केंद्र और राज्य सरकार के झगड़े के कारण बिहार के 16 लाख किसानों को होगा नुकसान

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हर बार केंद्र और राज्य सरकार के झगडे में भुगतना जनता को ही होता है।  फिर से केंद्र और राज्य सरकार के बिच मतभेद सामने आया है, जिसका नुकसान इस बार बिहार के किसानों को उठाना होगा।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की प्रीमियम राशि को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के झगड़े में राज्य के 16 लाख से अधिक किसानों को बीमा का लाभ इस साल नहीं मिल पायेगा. राज्य सरकार को इस बीमा योजना पर साढ़े छह सौ करोड़ रुपये खर्च करना होगा. इतनी ही राशि केंद्र सरकार भी वहन करेगी. 15 अगस्त तक राज्य सरकार को बीमा कंपनियों का चयन कर लेना है.

मगर, बिहार सरकार ने आरोप लगाया है कि यूपी में अगले साल चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने वहां इस योजना की प्रीमियम राशि मात्र 4.09 प्रतिशत तय की है. जबकि बिहार के लिए 14.92 प्रतिशत निर्धारित की गयी है.

इस पर राज्य सरकार ने कडा आपत्ति दर्ज कराया है और जिसके कारण अभी तक राज्य सरकार ने बिमा कंपनियों का चयन नहीं किया है।

 

आज बिहार सरकार के सहकारिता विभाग के प्रधान सचिव अमृत लाल मीणा केंद्र के समक्ष बिहार का पक्ष रखेंगे. इसके बाद ही कोई आधिकारिक निर्णय हो पायेगा. जानकारी के मुताबिक अगर एक-दो दिन में इसका समाधान नहीं निकाला गया तो इस वर्ष बिहार के 16 लाख किसानों को फसल बिमा का लाभ नहीं मिल पायेगा।

 

क्या है झगड़ा का कारण

केंद्र सरकार ने राज्यों को 10 बीमा कंपनियों की सूची उपलब्ध करायी है. इसमें तीन कंपनियां बिहार मे पहले से ब्लैक लिस्टेड हैं. बाकी की छह कंपनियों ने बिहार में खेती को लेकर रिस्क फैक्टर को आधार बनाते हुए न्यूनतम प्रीमियम दर 14.92 प्रतिशत तय किया. बीमा योजना पर बिहार में कुल पंद्रह सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे जिसमें साढे छह सौ करोड़ राज्य और इतनी ही राशि केंद्र को वहन करना होगा. दो सौ करोड़ रुपये किसानों को देने होंगे. केंद्र सरकार को लिखे पत्र में कहा गया है कि यूपी में प्रीमियम का दर लगभग चार प्रतिशत है.

वहीं उसी कंपनी द्वारा बिहार के जिलों को छह कलस्टर में बांटकर छह बीमा कंपनियों द्वारा प्रीमियम तय किया है. पहले कलस्टर के लिए 18.56 प्रतिशत, दूसरे के लिए 11.97 प्रतिशत, तीसरे कलस्टर के लिए 27.42 प्रतिशत, चौथे के लिए 18.89 प्रतिशत, पांचवें के लिए 10.37 प्रतिशत और छठे जिलों के कलस्टर के लिए 13.38 प्रतिशत प्रीमियम तय किया गया. इसे राज्य सरकार ने अधिक और अतार्किक बताया है.सहकारिता विभाग के अधिकारी ने बताया कि नयी पीएम फसल बीमा योजना में राज्य सरकार को लगभग दो गुणा से अधिक राज्यांश मद में खर्च करना होगा. खरीफ फसल में प्रीमियम मद में अब तक राज्य सरकार को अधिकतम 192.22 और बीमा क्षति पूर्ति मद में 685.06 करोड़ रुपये देना पड़ा है.

 

सहकारिता मंत्री आलोक मेहता ने कहा कि केंद्र बिहार को विशेष राज्य का दर्जा भी नहीं‍ दे रहा व दूसरे राज्यों की तुलना में यहां प्रीमियम राशि भी अधिक है. उन्होंने कहा कि हम किसानों के लाभ के लिए बीमा चाहते हैं न कि बीमा कंपनियों के लाभ के लिए. बिहार का बक्सर और बलिया जिले के मौसम, मिट्टी, वातावरण आदि सब एक समान है. एक ही रिस्क फैक्टर है, पर बक्सर के लिए प्रीमियम दर 14 प्रतिशत और बलिया की प्रीमियम दर चार प्रतिशत तय की गयी है.

इसे कैसे स्वीकार किया जाये? उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार से पूर्व में ही हमलोगों ने कहा था कि प्रीमियम दर में सिलिंग और एकरूपता होना चाहिए. इसे केंद्र सरकार ने अनसुना कर दिया. मेहता ने कहा कि पूर्वी राज्यों के काउंसिल की बैठक में भी मुख्यमंत्री ने इसे गंभीरतापूर्वक उठया था, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना. उन्होंने कहा कि बीमा के लिए अब राज्य में अधिकतम 650 करोड़ रुपये खर्च किया गया है. बीमा कंपनियों के वर्तमान दर से 1500 करोड़ रुपये खर्च करना होगा. ऐसे में इस बीमा का कोई मतलब नहीं होगा.

राजनीतिक कारणों से भाग रही है बिहार सरकार

तो कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि बिहार सरकार राजनीतिक कारणों से पीएम फसल बीमा योजना लागू नहीं कर रही है. सीएम ऐसा तर्क दे रहे हैं जैसे लगता है कि बिहार देश से अलग हो. सभी राज्य प्रीमियम के 50: 50 फार्मूले पर तैयार हैं, पर बिहार बहाने बना रहा है.

 

प्रधानमंत्री मोदी से बिहार के हक की मांग करेंगे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री का सबसे बडा सपना और मुद्दा है बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाना मगर पटना से दिल्ली तक अपनी पूरी शक्ति लगाने के बाद भी वह बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिलवा पाये है।  इतने के बाद भी नीतीश कुमार हार नहीं माने है।  एक बार फिर वह विशेष राज्य का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष उठायेंगे।

 

नई दिल्ली में आयोजित अंतर-राज्य परिषद की बैठक में नीतीश कुमार फिर से विशेष राज्य और राज्य के लिए लंबित विशेष पैकेज के मुद्दे को उठाएंगे.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अंतर-राज्य परिषद नई दिल्ली में 16 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुलाई गई बैठक में भाग लेने की उम्मीद की जा रही है. इस बैठक में नीतीश कुमार मोदी से बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग सहित विशेष पैकेज की घोषणा की राशी के मुद्दों को भी रखेंगे.

 

आपको बता दे कि बिहार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चुनाव से पहले बड़ी घोषणा की गई थी जो लंबित चल रही है. चूंकि अंतर-राज्य परिषद की बैठक लगभग एक दशक के अंतराल के बाद आयोजित की जा रही है और इस बैठक में राज्यों के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाएगी. एेसे में बिहार के पास इस बैठक के पटल पर रखने के लिए तमाम मुद्दे हैं जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बैठक में रखेंगे.

 

ज्ञात हो कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का मामला बहुत पुराना है। केंद्र में यूपीए सरकार के समय में नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में भी रैली कर चुके है।  मनमोहन सरकार ने इसके लिए रघुराम राजन के नेतृत्व में आयोग गठित किया था मगर उसके रिपोर्ट को लागू नहीं किया।  बीजेपी भी विशेष राज्य के मुद्दे पर नीतीश के साथ थी और वादा किया था कि सरकार में आने के बाद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगी मगर सरकार बनने के बाद वह इसे नजरअंदाज कर रही है।

नीतीश कुमार ने दिया प्रधानमंत्री मोदी को एक अॉफर

 मेदिनीनगर (पलामू) : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला अॉफर देते हुए कहा है कि अगर देश में पूर्ण शराबबंदी करा दें तो मैं योगा दिवस में जरूर भाग लूंगा। 

 

पलामू में आयोजित महिला सम्मेलन में नीतीश ने कहा कि शराबबंदी के बिना योग का कोई मतलब नहीं है।  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अाह्वान पर पूरे देश में 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है. यदि इसके पूर्व 20 जून को प्रधानमंत्री देश में शराबबंदी को लागू करते हैं, तो मैं भी उनके साथ 21 जून को होनेवाले योग दिवस में शामिल होऊंगा.

 

 

शराब बंद किये बिना योग की बात बेमानी है। लोग योगाभ्यास इसलिए करते हैं कि शरीर स्वस्थ रहे, लेकिन नशापान करने से शरीर स्वस्थ नहीं रह पाता, इसलिए प्रधानमंत्री अगर सच्चे मन से लोगों को स्वस्थ बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें शराबबंदी को लागू करनी चाहिए। वह शुरू से ही योग करते हैं, योग कोई प्रचार की चीज नहीं है।

 

नीतीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शराबबंदी के पक्षधर हैं। गुजरात में पहले से ही शराबबंदी थी,जब मोदी वहां के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने भी गुजरात में इसे जारी रखा। आज तो वे देश के प्रधानमंत्री हैं।उन्हें पूरे देश में शराबबंदी लागू करनी चाहिए। पूरे देश में न सही, लेकिन उन्हें कम-से-कम भाजपा शािसत राज्यों में तत्काल शराब बंद करानी चाहिए।

 

झारखंड सरकार भी सहयाेग करे
शराबबंदी के बाद झारखंड सरकार से भी अपेक्षित सहयोग की अपील की गयी थी. सम्मेलन में नीतीश कुमार ने वह पत्र पढ़ कर भी सुनाया, जो उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को भेजा था.
सीएम ने उस पत्र का जवाब दिया था, जसिमें यह कहा गया था कि पत्र को आवश्यक कार्रवाई के लिए उत्पाद विभाग को भेज दिया था. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि शराबबंदी में सहयोग करने के नाम पर झारखंड सरकार ने यही किया कि बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में शराब का कोटा बढ़ा दिया. पलामू में 50% व गढ़वा में शराब का 45% कोटा बढ़ा दिया गया. ऐसे में समझा जा सकता है कि झारखंड सरकार का सोच क्या है?

 

उन्होंने कहा कि झारखंड की महिलाएं जाग चुकी हैं. वैसे झारखंड की जो सरकार है, वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं है, क्योंकि वह रिमोट पर चल रही है.
उन्होंने कहा कि यदि रघुवर दास नहीं सुन रहे हैं, ताे कोई बात नहीं, बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में जब भी झारखंड में सरकार बनेगी, तो सबसे पहला काम सूबे में शराबबंदी होगी.

 
उन्होंने कहा कि शराब के नाम पर आदिवासियों को बदनाम करने का काम किया जाता है, जबकि झारखंड के बड़े आदिवासी नेता शिबू सोरेन ने खुद शराबबंदी का अभियान चलाया था. उन्होंने पलामू में सम्मेलन आयोजन के लिए पूर्व मंत्री सुधा चौधरी को बधाई दी. सम्मेलन को बिहार के संसदीय कार्य मंत्री श्रवण कुमार, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, बिहार के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जलेश्वर महतो सहित कई लोगों ने भी संबोधित किया.