जमीनी हकीकत से परिचय: बिहार के ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था पर कोरोना संकट का प्रभाव

देश मे इंटरनेट की उपलब्धता भी उस स्तर पर नहीं है कि 4-5 घंटे ऑनलाइन पढ़ाई किया जा सके

भारत में कोरोना संकट में सबसे प्रथम प्रभावित होने वाली अगर कोई व्यवस्था थी, तो वह शिक्षा व्यवस्था थी। आज भी शिक्षण और मूल्यांकन आधारित स्कूली शिक्षा की संरचना इस कोरोना लोकडाउन में सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। अगर बिहार के संदर्भ में इसका आकलन करे तो हम कह सकते है कि पहले से ही शिक्षा के क्षेत्र मे पिछड़े अपने राज्य पर मानों मुसीबतों का पहाड़ गिर गया है। आज बिहार जहाँ गरीबी, भुखमरी, पलायन आदि समस्याओं से ग्रस्त हो चुका है वहाँ शिक्षा के स्तर को बनाए रखना एक असंभव कार्य सा महसूस होता है।

प्राचीन काल से ही बिहार का इतिहास शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत गरिमामय रहा है यह भूमि विश्व में ज्ञान का प्रकाश फ़ैलाने हेतु स्थापित नालंदा, विक्रमशिला, तेलहड़ा (Telhara) (एएसआई अप्रकाशित रिपोर्ट) जैसे विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों की जननी भी रही है। इस भूमि ने विश्व को अशोक, चंद्रगुप्त आदि प्रतापी शासक ही नहीं वरन चाणक्य, कौटिल्य, आर्यभट्ट, पाणिनी, महावीर, गुरू गोविंद, दिनकर आदि जैसे विद्वता व महानता के प्रतिरूप व्यक्तित्व भी दिये हैं ।

निजी स्कूलों का अपना प्रयास व सीमा

बिहार के संदर्भ में देखा जाए तो कोरोना संकट काल में राज्य के सभी वर्गों के विद्यार्थियों की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव हुआ है। जहाँ उच्च आय वर्ग व मध्यम आय वर्ग के अधिकांश बच्चे स्थानीय निजी स्कूलों में अध्ययनरत हैं वहीं इन उपरोक्त वर्गों के इतर समाज के निम्न वर्ग व हासिये पर जीने वाले लोगों के बच्चे सरकारी विद्यालयों के भरोसे ही अपना अध्ययन करते हैं । वर्तमान में बिहार के लगभग सभी निजी स्कूल ऑनलाइन तरीकों को अपनाकर शिक्षण कार्य सुचारू रूप से कर रहे हैं। शिक्षक विजुवल तकनीक से अध्यापन कार्य करते हुए छात्रों की शैक्षणिक शंकाओं का समाधान कर रहे हैं, उनको होमवर्क दे रहे हैं, व चेक कर रहे हैं जो कि एक अच्छा प्रयास है। दूसरी ओर राज्य के कम आय वाले निजी और सरकारी स्कूल है, जो ई-लर्निंग शिक्षा के मूलभूत संसाधनों के अभाव में पूरी तरह से बंद हो चुके है।

इंटरनेट आधारित शिक्षा की अपनी समस्याएं

एक कटु सत्य यह भी है कि इन सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांशत: बच्चो के घर में ऑनलाइन पढ़ने के लिए उचित डिजिटल सूचना माध्यमों जैसे स्मार्टफोन, लैपटॉप, कम्प्यूटर व इंटरनेट कनेक्शन आदि की सुविधा उपलब्ध न हो पाने के कारण वे घर से अपनी पढाई नियमित नहीं रख पा रहे हैं। जिन परिवारों में एक से ज्यादा बच्चे स्कूल जाते हो और उनकी कक्षाएं अलग – अलग है उन परिवारों को ऑनलाइन पढ़ाई करवाने हेतु अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इन सबके अलावा अभी देश मे इंटरनेट की उपलब्धता भी उस स्तर पर नहीं है कि 4-5 घंटे ऑनलाइन पढ़ाई किया जा सके।

अधिकांशत: परिवार 1.5 जीबी से लेकर 2 जीबी प्रतिदिन के हिसाब से इंटरनेट पैक की सुविधा का प्रयोग अपने दैनिक इस्तेमाल में करते है इसके साथ ही इंटरनेट की धीमी स्पीड भी एक प्रमुख समस्या है।

दूसरी ओर, वैसे माता – पिता जो अपने व्यक्तिगत व आधिकारिक कार्यों के लिए स्मार्टफोन व लैपटाप पर निर्भर हैं, उनको अपनी सूचनाओं की सुरक्षा की चिंता भी हो रही है। क्योंकि प्रकाशित वैज्ञानिक शोधो के अनुसार ऑनलाइन सूचना तकनीकी के द्वारा लोगों की व्यक्तिगत सूचनाओं को भी साझा किया जा सकता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भारत सरकार द्वारा अपने सरकारी संस्थानो में ‘ज़ूम एप’ के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध से संबन्धित आदेश को जारी करना है। हम आए दिन पढ़ते रहते हैं कि लोगों के स्मार्टफोन हैक हो रहे हैं जिसके माध्यम से लोगों की निजी सूचनाओं का गलत उपयोग किया जा रहा है। लोगों के बैंक अकाउंट से पैसे निकल रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों में डिजिटल यंत्रों के प्रति जागरूकता का अभाव कहीं न कहीं इस डिजिटल शिक्षा के मार्ग में अवरोध का काम कर रहा है। उपरोक्त परिस्थितियों में अभिभावकों के लिए बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई सुनिश्चित करवाना एक कठिन कार्य होता जा रहा है।

The Bihar government has relaxed the criterion for availability of land for setting up a high school.

ग्रामीण समाज के लिए शिक्षा का महत्व

छात्रों के जीवन की शैक्षणिक नींव प्रारंभिक शिक्षा के मंदिर यानि स्कूल से ही पड़ती है। कोविड -19 महामारी संकट बिहार की ग्रामीण प्राथमिक शिक्षा के लिए एक गंभीर संकट बन कर आया है। ग्रामीण क्षेत्र में अगर शिक्षा की बात की जाए तो स्कूल नामक स्थान समाज के अंतिम पायदान पर खड़े विद्यार्थियों का एक मात्र सहारा है। बिहार जैसे पिछड़े राज्य के ग्रामीण समाज के लिए स्कूल शिक्षा ग्रहण करने का एक आसान व प्रमुख केंद्र है।

ग्रामीण भारत में लगभग 96 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में नामांकित हैं, जहाँ 6-14 वर्ष की आयु के लड़के और लड़कियों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है।

इन स्कूलों में जाने वाले बच्चे आम तौर पर गरीब सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होते हैं जो स्कूल के बुनियादी ढांचे द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा के साथ जुड़े कुछ अन्य सुविधाओं जिनमे मध्याह्न भोजन (एमडीएम) पर भी पूर्ण रूप से निर्भर होते हैं। स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा के साथ-साथ एक समय का पोषण युक्त भोजन यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को कुपोषित होने से बचाता है। आज भी सरकारी स्कूल निर्दिष्ट पौष्टिक मानदंडों और आयु-श्रेणी वाले कैलोरी मानकों के साथ पकाए गए मध्याह्न भोजन (एमडीएम) प्रदान करते हैं। विश्व पटल पर भारत में ज्यादा कुपोषित बच्चों खास कर लड़कियों की संख्या को ध्यान में रखते हुए उनके अभिभावक को यह आस रहती है कि स्कूल जाने पर दिन में कम से कम मध्याह्न भोजन (एमडीएम) के कारण एक समय तो पोषक तत्वों से युक्त भोजन प्राप्त होगा। यह भोजन ऐसे बच्चों के लिए कुपोषण से लड़ने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।


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कोरोना का ग्रामीण शिक्षा पर पड़ने वाला प्रभाव

बिहार में COVID-19 का प्रभाव अगर शिक्षा के स्तर पर देखे तो हम पाते हैं कि इसका प्रभाव शहरों की तुलना में ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था पर अधिक पड़ा है। बिहार राज्य के लिए यह एक कठोर व वास्तविक सच्चाई है कि जब से कोरोना संकट में स्कूल बन्द हुआ है ग्रामीण शिक्षा का कार्य एकदम ठप पड़ गया है। खासकर समाज के उन पिछड़े वर्गो में जहाँ के बच्चे पूरी तरह स्कूल पर निर्भर रहते थे। राज्य में रहने वाले ऐसे वर्गो के बच्चे वास्तव में लॉकडाउन के बढ़ते जाने के क्रम मे शिक्षा की राह से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि ना इनके पास ऑनलाइन अध्ययन हेतु स्मार्टफोन है और न संचार के साधन जैसे टीवी व इंटरनेट। इन छात्रों के अभिभावकों की आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति भी इस लायक नही होती कि वे खुद इन्हें पढ़ा सके या ट्यूशन भेजकर शिक्षा ग्रहण करवा सके। गाँव का सरकारी स्कूल ही उनके लिए एकमात्र शिक्षा व स्वस्थ जीवन का स्रोत है।

जबकि राज्य के शहरी छात्रों को ट्यूशन शिक्षकों और शिक्षित माता-पिता का मार्गदर्शन मिल रहा है, साथ ही साथ वे संचार तकनीकी का भी सहारा ले पाने मे सक्षम हैं। यही कारण है कि शहरी क्षेत्रों व उच्च वर्गों के बच्चे अपने पाठ को पुनः पढ़ पाने में सक्षम हैं । लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों का पढ़ाई-लिखाई ठप पड़ा हुआ है। लॉकडाउन के बाद जब स्कूल फिर से खुल जाएगा तो ग्रामीण छात्रों को अपनी शिक्षा की शुरुआत से रिबूट करनी पड़ेगी यानि दुबारा लय पकड़ने के लिए शुरुवात से पढ़ाई करनी पड़ेगी।

ग्रामीण क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षा की सच्चाई

यह भी संभव है कि कोरोना संकट देश व राज्य की शिक्षा व्यवस्था में स्कूली शिक्षा प्रणाली के ढांचे को कुछ हद तक बदल दे और डिजिटल शिक्षा का स्वरूप ले ले, लेकिन यह कहना भी सही नही होगा कि यह सीखने और सिखाने की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है। सरकार भले ही लॉकडाउन 2.0 के शुरू होने से पहले ही देश के कई भागों में डिजिटल तकनीकी जिसमें टीवी के माध्यम से, इंटरनेट आधारित ऑनलाइन माध्यम से तथा मोबाइल-आधारित डिजिटल शिक्षण माध्यम जैसे मॉडलो पर काम शुरू कर दिया हो लेकिन सच्चाई यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्र आज भी इन सुविधाओं से कोसो दूर है।

इसका प्रमाण यूनिसेफ़ से जुड़े विशेषज्ञों की राय है जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100 व्यक्तियों पर 21.76 प्रतिशत व्यक्ति ही इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार,ऑनलाइन अवश्य ही एक मजबूत माध्यम है लेकिन इससे केवल 20 से 30 प्रतिशत छात्रों को ही लाभ पहुँचाया जा सकता है ।

ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को सुचारु करने हेतु सुझाव

डबल्यूएचओ द्वारा दिए गए वक्तव्य के अनुसार, कोरोना वाइरस का संकट जल्दी जाने वाला नहीं है, अपितु हमे इसके साथ ही जीना सीखना होगा। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि जब हमे इसके साथ ही जीना है तो क्यों न इस बीमारी के बचाव से संबन्धित सुरक्षा उपायों के प्रति ईमानदारी बरतते हुए जीना सीखा लिया जाये। कोरोना संकट के इस दौर में बुरी तरह प्रभावित होने वाली शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार व जनता दोनों को मिल कर कार्य करने की आवश्यकता है।

इसके लिए सरकार को डिजिटल शिक्षा के अवसर देने के साथ अपनी पारंपरिक स्कूली शिक्षा प्रणाली का भी जीर्णोद्धार करना होगा। इसके लिए सरकार व जनता मिल कर कुछ साधारण सुझावों पर अनुसरण करे तो ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को सुचारु रूप से जारी रखने में सहयोग किया जा सकता है :-

1. सर्वप्रथम राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सभी हितधारकों जिसमें मंत्री, संतरी, अधिकारी, शिक्षक, अभिभावक व छात्रगण सभी की मानसिकता में बदलाव लाना जरूरी है। बिहार की शिक्षा की वर्तमान स्थिति के पीछे उपरोक्त सभी के मन में सरकारी शिक्षा के प्रति उपेक्षा का भाव होना प्रमुख है। इसकी जांच कोई भी अपने क्षेत्र के सरकारी शिक्षा व्यवस्था के अवलोकन से कर सकता है।

2. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित सरकारी विद्यालयों को क्वारंटीन सेंटर में बदला गया है उन्हें चरणबद्ध तरीकों से मुक्त किया जाना चाहिए इसके बाद पूरे परिसर को सैनेटाइज़ कर वाइरस मुक्त करना चाहिए। इसके बदले ग्राम के सामुदायिक व अन्य भवनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

3. सरकार सभी स्वास्थ्य सुरक्षा के तरीके अपनाते हुए पुनः देश की अर्थव्यवस्था को खड़ा करने में लगी है, ठीक उसी तरह कोरोना से बचाव हेतु सभी स्वास्थ्य संबन्धित दिशा – निर्देशों को अपनाते हुए स्कूली शिक्षा को पुनः चालू करने की कवायद शुरू करनी चाहिए।

4. स्थानीय ग्रामीण जन – प्रतिनिधियों को अपनी पूर्ण ज़िम्मेदारी का निर्धारण करते हुए जनता की सहभागिता से क्षेत्र में कोरोना से बचाव व स्वास्थ्य संबन्धित जागरूकता अभियान चला कर लोगों को सरकार द्वारा दिए गए स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों का पालन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। साथ ही साथ सूचना के माध्यम से भी लोगों को जागरूक व तैयार करना चाहिए।

5. सरकारी योजनाओं में प्रखण्ड व पंचायत स्तर पर आवासीय शिक्षण व्यवस्थाओं के प्रारूप पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिससे कि भविष्य में इस तरह के संकट के समय बाहरी दुनिया के संपर्क से दूर रख कर विद्यालयों की शिक्षा को बचाया जा सके।

6. ग्रामीण स्तर पर सामुदायिक रेडियों संचार माध्यम पर निवेश करना चाहिए ताकि इसके प्रसारण के माध्यम से समुदाय स्तर पर विद्यार्थियों को शिक्षित किया जा सके ।

7. सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटबिलिटी और क्राई (Child Rights & You/CRY) की संयुक्त रिपोर्ट यह कहती है कि राज्य सरकार शिक्षकों के प्रशिक्षण पर खर्च न के बराबर कर रही है। जिसके कारण राज्य के विद्यालयों में प्रशिक्षित व पेशेवर शिक्षकों की कमी है। इसका प्रभाव शिक्षा के गुणवत्ता पर भी साफ देखने को मिलता है। इस रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्तर पर 39 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 35 प्रतिशत शिक्षक पेशेवर रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। कोरोना संकट मे जब शिक्षा व्यवस्था बदलाव के दौर से गुजर रही है तो बदलते समय व तकनीक के अनुरूप शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ।

8. शिक्षको के शिक्षण कार्य तक ही सीमित रखना भी इस दिशा में बदलाव की ओर पहला कदम साबित हो सकता है। गैर-शिक्षण कार्यों के बोझ होने के कारण शिक्षण कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाते। शिक्षकों के गैर – शिक्षण कार्यों का उदाहरण इसी से देखने को मिलता है कि किसी भी प्रखण्ड में चले जाइए वहाँ आपको बूथ लेबल ऑफिसर एक शिक्षक ही मिलेंगे।

9. शिक्षको की मूलभूत समस्याओं का निदान प्राथमिकता देते हुए करना चाहिए साथ ही साथ इनके कार्यों का मूल्यांकन समय-समय पर करना चाहिए। केवल खानापूर्ति करने का ही नतीजा है कि राज्य की सरकारी शिक्षा ध्वस्त होते जा रही है।


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लाकडाउन के दौरान ग्रामीण छात्रों की समस्याओं को देखते हुए ही हमारी माटी संस्था ने एक नयी योजना की शुरुवात करते हुए उत्तर प्रदेश के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय की स्थापना की है जिसके अंतर्गत निम्न वर्ग के 9-12 कक्षाओं के छात्रों को पुस्तक वितरित की गयी हैं। हमने उन छात्रों से पढ़ने के बाद पुस्तकों को वापस लेकर अन्य जरूरतमंद छात्रों तक पहुंचाने के उद्देश्य से इस पुस्तकालय की शुरुवात की है इस कदम की काफी लोगो द्वारा सराहना की गयी है जिसके परिणामस्वरूप हम इस प्रकार के प्रयास देश के अन्य राज्यों (जिसमे बिहार व झारखंड प्रमुख रूप से शामिल) में भी करने हेतु प्रयासरत हैं। पुस्तकालयों की स्थापना भी ग्रामीण छात्रों की शिक्षा में सुधार का एक महत्वपूर्ण प्रयास है

“अंततः मेरा मानना है कि लाख कमियों के बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्रामीण स्तर पर स्थापित स्कूल समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगो के अधिकार के लिए शिक्षा व पोषण का एक मात्र सहारा है। इसलिए बिहार सरकार इस अंतिम लॉकडाउन के बाद स्कूली शिक्षा को सुचारु करने के लिए सकारात्मक पहल करनी चाहिए।“

Article Written by:- Jokhan Sharma
(Research scholar)
Department of Anthropology
Central University of Odisha, Koraput
& Associated with MAATY Organisation, Dehradun

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