हमारा।”

राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को इस देश की जनता ने 6 बार विधायक के रूप में चुना। 1995 से 2005 तक वे बिहार में कैबिनेट मंत्री और पुनः 2015 से 2017 तक वो राज्य के वित्त मंत्री भी रहें। इस दौरान उनके बेटे और बेटी भी इसी देश में थे और बिना किसी तकलीफ़ के जिंदगी जी रहे थे।

सिद्दीकी साहब 2020 बिहार विधानसभा चुनाव क्या हारे, उनको भारत असुरक्षित लगने लगा है। वे चाहते हैं कि उनकी संतानें इस देश की नागरिकता छोड़ दे और विदेश में ही बस जाए। एक कार्यक्रम में अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा,

‘मेरा एक बेटा है जो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ता है और एक बेटी है जो लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की पास आउट है। देश का जो माहौल है, ऐसे में हमने अपने बेटा-बेटी को कहा कि उधर ही नौकरी कर लो। अगर नागरिकता भी मिले तो ले लेना। अब भारत में माहौल नहीं रह गया है। पता नहीं तुम लोग झेल पाओगे या नहीं झेल पाओगे।”

एक जनप्रतिनिधि के नाते अब्दुल बारी सिद्दीकी का यह बयान न सिर्फ निंदनीय है बल्कि यह उनके दोहरे चरित्र को भी रेखांकित करता है। एक तरफ वे सार्वजनिक तौर पर अपने बेटे को हार्वर्ड से पढ़ाई करके भारत न लौटने की सलाह दे रहें हैं। वहीं दूसरी तरफ उनके बेटे का हार्वर्ड विश्विद्यालय में इस आधार पर एडमिशन हुआ है कि वो हार्वर्ड से पढ़कर अपने देश लौटेगा और अपनी शिक्षा का उपयोग अपने देश में सकारात्मक बदलाव और प्रगति के लिए करेगा।

अब्दुल बारी के बेटे अनीस बारी स्टूडेंट वीजा पर हार्वर्ड के मैसन प्रोग्राम (Mason Program) के तहत पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मिड – करियर एमए कर रहे हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वेबसाइट अनुसार इस प्रोग्राम में एडमिशन लेने के लिए जरूरी है कि आप किसी विकाशील देश से हो और आप में अपने देश या क्षेत्र में लौटकर सकारात्मक बदलाव और विकास करने की इक्षाशक्ति हो।

एक तरफ सिद्दीकी साहब अपने बेटे को हार्वर्ड से पढ़कर भारत न लौटने की सलाह दे रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ उनका बेटा भारत लौटकर उसकी सेवा करने के आधार पर हार्वर्ड में पढ़ रहा है। या तो सिद्दीकी साहब झूठ बोल रहे हैं या उनके बेटे ने हार्वर्ड से झूठ बोला है! अब्दुल बारी सिद्दीकी को इसका जवाब देना चाहिए कि झूठा कौन है?

अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे गैर-ज़िम्मेदार लोगों के कारण ही कोई देश या समाज पिछड़ा रह जाता है। वो अपने देश और समाज का नाम लेकर फायदा तो उठाते हैं मगर जब लौटाने की बारी आती है तब वो उससे अपना नाता तोड़ लेते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बिहार है, जहां से लोग निकलकर देश और दुनिया में नाम कमाते हैं मगर कामयाबी मिलते ही अपने राज्य को भूल जाते हैं और अपनी पहचान पर शर्म करने लगते हैं। अपना बिहार इस विषय पर हर बार आवाज उठाता रहा है।

अब्दुल बारी सिद्दीकी एक जन प्रतिनिधि हैं। अगर देश में कोई समस्या है तो उसका हल ढूंढने की जिम्मेदारी उनकी भी है। कायदे से उनको अपने बच्चों को बिहार बुलाना चाहिए और राज्य के विकास के लिए उनको काम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

एक तरफ जब देश एकजुट होकर G20 की अध्यक्षता मिलने का जश्न मना रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अब्दुल बारी सिद्दीकी अपने शर्मनाक बयान से देश को बदनाम कर रहे हैं। उनको अपना यह बयान वापस लेना चाहिए और देश- प्रदेश के लोगों से माफी मांगनी चाहिए।

देश में 2014 लोकसभा चुनाव के बाद अवॉर्ड वापसी के ऐलान की एक नई परंपरा शुरू हुई- जिसे अवॉर्ड वापसी गैंग के नाम से भी जाना जाता है। आमिर खान, नसरुद्दीन शाह, आदि जैसे लोगों को अचानक देश असहिष्णु लगने लगा था। क्या भारत की G20 अध्यक्षता से ठीक पहले देश को “मुसलमानों के लिए असुरक्षित” बताना देश को विश्वपटल पर बदनाम करने की साजिश है?

– अविनाश कुमार (संपादक, अपना बिहार)

Caste Based Census: जातीय जनगणना का क्यों हो रहा है बेतुका विरोध?

मंडल कमिशन के रिपोर्ट को लागू करने की जब बहस चल रही थी तब भी समाज के अग्रिम पंक्ति में खड़े समाज के लोग, जिन्हें तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का जरूरत से ज्यादा लाभ मिल रहा था, वे मंडल कमिशन के मुखर विरोधी थे – उनका तर्क था कि सामाजिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। मंडल कमिशन की बात अगर मान ली गई तो समाज का ‘अनुशासन’ बिगड़ जायेगा।

बीपी मंडल के अध्यक्षता वाली कमिशन ने 1980 में ही राष्ट्रपति को अपना रिपोर्ट दे दिया था मगर तत्कालीन सरकारें उस रिपोर्ट के उपर बैठ गई, जैसे वर्तमान सरकार 2011 के जातीय जनगणना के आंकड़ों पर बैठी है।

जिनको यथा – स्थिति बनाए रखने से फायदा मिल रहा है वे बदलाव का तो विरोध करेंगे ही, इसके साथ बदलाव के जरूरत को भी नकारेंगे। दलितों पर हजारों सालों तक होने वाले अत्याचारों को भी लोग सही बताते थे। दलितों के मंदिरों में प्रवेश पर रोक को भी लोगों ने उचित ठहराया है। दलितों ने अपने लड़ाई खुद लड़ी और उनके समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों ने जैसे बाबा साहब अम्बेडकर और काशीराम जैसे नेताओं ने दलितों को उसका हक दिलाने के लिए आवाज बुलंद किया। ये लोग भले अभी सभी पार्टियों और वर्गों में (मजबूरी बस ही सही) पूजनीय है, मगर उनके जीवनकाल में संपन्न वर्गों ने हमेशा उन्हें विलेन के रूप में देखा है।

ठीक उसी तरह जेपी आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्गों का बढ़ा प्रतिनिधित्व और राष्ट्रिय राजनीति में लालू – मुलायम और शरद यादव जैसे ओबीसी नेताओं का प्रभाव ही था जिसने नेशनल फ्रंट के सरकार को बीपी कमिशन की रिपोर्ट को स्वीकार करने को मजबूर किया और ओबीसी को पहली बार सरकारी नौकरी में 27% आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया।

पुरानी बातों का चर्चा मैं आपको यह बताने के लिए किया कि शोषण करने वाला कभी भी शोषित के हक की बात नहीं करता है। हमेशा ही शोषितों को अपने हक के लिए अपनी आवाज उठानी पड़ी है।

इस बात को आप समझ गए तो आप जातीय जनगणना के पीछे मिडिया और कुछ खास वर्गों के विरोध के पीछे उनके मंशा को भी आप समझ सकते हैं। जो लोग जातीय जनगणना से मुंह मोड़ना चाहते हैं, वास्तव में वे सचाई से भागना चाहते हैं। मंडल कमिशन और दलितों के अधिकार देने के समय इसी मानसिकता के लोग सामाजिक अनुशासन बनाए रखने की बात करते थे, अब जातीय जनगणना को देश की एकता – अखंडता के खिलाफ बताने की प्रोपेगेंडा रची जा रही है। जात के आधार पर पहले से ही विभाजित समाज के बटने का डर पैदा किया जा रहा है।

जैसे सड़क के गड्ढों को छुपाने से सड़क अच्छी नहीं होगी, उसी तरह जाति आधारित असमानता को छुपा के समानता नहीं लाया जा सकता।

गड्ढों को मिट्टी, गिट्टी, बालू, सीमेंट या अलकतरा से भड़ना होगा – गड्ढा कितना बड़ा है और उसको भरने के लिए कितना समय और संसाधन लगेगा, उसके लिए जरूरी है कि सड़क पर हुए गड्ढों को मार्क किया जाय और उसकी संख्या का पता लगाया जाए।

ठीक उसी तरह – जातिवाद जाति आधारित भेदभाव या समस्या से मुंह मोड़ के खत्म नहीं होगा, उसके मूल कारण को खत्म करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि पता लगाया जाए कि आजादी के 75 साल बाद हमने कितनी समानता प्राप्त किया, कितना अभी बाकी है, किसको अभी और सहायता की जरूरत है और कौन अब मुख्यधारा में आ चुका है। मगर इसके लिए जरूरी है कि जातियों का सही आंकड़ा हो।

वैसे भी जातीय जनगणना के आंकड़ों का प्रयोग नीति निर्माण में सरकार कर रही है। मगर वह जानगणना का आंकड़ा 1931 का है। कोई नया मांग नहीं किया जा रहा है, मांग बस इतना है कि अंग्रेजों के जमाने का आंकड़ा प्रयोग करने के जगह वर्तमान समय का आंकड़ा का प्रयोग किया जाए।

अविनाश कुमार, संपादक (अपना बिहार)

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नीतीश के साथ बीजेपी ने कर दिया खेल, बिहार में एक नहीं दो एनडीए लड़ रहा चुनाव

कोविड -19 के कारण देश की आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ी हुई है मगर बिहार की राजनीतिक तापमान पूरा गर्म है। चुनाव (Bihar Election 2020) का बिगुल फूंक चुका है, पहले चरण के लिए नॉमिनेशन भी शुरू है मगर अभी तक राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।

हालांकि महागठबंधन (Mahagathbandhan) ने अपनी सीटों का बंटवारा कर लिया है। इस बार महागठबंधन में आरजेडी (RJD) 144, कांग्रेस 70 और वामदल 29 सीटों पर चुनाव लडेगी। वहीं दूसरी तरफ एनडीए (NDA) में कोहराम मचा है, जिसके कारण अभी तक गठबंधन की स्थिति साफ नहीं हुई है।

एनडीए में चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और उनकी पार्टी के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इसके साथ चिराग पासवान ने घोषणा किया है कि लोजपा सिर्फ जदयू के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारेगी, केंद्र में बीजेपी के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा और बिहार में भी वह बीजेपी  (BJP)के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेगी। बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के नारे के साथ लोजपा ने नारा दिया है कि मोदी से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं।

तो अब सवाल उठता है कि इस बार बिहार चुनाव में दो एनडीए चुनाव लड़ रही है। एक एनडीए बीजेपी और जदयू का तो दूसरा एनडीए बीजेपी और लोजपा का?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि लोजपा के इस चाल के पीछे बीजेपी है। बीजेपी चुनाव बाद के प्रस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश में है। एक तरफ वह नीतीश के साथ चुनाव में जाकर महागठबंधन को टक्कर देना चाहती है तो दूसरी तरफ लोजपा को नीतीश के खिलाफ खड़ा करके अपने ही सहयोगी और चतुर राजनेता नीतीश कुमार को ‘ औकात ‘ में रखना चाहती है!

लोजपा दोहराना चाहती है अपना 2005 का मॉडल?

बिहार में 2005 में विधानसभा का चुनाव फरवरी-मार्च में हुआ था। उन दिनों केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्‍व में एनडीए की सरकार थी और रामविलास पासवान मंत्रिमंडल के प्रमुख चेहरों में थे। लेकिन चुनाव के ठीक पहले इस्‍तीफा देकर उन्‍होंने लोक जनशक्ति पार्टी बनाई और बिहार में लालू, नीतीश के खिलाफ अकेले ताल ठोंक दी। बताते हैं कि उस वक्‍त नीतीश चाहते थे कि रामविलास उनके साथ रहकर लालू परिवार के खिलाफ छिड़ी मुहिम में शामिल हों लेकिन रामविलास अकेले ही मैदान में उतरे।

2005 में विधानसभा के आम चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी का प्रदर्शन काफी अच्‍छा रहा। 29 सीटों पर पार्टी ने जीत हासिल की। किसी को बहुमत नहीं मिली। अगर लोजपा उस समय जदयू को समर्थन देती तो सरकार बन सकती थी मगर सीएम पद को लेकर नीतीश को समर्थन न देने के चलते आखिरकार बिहार में किसी की सरकार नहीं बन पाई थी। प्रदेश में मध्‍यावधि चुनाव कराने पड़े थे।

कहीं दाव उलटा न पड़ जाए

दो के झगड़े और तीसरे के अरमान के बीच कहीं महागठबंधन के तेजस्वी यादव कही मुख्यमंत्री बन के निकाल जाए! एनडीए में चल रहे इस ताना तनी से सबसे ज्यादा खुश तेजस्वी यादव होंगे। लोजपा के अलग चुनाव लडने से बीजेपी को कोई नुकसान हो न हो मगर गठबंधन के जिन सीटों से जदयू चुनाव लड़ रही है वहां वह एनडीए को नुकसान पहुंचा सकती है। लोजपा भी मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है, ऐसे में संभव है कि रामविलास के समर्थकों के साथ बीजेपी के नीतीश विरोधी वोट भी लोजपा को मिले। इससे एनडीए के वोटों का बटवारा होगा, और महागठबंधन के उम्मीदवारों को जीतने की संभावना बढ़ेगी।

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क्या कन्हैया कुमार महागठबंधन के टिकट पर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

पिछले साल का लोकसभा चुनाव याद ही होगा कि कैसे कन्हैया कुमार के बेगूसराय सीट पर उम्मीदवारी को लेकर तेजस्वी ने वामदल के साथ गठबंधन नहीं किया था| यही नहीं, राजद ने उस सीट पर एक मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देकर कन्हैया को हरवा दिया था| मगर इस साल आने वाले विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार एक मंच पर दिख सकते हैं|

खबर है कि सत्ताधारी पार्टी को विधानसभा चुनाव में पटखनी देने के लिए महागठबंध में वामदलों का सामिल होना तय है| इसको लेकर सीपीआइ के राज्य सचिव रामनरेश पांडेय और राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह की दूसरे चरण की बातचीत हो चुकी है| राम नरेश पाण्डेय ने कहा है कि कन्हैया कुमार को जरूरत पड़ी, तो विधानसभा चुनाव में उतारा जा सकता है| प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने भी कहा कि कम्युनिस्ट दल हमारे स्वाभाविक सहयोगी हैं| हम लोग मतभेद भुला कर मिल कर चुनाव लड़ेंगे|

कन्हैया कुमार सीपीआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं, इसलिए पार्टी के तरफ से उनका स्टार प्रचारक बनना तय है| इसी कारण से कहा जा रहा है कि कन्हैया कुमार और तेजस्वी यादव एक मंच पर दिख सकते हैं| ज्ञात हो कि अब तक तेजस्वी यादव कन्हैया के साथ मंच शेयर करने से परहेज करते आयें हैं| राजनितिक गलियारों में कहा जाता है कि तेजस्वी यादव मानते हैं कि भविष्य में कन्हैया कुमार उनके प्रतिद्वंदी के तौर पर उभर सकते हैं|

तेजस्वी यादव और कन्हैया, दोनों फेमस नेता हैं| दोनों की प्रतिक्रिया मिडिया में जगह बनाती है| इन दोनों नेता के साथ आने से महागठबंधन को फायदा होना तय है मगर सवाल है कि एक म्यान में दो तलवारें कब तक रहेगी?

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बिहार चुनाव: बीजेपी-नीतीश पर भारी पड़े तेजस्वी, RJD की जीत के बने हीरो

बिहार की अररिया लोकसभा सीट और दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे जहां एक तरफ बीजेपी और नीतीश कुमार के लिए एक जोरदार झटका है तो वहीँ दूसरी तरफ राजद नेता तेजस्वी यादव के राजनितिक भविष्य के लिए एक शुभ संकेत लेकर आया है|

लालू यादव के जेल जाने और नीतीश के साथ गठबंधन टूटने के बाद उपचुनाव के मुकाबले को जीतना अहम है| नीतीश कुमार के बीजेपी में जाने और लालू यादव के जेल जाने के बाद, बिहार में यह पहला चुनाव था| साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले अररिया लोकसभा, जहानाबाद विधानसभा और भभुआ विधानसभा पर हुए उपचुनाव का परिणाम पहले से ही कई मामलों में खास माना जा रहा था| इस चुनाव में नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा तो दाव पर थी साथ ही लालू यादव के जेल जाने के बाद तेजस्वी यादव के नेतृत्व क्षमता की भी परीक्षा थी|

लालू यादव के गैरमौजूदगी में राजद ने ये चुनाव पूरी तरह तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा था| अब चुनाव परिणाम आने के बाद तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालो का मुह बंद हो गया है|

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इस तरह बढ़ा तेजस्वी का कद
लालू यादव के जेल जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई थी कि अब आरजेडी को कौन संभालेगा| लेकिन तेजस्वी यादव ने सुगबुगाहट पर पूर्ण विराम लगाया और ना सिर्फ विरोधियों पर हावी हुए बल्कि पार्टी की कमान को बखूबी संभाला|

राजनीति में धमक बढ़ाने में कामयाब हुए तेजस्वी
बिहार उपचुनावों के परिणाम बताते हैं कि लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव पिता की गैर मौजूदगी में राजनीति में अपनी धमक बढ़ाने का सफल प्रयास कर रहे हैं| लालू यादव के जेल जाने के बाद तेजस्वी जिस तरह के विरोधियों को जवाब देने और उन पर हावी होने की कोशिश कर रहे हैं उससे यह बात तो स्पष्ट है कि वह अब लीडिंग फ्रॉम फ्रंट की भूमिका में काम करना चाहते हैं और कर भी रहे हैं| जीत का सेहरा तेजस्वी यादव के सिर इसलिए भी सजा है, क्योंकि वह प्रदेश की राजनीति में एकमात्र ऐसा युवा चेहरा है जिस पर जनता पिछले विधानसभा चुनावों से लेकर अब तक विश्वास कर रही है|

नीतीश के लिए चुनौती का समय
उपचुनावों के नतीजे इस बात को भी स्पष्ट करते हैं कि बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव नीतीश के विकल्प के रूप में उभर कर आ रहे हैं| तेजस्वी के राजनीतिक गतिविधियों की वजह से बिहार की जनता के बीच लाजिमी तौर पर तेजस्वी की पूछ बढ़ेगी| इसके साथ ही बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों में नीतीश को तेजस्वी यादव से कड़ी टक्कर मिलेगी|

 

आंध्र प्रदेश के बाद बिहार से फिर उठी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग, नीतीश पर बढ़ा दवाब

आंध्र प्रदेश को विशेष राज्‍य का दर्जा नहीं मिलने के बाद मुख्‍यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और केंद्र सरकार के बीच शुरू हुए विवाद का असर बिहार की राजनीति पर भी दिखने लगा है। टीडीपी के बाद एनडीए का एक और सहयोगी जदयू भी इस मुद्दे पर टीडीपी के साथ अपना सूर मिला रहा है| बिहार में महागठबंधन तोड़कर बीजेपी की मदद से सरकार बनाने वाली जनता दल यूनाइटेड ने भी विशेष राज्य का दर्जा न मिलने पर असंतोष जाहिर किया है|

जेडीयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि बिहार को भी स्पेशल कैटिगरी स्टेटस (विशेष राज्य का दर्जा) नहीं दिया गया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी काफी समय से विशेष राज्य के दर्जे की मांग दोहराते रहे हैं। नीतीश 2005 के विधानसभा चुनाव से ही विशेष राज्य की मांग उठाते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार को जब तक विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, उसका विकास नहीं हो पाएगा| केसी त्यागी ने कहा कि हम आंध्र प्रदेश की मांग का समर्थन करते हैं| उन्होंने कहा आज आंध्र प्रदेश की वही स्थिति है जो बिहार की थी| विभाजन के की तर्ज पर अधिकतर संसाधन आंध्र से अलग होने के बाद तेलंगाना के पास पहुंच गए| उन्होंने कहा कि बिहार भी विशेष राज्य के दर्जे का हकदार है| उन्होंने कहा कि बिहार का बंटवारा होने के बाद सारे संसाधन झारखंड के पास चले गए| केसी त्यागी ने कहा कि नीतीश कुमार हमेशा पीएम मोदी इसके लिए पीएम मोदी से बात करते रहते हैं| उन्होंने हमेशा पीएम से राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है|

इधर विपक्ष भी मौका का फायदा उठाकर नीतीश कुमार पर दवाब बढ़ा रही है| नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव ने नीतीश कुमार पर तंज कसा है।

 तेजस्‍वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कहा कि उन्‍हें आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू से सीखना चाहिए। शासन इक़बाल और स्वाभिमान से चलता है। आखिर ‪कितने दिन डरकर बिहार का नुक़सान करते रहेंगे।‬

तेजस्‍वी ने कहा कि नीतीश कुमार ने व्यक्तिगत फ़ायदों के लिए बिहार के हितों की तिलांजलि दे दी है। अपने लिए ‘विशेष आवास’ और ‘विशेष सुरक्षा’ के समझौते के तहत बिहार की विशेष दर्जे की मांग को कूड़ेदान में डलवा दिया।
तेजस्‍वी ने पूछा कि नीतीश कुमार को यह हक़ किसने दिया है की अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए वो बिहार के साथ हक़मारी करें। स्वयंघोषित नैतिक पुरुष जवाब दें।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मैंने 5 फ़रवरी को पत्र लिखकर अपने नेता प्रधानमंत्री मोदी जी से बिहार के लिए विशेष राज्य की माँग करने की विनम्र विनती के साथ-साथ तन-मन-जन से पूर्ण समर्थन देने का वायदा भी किया था। लेकिन मुख्यमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष को उस पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझा। वे बतायें कि उन्होंने किस डर से अपनी नैतिकता, अंतरात्मा, राजनीति और बिहार के अधिकारों को भाजपा के यहाँ गिरवी रखा है?
तेजस्‍वी ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री मोदी जी और केंद्र सरकार बिहार की विशेष दर्जे की जायज़ माँग को अस्वीकार करते है तो नीतीश जी को अंतरात्मा की आवाज़ पर तुरंत इस्तीफ़ा देकर एनडीए से गठबंधन तोड़ना चाहिए। कुछ तो हिम्मत दिखाइए चाचा जी। हम इस मांग पर साथ है।

इधर, विधानसभा में गुरुवार को राजद सदस्य शक्ति यादव और समीर कुमार महासेठ ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर कार्यस्थगन प्रस्ताव पेश किया। विधानसभा अध्यक्ष ने इसे नियमानुकूल नहीं बताते हुए इसे अमान्य कर दिया।

तेजप्रताप लोगों से जुडने के लिए कर रहे है अनोखा काम, देखिए उनका नया अवतार!

लालू प्रसाद के बड़े बेटे और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव बराबर किसी कारण मिडिया के सुर्खियों में बने रहते है। इस बार फिर वह अपने अनोखे अंदाज के लिए चर्चा में बने हुए है।

 

तेजप्रताप यादव ने सरकार के एक साल पुरा होने पर जनता से जनसंपर्क कर रहें है और जनता को अपने विभाग द्वारा किये गये कामों को जनता को बता रहें है और लोगों से उनका फीडबैक भी ले रहें है । उनकी टीम जगह-जगह उनकी टीम कैम्प लगा के यह काम कर रही है और लोगों से फीडबैक ले रही ।

Tej pratap

खास बात यह है कि इन कैंपों में लगें पोस्टरों और बैनर पर तेजप्रताप यादव एक अनोखे अंदाज में लग रहें है। कुर्ता पजामा के जगह जींस और टीशर्ट में दिख रहें और साथ में आखों पर चश्मा है। प्राय: नेता लोग जिस पहनावा में देखें जातें हैं उससे कही अलग तेजप्रताप हिंदी सिनेमा के हिरो वाले अंदाज में अपने आप को  अनोखे तरीके से प्रस्तुत कर रहे है। कहा जा रहा है कि यह बिहार के युवाओं से जुडने का कवायद है।

Tej pratap

गौरतलब हो कि तेजप्रताप और तेजस्वी बिहार के दो सबसे बड़े और चर्चित युवा चेहरे है। सियासी गलियारों में चर्चा तो यह भी चल रही है कि तेजप्रताप और तेजस्वी में एक दुसरे से आगे निकालने की होड़ है और दोनों बड़ी संजीदगी से इसके लिए मेहनत कर रहें हैं और दोनों के युवा ब्रिगेड की टीम जनता में अपने युवा नेता की छवि चमकाने में दिन रात लगें हैं और मेहनत कर रहें है।

बिहार में अबतक खेल के विकास के लिए कोई कोशिश नही हुई : तेजस्वी


बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इस बार  ‘मेरी दिल की बात’ श्रंखला के तहत ” ओलंपिक्स, भारत और बिहार” के बारे में लिखा है।  एक खेलाडी रह चुके तेजस्वी यादव ने क्या कहा आप भी पढिए.. 

खेल जगत का सबसे बड़ा उत्सव, खेल की दुनिया का महाकुंभ यानि कि ओलंपिक्स ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में चल रहे हैं। विश्वभर के खिलाडी ओलंपिक्स में अपने अपने देशों का प्रतिनिधित्व करने रियो में जमा हुए हैं। इन सभी खिलाड़ियों के सालों की मेहनत और तपस्या को चन्द मिनटों या सेकंडों में आजमाने का समय आ गया है।

भारत के खिलाडी भी अपने-अपने खेलों और उनके विभिन्न वर्गों में क्वालीफाई करके ओलंपिक्स में भाग लेने के लिए पहुँच गए हैं। अबतक कुछ प्रतिस्पर्धा में बने हुए हैं तो कुछ आगे के राउंड में प्रवेश कर अपनी दावेदारी को कायम रखे हुए हैं। भारत के खिलाडी इस ओलंपिक्स में लंदन ओलंपिक्स के मुकाबले और अधिक पदक अंक तालिका में जोड़ पाए तो हर भारतीय को और अधिक ख़ुशी और गर्व होगा।

 

मुझे इस बात की तो ख़ुशी है कि बड़ी तादाद में भारतीय खिलाड़ी इस बार ओलंपिक्स में भाग ले पा रहे है। पर एक बिहारी होने के नाते मुझे अत्यंत दुःख होता है कि बिहार का कोई भी खिलाडी इस रियो ओलंपिक्स में बिहार का नाम रौशन करने के लिए ओलंपिक्स तक का सफर तय नहीं कर पाया है, इस बात का बहुत दुःख है। शायद बिहार में खेल कूद को बढ़ावा देने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई है और अभिभावक भी बच्चों को खेलों के प्रति ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करते। कुछेक राज्यों को छोड़कर सभी जगह यही स्थिति है। ना तो कभी ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए प्रतिभा को निखारने का प्रयास किया गया, ना खेल कूद को प्रोत्साहन देने के लिए उचित धनराशि आवंटित की गई है और ना ही प्रतिभा निखारने के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण किया गया। जो बात दिल को और कचोटता है वह है यथास्थिति को बदलने के प्रति उदासीनता।

यह वास्तविकता है कि खेल कूद में सालों झोंकने के बाद भी कुछेक खिलाड़ी ही विश्व स्तर पर नाम कमा पाते है। कुछ राष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाते हैं तो कुछ राज्य स्तर तक। किसी का खेल जीवन सिस्टम की भेंट चढ़ जाता है तो किसी का खेलों में राजनीती की भेट चढ़ जाता है। खेल से बहुत से लोगों को ढंग का रोज़गार मिल जाए, ऐसा भी नही है। पर खेलो और खिलाड़ियो से भावनात्मक जुड़ाव पूरे देश का होता है। देश के खिलाड़ियो के जीत को अपनी जीत मानते है और उनके हार को अपनी हार। खेलो से कभी पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है तो कभी मातम का माहौल। कोई खेल को जंग मानता है तो कोई मात्र मनोरंजन का साधन। पर इसमें कोई दो राय नही है कि समय समय पर खेल हमे स्वयं पर और देश पर गर्व करने का अवसर देते है और राष्ट्र निर्माण में अपना ही योगदान देते है। खेल को नज़रअंदाज़ कतई नहीं करना चाहिए।

 

मणिपुर, हरियाणा और पंजाब जैसे छोटे और कम आबादी वाले राज्य खेल कूद के मामले में बिहार से कही आगे है। हरियाणा और पंजाब में एक निर्धारित स्तर पर नाम कमाने पर सरकारी नौकरी दी जाती है । और अच्छा करने पर पदोन्नति भी दी जाती है। मणिपुर, जो एक छोटा राज्य है, वह दिखाता है कि अगर खेल कूद को संस्कृति का हिस्सा बना दिया जाए तो प्रतिभा स्वयं आगे आने लगती है। हमे बिहार में भी खेल कूद की संस्कृति का विकास करना होगा। इसे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। माता-पिता और शिक्षको को जीवन में खेलकूद और स्वास्थ्य के महत्व को समझना होगा। खेल कूद ना सिर्फ हमे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाते है, बल्कि चुनौतियो का सामना करना, तालमेल बिठाना, लक्ष्य साध कर मेहनत करना और एक दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ना सिखाती है। व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए खेलो के महत्व को बिहारवासियों और व्यवस्था को समझना ही पड़ेगा।

एक बेटी की करुण गुहार- सीएम अंकल! मुझे अनाथ होने से बचा लीजिए…

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बिहार की एक छोटी-सी लड़की ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखकर गुहार लगाई है कि -सीएम अंकल, मेरे पिताजी को बचा लीजिए नहीं तो मैं और मेरे भाई अनाथ हो जाएंगे।

सीएम अंकल ! मेरे पिता को बचा लीजिए। नहीं तो मैं अनाथ हो जाउंगी। अगर वे मर गए तो हम बच्चों को कौन संभालेगा? मुझे और मेरे भाई को कौन पढ़ाएगा? हम बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर यह फरियाद लगाई है संझौली ग्राम की छठी कक्षा में पढऩे वाली 11 वर्षीय दलित बच्ची निशा ने। दरअसल निशा के पिता जतन पासवान को उसके पड़ोसियों ने शौचालय बनाने को लेकर उपजे विवाद में चाकू मार गंभीर रूप से जख्मी कर दिया था।

जतन पीएमसीएच (पटना) में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। इस मारपीट के दौरान पड़ोसियों ने निशा के भी एक हाथ जख्मी कर दिया है।

सीएम को भेजे पत्र में निशा ने कहा है कि 31 जुलाई को शौचालय निर्माण को ले घटी घटना में उसके पिता के साथ मां शीला देवी के साथ ही वह भी जख्मी हो गई थी। घोर गरीबी में जी रहे पिता को ग्रामीणों ने करीब 30 हजार चंदा इकट्ठा कर इलाज के लिए वाराणसी भेजा था।

लेकिन निशा के पति जतन इतने जख्मी हैं कि इलाज में करीब ढाई लाख रुपये की जरूरत है। पैसों के अभाव में गांव के लोगों ने ही वाराणसी के अस्पताल से पटना पीएमसीएच में रेफर करा दिया है। घर में केवल वह और उसका नौ वर्षीय भाई राहुल है। 

निशा ने लिखा है – नीतीश अंकल ! पुलिस उन लोगों को भी नहीं पकड़ रही जिन्होंने मेरे पापा को मारा है। सुना है आप बड़े दयालु हैं। सबकी सुनते हैं। मुझ पर दया कीजिए, नहीं तो मेरे पापा मर जाएंगे। मैं और मेरा छोटा भाई दोनों अनाथ हो जाएंगे। साहबों से भी फरियाद की, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

निशा का पत्र तो यहीं समाप्त हो जाता है, लेकिन उसकी मासूमियत ने समाज के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

पुलिस की लापरवाही की भी बच्ची ने पोल खोल दी है। जतन पर शौचालय बनाने को लेकर पड़ोसियों ने ऐसा कहर बरपाया कि वह मौत से जंग लडऩे को विवश हो गया। 15 अगस्त तक संझौली प्रखंड को पूरी तरह निर्मल बनाने के अभियान ने इस दलित परिवार की जिंदगी को पूरी तरह अंधकार में धकेल दिया है। ग्रामीण किसी तरह चंदा इकट्ठा कर पैसा जुटा रहे हैं, लेकिन 10-20 रुपए के चंदे से जतन की जिंदगी की रोशनी नहीं लौट सकती…।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मासूम बच्ची के फरियाद को सुनना चाहिए और इसकी मदद करनी चाहिए।  यह पत्र तेजी से फैल रहा है।  उम्मीद है मुख्यमंत्री जी इसे जल्द पढेंगे।

 

Credit- Pramod Tagor, Sanjhauli (Dainik Jagran)

शराबबंदी का बिहार में ठीक वैसा ही स्वागत हो रहा है जैसा घर में नये आये दामाद का होता है

बिहार को बदनाम करने वालो के नाम एक जबरदस्त खत लिख चर्चा में आई नेहा नूपुर ने बिहार में शराबबंदी पर भी कुछ लिखा है जो शराबबंदी पर बिहार की जनता के राय को भी बताती है। आपको भी इसे एक बार पढ़ना चाहिए। हम उनकी सहमती से इसे यहां पोस्ट कर रहे है।


नेहा नापुर

नेहा नूपुर

बिहार और शराबबंदी …

“उस दिन चौथी कक्षा में पढ़ाते समय एक सवाल आया था “आपको पेड़-पौधों से क्या-क्या प्राप्त होता है?” मैंने सीधा सवाल बच्चों से किया और बहुत सारे जवाब मिले जो आप भी देंगे, मसलन फल, फूल, जलावन, लकड़ी, ऑक्सीजन वैगेरह-वैगेरह| लेकिन हमेशा शांत रहने वाला वो बच्चा पहली बार कुछ बोला था- “शराब”| मैं समझ गयी गाँव में आसानी से उपलब्ध “महुआ” से बनने वाली इस चीज़ को इसने बहुत करीब से जाना है| मैंने कोशिश की तो पता चला उसका परिवार इसी शराब के सहारे चलता है, असल में घर-खर्च और घर में झगड़े का एक यही बहाना है| उसे भी स्कूल के बाद शाम में शराब बेचना होता है| ये एक वजह थी कि सभ्य घर के बच्चों को उस से दूर रहने की हिदायत मिलती थी| काश लोग इतनी ही नफरत उसके द्वारा बेचे जाने वाले वस्तु से करते तो शायद उसके परिवारवाले घर-खर्च के लिए किसी और रास्ते पर होते| खैर, मैंने पूछा “तुम बड़े हो कर क्या करोगे” तो उसने दो टुक जवाब दिया “मिस कुछुओ करेंगे, शराब नहीं बनायेंगे|” मुझे ख़ुशी हुई और उसके उत्साहवर्धन के लिए पूरी कक्षा में तालियाँ भी बजीं|

बिहार में शराबबंदी डॉन को पकड़ने जितना ही मुश्किल मुहीम है, जानते हुए भी एक कदम जो इस ओर उठाया गया है, किसी “मिशन इम्पॉसिबल” से कम तो नहीं| भविष्य की कहानी तो वक्त कहेगा लेकिन अभी इस शराबबंदी का बिहार में ठीक वैसा ही स्वागत हो रहा है जैसा घर में नये आये दामाद का होता है| दामाद की तारीफ के साथ-साथ कुछ जो खोट निकालने की कोशिशें लगातार होती रहतीं हैं ठीक वैसे ही| कई लोगों की आखिरी दारू पार्टी हो रही है तो कई लोगों की पहली दारू पार्टी करने का अरमान धुआं हो रहा है|

हाल ही में बस से आना हुआ| ड्राईवर साहब बस को आगे बढ़ाने के अलावा एक ही मुद्दे पर अडिग थे “बिहार में शराबबंदी”| वहाँ मौजूद सभी नौजवान-बूढ़े इस बात से खुश थे कि देर से ही सही “शराबबंद” तो हुआ| कई कह रहे थे “ई काम 15-20 साल पहले हुआ रहता तो आज हम भी काम के आदमी रहते| देखिये न अब रोज मजदूरी का 150 रुपिया बचा लेते हैं”| किसी ने ऑब्जेक्शन किया “काश भईया ये बंदी चलते रहता, हमरा बचवा पढ़-लिख जाता कम-से-कम| जैसे हम बर्बाद हुए, कहीं लड़का भी बर्बाद ना हो जाये| ये चलते रहेगा तब न!” तभी ड्राइवर साहब भड़के “ऐसे-कैसे अब शराबबंदी बंद होगा भाई, औरत सब मिल के हरवा भी सकती है, जैसे जितवाई है”| ये मुद्दा ट्रेंड में था, ट्विटर पर नाहीं जी, बसवा में|

कुछ लोगों की परेशानी ये है कि गाँव का एक मात्र मनोरंजन मंगरुआ अब चुप ही हो गया है एकदम से| बेचारे का मुँह तो तब ही खुलता था जब दो पाउच अंदर जाता था| तब ही होश में आता था और वो सब सुनाता-दिखाता था जो कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल में दिखाना बाकी रह गया| सारे सरकारी नौकरों की खबर भी लेता था चुन-चुन के|

और वो मुन्नीलाल जी अभी-अभी बाल-बाल बचे हैं| बिहार-यूपी के बॉर्डर पर गये थे दो घूंट की तलाश में| चांस लग भी गया था| दो घूंट मिल भी गये थे| लेकिन वापस आते वक्त वो जो सिपाही जी एगो मशीन मुँह में घुसा के देखने लगे थे न कि मुँह में अल्कोहल की मात्र कितनी है, कसम से जान-प्राण मुँह में ही आ गया था| भगवान् भला करे, 20% अल्कोहल ही पाया गया और

मुन्नीलाल जी बच के घर आ गये| दहशत में हैं बेचारे, किसी को कुछ बता नहीं रहे हैं|

बताइए ऐसे एक्के बार देसी-विदेसी सब बंद कर दिए हैं, मेहमानों का स्वागत कैसे होगा अब| मुर्गा तो अब भी है… लेकिन उसका साथी दारू!! ओह !! यही “व्यवस्था” करना अब भारी पड़ेगा लड़की वालों को, और आप तो जानते ही हैं, इसका नहीं होना मतलब कोई सेवा-सत्कार नहीं होना| एक-एक बोतल भी छीन लिए गये हैं| कौन समझाये उनको! अरे! बोतल का और भी इस्तेमाल होता है भाई!

गाँवों में जहाँ “देशी” का विकल्प ढूँढने की कोशिश हो रही है वहीं शहरों में “विदेशी” की दुकान अब मिल्क पार्लर बन चुकी है।

मेरी सोच से तो वो शक्स नहीं जा रहा, जो पी-पा के सड़क किनारे लुढ़का रहता था| कोई उसे नाली में ठेल देता तो फिर कोई नाली से निकाल के सड़क पर वापस लुढ़का देता| अब जब वो होश में आएगा तो? क्या उसे अपने गंदे, लम्बे बालों को देखकर घिन आएगी? क्या अब वो अपने घर जायेगा? घर कहाँ है, क्या याद है उसे अब भी? क्या वो फिर से अपने पीने की व्यवस्था कर पायेगा? अगर कर पाया और जेल में पाया गया तो? वो जेल की राह जायेगा या “नशा मुक्ति केंद्र” की राह? भगवान् भला करे!!

लोग कहते हैं “बिहार में शिक्षकों का वेतन शराब से ही बनता है”| कई शिक्षकों की चिंता का विषय ये भी है, नीतिश बाबु को बहुत नुकसान होने वाला है, कहीं शिक्षकों को साल में दो बार मिलने वाली “त्योहारी” अब हर “हैप्पी न्यू इयर” की मोहताज न हो जाये|

 

खैर मैं भी शिक्षक हूँ| लेकिन खुश हूँ, बल्कि बहुत खुश हूँ| विद्यालय प्रांगण में आ कर तमाशा करने वाला वो पियक्कड़ अब नहीं देखा जा रहा| विद्यालय के पीछे चलने वाली शराब-भट्ठी जिसके गंध से ठंडी हवा भी नशीली लगती थी, अब बंद हो चुकी है| और अब उस बच्चे को वाकई शराब बनाने-बेचने में परिवार का हाथ बनने की जरूरत नहीं पड़ेगी| अब वो “कुछुओ” करेगा लेकिन शराब से दूर रह पायेगा, वैसे ही जैसे पहले उसके दोस्त दूर रहते थे उस से। “