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कोरोना काल में बिहार के बदहाल व्यवस्था पर पटना हाई कोर्ट की खामोसी?

लॉकडाउन के दौरान अप्रवासी मजदूरों की समस्याओं पर हाई कोर्ट ने चुप ही रहना उचित समझा

आजज बिहार में कोरोना संक्रमण की संख्या राज्य में 33 हजार पर पहुँच गयी तब जाकर जनहित याचिका पर पटना हाईकोर्ट ने अपनी नींद खोली और राज्य सरकार से स्वास्थ्य व्यवस्था पर जबाब तलब किया। साथ ही पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कोरोना संकट से निबटने, कोरोना मरीजों के जांच व इलाज की व्यवस्था का पूरा ब्योरा तलब किया है। साथ ही जिलास्तरीय कोविड अस्पतालों की जानकारी, वहां तैनात डॉक्टरों, नर्स, पैरा मेडिकल स्टाफों का विस्तृत ब्योरा देने का आदेश दिया है।

इसके अलावा कोर्ट ने कहा है कि पटना एम्स, पीएमसीएच और एनएमसीएच जैसे बड़े अस्पतालों में बड़ी बदइंतजामी है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। क्या यह प्रश्न हाईकोर्ट को लॉकडाउन के दौरान सरकार की तैयारियों के वक्त नहीं पूछना था? लेकिन उस वक्त सभी को राज्य में चंगा सा लग रहा था।

आज जिस तरह से राज्य की हाईकोर्ट जनहित याचिका पर सामने आया है उसे हिन्दी फिल्मों में एक कहावत से बहुत करीब ले जाता है – “पुलिस हमेशा घटना से बाद आती है।”

यही कहावत अगर हम आज के परिदृश्य में देखे तो यह कह सकते है कि बिहार हाईकोर्ट का भी कुछ ऐसा ही भूमिका हो गयी है, खासकर इस कोरोना संकट काल में| मार्च में शुरू हुआ यह संकट काल में राज्य में स्वास्थ्य संरचनाओं की स्थिति, मजदूरों की स्थिति, पलायन कर आने वाले लोगों की रोजगार की स्थिति, कोरोना जाँच की असंतोष जनक स्थिति आदि अनेक जनसमुदाय से जुड़े मुद्दों पर पूरे राज्य व देश के लोग चिंतित थे – लेकिन अगर कोई चिंतित नही लग रहा था तो वह सत्ता में बैठे लोग और उनसे भी निश्चिंत मुद्रा में था बिहार हैं कोर्ट।

भविष्य में जब कोरोना काल का इतिहास बिहार के न्यायलय की भूमिका पर लिखा जाएगा तब यह भी अंकित होगा कि जब देश में अधिकांश राज्यों की हाई कोर्ट प्रवासी मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए आगे आ रही थी बिहार की हाई कोर्ट खामोश क्यों थी। जबकि कोरोना काल मे सबसे ज्यादा राज्य के ही प्रवासी लोग प्रभावित हुए है।

जब लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से अप्रवासी मजदूर व जनता सैकड़ो व हजारों मीलों की पैदल दूरी या अन्य निजी वाहनों से खुद के भरोसे पर अपने अपने गृह प्रदेश की ओर चल दिये। उस वक्त इन अप्रवासी लोगों की जो अमानवीय स्थिति की तस्वीरें आ रही थी उसे देख कर आम व खास लोगो का मन विचलित हुआ, जो एक स्वभाविक मानवीय लक्षण होता है। इसी अमानवीय स्थिति को देखते हुए देश के कुछ राज्यों के हाई कोर्ट ने स्वत: तथा कुछ हाई कोर्ट ने जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए स्थानीय राज्य सरकारों को इन अप्रवासियों की सुविधा हेतू समुचित उपाए करने के आदेश दिया व अपने दिए गए आदेश पर राज्यो से जबाब मांगा।

मद्रास की अदालत ने प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा का जिक्र करते हुए कहा, “पिछले एक महीने से मीडिया में प्रवासी मजदूरों की दिख रही दयनीय स्थिति को देखकर कोई भी अपने आंसुओं को नहीं रोक सकता है.” न्यायमूर्ति एन किरुबाकरन और न्यायमूर्ति आर हेमलता की पीठ ने कहा, ‘‘यह मानवीय त्रासदी के अलावा कुछ नहीं है…”लेकिन उस समय भी बिहार हाई कोर्ट चुप ही रहा। जबकि इन अप्रवासी लोगों में बिहार के लोगो की संख्या सबसे ज्यादा थी। और उस दौर में सबसे अमानवीय तरीको से बिहार के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

जहाँ बिहार की राज्य सरकार मदद देने की दम भरते रहे और सहायता पहुँचाने के विभिन्न तरीके अपनाये। लेकिन इन तरीकों व उपायों से कितने अप्रवासी लोगो को कितनी सहायता मिली इसकी कोई ठोस स्वतंत्र जानकारी नहीं है। जो सरकार के द्वारा आंकड़े बताये गए थे बस वही है।

पूर्ण लॉकडाउन के दौरान अप्रवासी मजदूरों की समस्याओं पर हाई कोर्ट ने चुप ही रहना उचित समझा।

लॉकडाउन के दौरान बिहार सरकार की स्वास्थ्य तैयारी क्या है – इसकी जानकारी भी लेना हाई कोर्ट ने उचित नही समझा जबकि बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत किसी से छुपी हुई नही है। कोरोना लॉकडाउन काल में हाई कोर्ट साइलेंट मोड में दिखाई दे रही थी| उसे न बिहार में वापस आयी जनसंख्या के रोजगार, भोजन व्यवस्था व स्वास्थ्य की दशा पर सरकारी तैयारियों की ओर ध्यान देने की भी खुद जहमत नही उठाई।

हाई कोर्ट को अगर इस बेकाबू होते कोरोना स्थिति का इल्म न हो यह मैं नही मान सकता। जबकि एक बिहारी जो थोड़ा भी राज्य व देश की स्थिति पर रुचि रखता हो वह आपको आसानी से बता देगा कि कोरोना संकट में बिहार की स्थिति भयावक होने वाली है, लेकिन हाई कोर्ट को सब चंगा लग रहा था।

अनलॉक फेज 1 के दौरान बिहार में जिस प्रकार सरकार व उसके सहयोगियों के द्वारा चुनावी माहौल बनाने की तैयारी किया गया उससे सरकार की कोरोना की स्थिति की गंभीरता को दरकिनार किया। इसके लिए सत्ता पक्ष के लोगों ने जनमानस में सब कुछ सामान्य दिखाने का प्रयास किया गया ताकि अपनी वर्चुअल चुनावी रैलियों को जोर शोर से चलाया जा सके।

वर्चुअल रैली में लोगो को एकत्रित कर चुनावी माहौल तैयार किया जाने लगा। राज्य की एक खास पार्टी के नेताओ व कार्यकर्ताओं का संक्रमित होना इसका प्रमाण है कि अनलॉक फेजो में कोरोना बचाव से संबंधित दिशा निर्देशों का कितना पालन किया गया है। यह चुनावी गतिविधियों के भी एक महत्वपूर्ण कारक है कोरोना के फैलाव का राज्य में।

जब सरकार को कोरोना के लॉकडाउन के दोरान जितने भी कोविड अस्थाई अस्पताल बनाने का ऐलान किया वह अभी तक नही बन बन पाया, लेकिन उसके बावजूद सरकार राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के बदले चुनावी माहौल में रमना ज्यादा मुनासिब समझा। इसके बावजूद राज्य का हाई कोर्ट चुप रहा। आज जब जनता के साथ वीवीआईपी नेता, मंत्री व अधिकारी संक्रमित हो रहे है व व्यवस्था चरमरा गई है तो जनहित याचिका आने पर हाई कोर्ट जग व सरकार से जबाब तलब किया। इसे फिल्मी रूप से घटना घटने पर पुलिस का आना जैसा कहना उचित होगा।

लोकतंत्र में सभी संवैधानिक व्यवस्था व संस्थाएं जनता के प्रश्न के दायरे से बाहर नही हो सकती। फिर वह कोर्ट ही क्यों न हो। जनता के हित के प्रति उनकी भी जबाबदेही बनती है कि वे स्थिति गंभीरता को समझते हुए जनहित की याचिकाओं का इंतिजार न करते हुये स्वतः संज्ञान लेते हुए जनमानस का अधिकार को संरक्षण प्रदान करें। क्योंकि आज भी देश की न्यायालयों पर आम जनता का भरोसा आज भी कायम है। उसे यकीन है की तमाम कठिनाइयों के बावजूद देश में न्यायालय अपने कर्तव्यों से पीछे नही हटेगा।

– Jokhan Sharma, Research Scholar

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