मोदी सरकार आरक्षण के नाम पर कर रही है सामाजिक अन्याय

पिछड़ों का रिजर्वेशन को खत्म नहीं किया गया है मगर सवर्णों को उससे भी ज्यादा अनुपात में रिजर्वेशन देकर यह सरकार असमानता की खाई और बढ़ा रही है

कहने के लिए दलितों और पिछड़ों के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, मगर हकीक़त में उसका उलटा हो रहा है। दलित और पिछड़े वर्ग की आबादी लगभग 80% है, मगर उसको मात्र 49.5 प्रतिसत आरक्षण दिया गया है। वहीं अपनी आबादी से कई गुना ज्यादा अनुपात में प्रतिनिधित्व हासिल किए सवर्णों की संख्या मात्र 20% के आस पास है, मगर उन्हें अकेले 10% रिजर्वेशन दे दिया गया है।

अब इसका दुष्परिणाम देखिए – अब अधिकतर शैक्षणिक और रोजगार के सरकारी अवसरों के होने वाले प्रतियोगिता परीक्षाओं में ओबीसी का कट ऑफ EWS से ज्यादा आ रहा है। यहां तक कि इस बार के यूपीएससी के हर राउंड में EWS का कट ऑफ ओबीसी से काफी कम रहा है। इसके अलावा नेट और जेआरएफ जैसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में भी यही हाल है।

इस साल आए बिहार पुलिस के इंस्पेक्टर पद पर भर्ती के लिए हुए परीक्षा में ओबीसी के लिए कट ऑफ 125.2 था, वही EWS के लिए मात्र 117.6 कट ऑफ था।

वहीं कॉलेज एडमिशन में भी यह अन्याय अब दिख रहा है। हाल ही में आरा के वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के स्नातक में एडमिशन के लिए जारी हुए कट ऑफ में – कॉलेजों के ज्यादातर कोर्स का ओबीसी कट ऑफ EWS से काफी ज्यादा है। मैंने बिहार बोर्ड के मुजफ्फरपुर जिले के इंटर कॉलेजों में दाखिले के लिए जारी मेरिट लिस्ट का का केस स्टडी किया – उसमें 113 कॉलेज ऐसे थे, जिसके लिए ओबीसी और EWS दोनों के लिए कट ऑफ निकाला गया था। 113 कॉलेजों में से 100 कॉलेजों में ओबीसी कट ऑफ ज्यादा है, वहीं मात्र 13 कॉलेजों में EWS का कट ऑफ ज्यादा है।

आप देख सकते हैं कि हर स्तर पर रिजर्वेशन के पीछे सामाजिक अन्याय हो रहा है। रिजर्वेशन का मूल उद्देश्य था कि जिन वर्गों का प्रतिनिधित्व कम है, उसको उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए। पिछड़ों का रिजर्वेशन को खत्म नहीं किया गया है मगर सवर्णों को उससे भी ज्यादा अनुपात में रिजर्वेशन देकर यह सरकार असमानता की खाई और बढ़ा रही है।

इतना सब हो रहा है मगर मिडिया शांत है। यहां भी प्रतिनिधित्व का मामला आता है – जो मिडिया खुद ब्राह्मणवादी है, उससे आप पिछड़ों के सामाजिक न्याय के पक्ष में बोलने का उम्मीद नहीं रख सकते हैं। अब जब सभी वर्ग को आरक्षण के दायरे में ला ही दिया गया है तो जाती आधारित जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुरूप आरक्षण दिया जाना चाहिए। जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी! #reservation

– अविनाश कुमार 

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