बच्चों को बिहारी संस्कृति और छठ से जुड़े रखने को स्वीडन में अकेले छठ करती हैं नम्रता

छठ पूजा सबसे कठिन पर्व में से एक है मगर इसकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। इस पर्व के प्रति लोगों की आस्था इतनी बड़ी है कि वो दुनिया में जहां भी जाए, यह पर्व उनके साथ जाता है।

भारत में खासकर बिहार में छठ करना विदेशों के तुलना में आसान है। मगर जो लोग विदेशों में जाकर छठ करते हैं – उनके लिए छठ की तैयारी करना एक बहुत बड़ी चुनौती है।

बिहार के औरंगाबाद की नम्रता प्रसाद लगातार 2 साल से स्वीडन के स्टॉकहोम में अकेले छठ कर रही है। कोरोना महामारी के कारण इस बार कोई इनको मदद करने भी नहीं आ पाया मगर इसके बावजूद उन्होंने इस परंपरा को जारी रखा है।

स्टॉकहोम में पूजा सामग्री नहीं मिलता है। इसके लिए उन्होंने विशेष इंतजाम करवाया। इसी तरह वहां दिया नहीं मिलने पर उन्होंने आटा से ही दिया बना लिया।

एक तो वहां माइनस एक डिग्री तापमान वाली ठंड है और वहां पानी में कुछ डालने की रोक है। इसके उपाय में पूजा में या तो बाल्कनी में या बाथ टब में करना पड़ता है। रसोई घर छोटा है और अलग चूल्हा नहीं है। इसके लिए नम्रता ने छठ के लिए विशेष बर्नर स्टोव खरीद कर लाई।

आटा का दिया

आटा का दिया

नम्रता कहती है कि जहां चाह है, वही राह है। अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए और अपने बच्चों को आस्था के इस पर्व से जोड़कर रखने के लिए वे इस पर्व को करती है।

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