सदियों बाद भी गिरमिटिया मजदूरों को याद है बिहार, लेकिन हमने उन्हें भुला दिया

दुनिया में करीब 7-8 देश ऐसे हैं जहां एक बड़ी जनसंख्या बिहारी मूल की है, जहां के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति बिहारी मूल के लोग रह चुके हैं। उनमें से कई देश तो ऐसे हैं जहां अधिकांश वक़्त हेड ऑफ स्टेट कोई न कोई बिहारी मूल का व्यक्ति ही रहता आया है। अंग्रेजी शासनकाल में गिरमिटिया मजदूर (Girmitiya Labour from Bihar) के रूप में मॉरिशस, त्रिनिदाद एंड टोबैको, सूरीनाम, गुयाना, फ़िजी आदि अनेक देशों में भेजे गए बिहारी कभी लौट कर नहीं आ सके। वहीं बस गए, बढ़ते गए और आज वहां आयदर मेजर ऑर सिगनिफिकेंट संख्या में हैं।

पलायन के दो सदी बीतने के बाद आज भी इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो खुद को प्राउडली इंडियन ओरिजिन का बताते हैं। अपने ‘एंसेस्ट्रल ट्रेस’ को ढूंढ़ते हुए हर साल सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग बिहार में अपने पूर्वजों के मूल गांवों में आते हैं।

उनके दिल में बिहार आज भी जिंदा है, आज भी वो उन देशों में बिहार की भाषा संस्कृति को जिंदा रक्खे हुए हैं। कई पीढ़ियों के बीतने के बावजूद आज भी उन्हें बिहार याद है, लेकिन बिहार ने उन्हें भुला दिया है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बिहार की किसी सरकार ने कोशिश नहीं की की अपने इन बिछुरे टुकड़ों से संवाद स्थापित किया जाए। क्या ऐसा नहीं हो सकता था की बिहार सरकार कोई ऐसा कार्यक्रम करती की जिसमें इन देशों में बसने वाले बिहारियों को आमन्त्रित किया जाता, उन्हें अपने जड़ों से जुड़ने का मौका मिलता। बिहार के प्रति अप्रतिम प्रेम मन में संजोए इन विदेशज बिहारियों को इग्नोर करके बिहार ने कितना कुछ गंवाया है।

तस्वीर- मॉरिसस के राष्ट्रपति राजकेश्वर (अपने मूल गांव के यात्रा के दौरान, 2013)

– आदित्य मोहन 

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