तुम्हें बिहारी कहलाने में शर्म है, बिहार तुमसे शर्मिंदा है

 

बिहारी होना है पहचान विनम्र, श्रमी होने का,
अध्यवसायी, ईमानदार, तेजोदीप्त विक्रमी होने का |
बिहारी तो है इक भावना, सबको अपनाने का,
बिहारी बुद्ध की वीणा है, प्रेम गीत गाने का ||
फिर क्यों आज बना है बिहारी ‘शर्म’ का पर्याय,
‘साला बिहारी’ कैसे हो गया, हम कैसे समझायें|
आज उन्हें प्रत्युत्तर देता, यह इक कवि बिहारी,
मन-प्राणों में शोले भर दूँ, गर्व से कहो ‘बिहारी’ ||

 

बिहारी प्रतिभा पर ‘हँसने वाला’ पैदा नहीं हुआ | वर्षों पहले आचार्य रामलोचन शरण (11 फरवरी, 1889—14 मई, 1971) ने यह बात कही थी जो पहले भी प्रासंगिक थी, आज भी प्रासंगिक है और आगे भी रहेगी | इस व्यक्ति ने बिहार से प्रेम किया था-निःस्वार्थ प्रेम | उसने गर्व के साथ अपने को ‘रामलोचन बिहारी’ घोषित किया, और आज कई लोग ऐसे हैं जो बिहार से बाहर जाकर नौकरी या व्यवसाय करते हैं, किन्तु पूछने पर अपना मूल स्थान बिहार के बजाय कोई और राज्य बताते हैं |

रवीन्द्रनाथ टैगोर कहा करते थे—‘जो अपने प्रांत को प्यार करेगा, वही प्रांत की आधारभूमि भारत-वसुंधरा को प्यार करेगा |’

 

जो अपनापन रामलोचन को, उस ‘बिहारी’ को, अपने बिहार से था, वह अवर्णनीय है | उनके समकालीन लेखक ‘केसरी कुमार’ के अनुसार, ‘उस स्वनामधन्य बिहारी की दिवस की खोज और रात्रि के स्वप्न थे—बिहार की संस्कृति, बिहार का साहित्य | इस पावन आकांक्षा पर बिहार की श्रद्धा निछावर है |’ आचार्य का नाम सुनते ही मन श्रद्धा से भर जाता है | पूर्वांचल के अनेक साहित्यकारों एवं पत्रकारों का उत्साहवर्धन करने वाले आचार्य ने लहेरियासराय (दरभंगा) में पुस्तक भंडार की स्थापना कर उन्हें प्रश्रय भी प्रदान किया |

 

मुझे डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा के विदेशी अनुभवों में से एक घटना याद आ रही है | उन दिनों बिहार बंगाल के अन्दर था | लन्दन में किसी ने उनसे पूछा—‘ Mr. Sinha, which part of India do you belong to?’ (आप भारत के किस प्रान्त से आते हैं ?) | उन्होंने कहा-बिहार | उक्त सज्जन चकरा गए, क्योंकि बिहार का नाम नक़्शे में उन्होंने नहीं देखा था | उन्होंने कहा-‘बिहार !! अरे यह बिहार कहाँ है ?’ डाक्टर सिन्हा को यह बात लग गई | उन्होंने वहीं संकल्प किया कि मैं बिहार का नाम हिन्दुस्तान के नक़्शे में लिखवा दूँगा | अंततः उनका संकल्प फलित हुआ | यही डाक्टर सिन्हा संविधान-सभा के अस्थायी अध्यक्ष भी रहे |

भूगोल के पन्नों में जो दिखता है क्या वही बिहार है,
भारत में नहीं, दिलों में बस, अब कहीं बसा बिहार है |

कवि कहे वह जगह जहाँ है प्रेम बसे, अब तो वही बिहार है,

उज्ज्वल आत्म-उदय जहाँ होता, समझो वही बिहार है |~ अविनाश सिंह 

बात 2010 की है | मैं दिल्ली के लक्ष्मी नगर पहुँचा | नया-नया आया था | तत्काल रहने के लिए किराए पर कमरे की आवश्यकता थी | दो कमरे का फ्लैट मिल गया | मकान मालिक ने मुझे बताया कि वे छत्तीसगढ़ से हैं | कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी ने बताया कि वे बिहार के मधुबनी से हैं | पुनः यह बात जब मैंने मकान मालिक से पूछी तो उन्होंने घबराते हुए कहा कि वे छत्तीसगढ़ से ही हैं और उनकी पत्नी बिहार से हैं | अस्तु ! मैंने भी मगजमारी नहीं की | एक महीने पश्चात् उनके पिता उनके साथ कुछ दिनों के लिए रहने आए | मेरी शनिवार की छुट्टी थी तो समय बिताने वे मेरे पास आकर बैठ गए | बातों-बातों में पता चला वे सीतामढ़ी से हैं और उनकी बहू मधुबनी से | उनके लड़के की पढ़ाई-लिखाई सीतामढ़ी और मुज़फ़्फ़रपुर से हुई है | मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि उनके लड़के को अपने बिहारी होने की पहचान मुझसे छिपाकर क्या मिला ! ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो आए दिन किसी न किसी के साथ घटती ही होंगी और आपलोगों में कई लोग ऐसे भी होंगे जो उन्हीं की तरह अपनी बिहारी पहचान छुपाने की कोशिश करते होंगे | दिनकर याद आते हैं—-

सच्चाई की पहचान कि पानी साफ़ रहे
जो भी चाहे, ले परख जलाशय के तल को;
गहराई का वे भेद छिपाते हैं केवल,
जो जान-बूझ गदला करते अपने जल को |

 

कुछ ऐसे भी बिहारी भाई हैं जो दूसरे राज्यों या देशों में जाकर अपनी पहचान छुपाते हैं, उनसे भी यह लेखक-कवि अपनी कविता की भाषा में कुछ कहने का इच्छुक है—

बिहारी होकर भी जो तुम अपनी पहचान छिपाते हो,
बिहार की निंदा करके तुम पता नहीं क्या पाते हो ?

हे मेरे कुछ बिहारी भाई ! आप करते बिहार की निंदा हैं,

तुम्हें बिहारी कहलाने में है शर्म, बिहार तुमसे शर्मिंदा है !

जो किसी लोभ-मोह के वश में, अपनी खुद की पहचान छिपाते हैं,

वे कुटिल राजतंत्री और कपटी, जननी-जन्मभूमि की लाश को ढ़ोते हैं ।

अपने ही राज्य को गालियाँ देते, नकाब भद्रता का ओढ़,

ऐसे सज्जन ही कहलाते, संस्कृत-सभ्य समाज के कोढ़ ।

जो भद्रपुरुष हैं सोचते, क्यों बिहार के विकास में, दें हम अपना अंश,

ऐसे लोग हैं आज के शुम्भ-निशुम्भ, राक्षस रावण कंस ।

हे बदनसीब सज्जन, हे प्रणम्य दुर्जन, नयनसुखी हे अंधे,

विकलांग मानसिकता के अमीरों, अब बंद करो ये धंधे ।

विचार तुम्हारे हो गए दूषित, इसको अब तुम शुद्ध करो,

मानसिक संकीर्णता छोड़ो, खुद को तुम प्रबुद्ध करो ।

वरना बैकुंठ शुक्ल हमारे पास बहुत हैं, फणीन्द्रनाथ से हमें क्या काम !

पीर अली की कमी नहीं है, यजीदों से हमको क्या काम !

अब दूसरे प्रान्तवासी बिहारियों के लिए क्या सोचते हैं—यह देखा जाय | बेचारे रामलोचन शरण और डॉक्टर सिन्हा को नहीं पता था कि कालान्तर में ऐसी भी स्थिति उत्पन्न होगी जब दूसरे प्रान्तों के लोग बिहारी होने का अर्थ ‘अशिक्षित’, ‘असभ्य’ ‘अपराधी’ और सस्ते श्रमिक होने से लगाया करेंगे | दूसरे राज्यों में कई बार लोग बिहारियों को ‘साला बिहारी’ कहकर संबोधित करते हैं | संसाधनों की कमी, अपने राज्य में अवसरों की कमी, बढ़ते अपराधों के कारण जब बिहार के लोग बेहतर सुविधाओं एवं जिन्दगी की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और वहाँ अपनी शिक्षा, अपनी मेहनत के दम पर एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो वहाँ के स्थानीय निवासियों को यह लगता है कि इन बिहारियों ने उनके रोजगार छीन लिए हैं, उनके संसाधनों पर कब्जा कर लिया है और तब वे बिहारियों को परेशान करना शुरू कर देते हैं जैसा कि महाराष्ट्र, असम, पंजाब, मणिपुर, नागालैंड में हुआ | उन्हें यह भी लगता है कि इन बिहारियों ने अपने राज्य की सुजला, सुफला, शस्यश्यामला भूमि को अजला, अफला, शून्यश्यामला बना डाला है और अब हमारी भूमि को भी वैसा ही बनाने आए हैं |

दूसरे प्रान्तों के भाइयों को ‘बिहारी’ शब्द का वास्तविक अर्थ समझाने की आवश्यकता है | हे भाइयों, सुनें एक बिहारी के हृदय के अंतरतम से निकली सत्य और प्रेम की आवाज़—-

चूम कर मृत को जिला दे, वह बिहारी है ।
फूल मरघट में खिला दे, वह बिहारी है ।।
प्रेम में सब त्याग कर दे, वह बिहारी है ।
मित्रता में प्राण दे दे, वह बिहारी है ।।
कल्पना की जीभ में भी धार रखे, वह बिहारी है ।
स्वप्न में भी हाथ में तलवार रखे वह बिहारी है ।।
द्वेष के बदले प्रेम भेंट दे, वही बिहारी है ।
निष्कपट गीत देकर मुस्काए, वही बिहारी है ।।
थोड़े में ज्यादा कह डाले, वही बिहारी है ।
प्रतिभा-बीज कहीं बो डाले, वही बिहारी है ।।
राग मुक्त सबको कर डाले, वही बिहारी है ।
दाह जगत का जो हर डाले वही बिहारी है ।।
तुम कहते हो, हमने आकर अवसर छीना ।
अपने बल पर अवसर पा ले, वही बिहारी है ।।
तुम कहते हो, हमने आकर भीड़ बढ़ाई ।
बहुमंजिली भवनें जो बनाए, वही बिहारी है ।।
होली, छठ और ईद में, जब लोग चले जाते हैं ।
शहरों की गलियां और सड़कें, वीरान नजर आते हैं ।।
तब कहते हो लोग गए, अब काम करेगा कौन ।
मन मसोस कर उस समय, क्यूँ हो जाते हो मौन ?
सुन मेरे भाई, नहीं पराये, हम भी तेरे अपने हैं ।
सुख में, दुःख में साथ निभाएं, बस इतने से सपने हैं ।।
हम हैं नहीं किसी पर बोझ, अपने दम पर जीते हैं ।
सबको सुख हम देते हैं, गम का जाम हम पीते हैं ।।
अपने घर से दूर हैं हम तो, साथ तुम्हारा देते हैं ।
बहुत सारा हम तुमको देकर, थोड़ा सा तो लेते हैं ।।
इसीलिए हे भाई मेरे, अपनी सोच बदल डालो ।
हिन्दुस्तानी भाई-भाई, प्रांतीयता को मिटा डालो ।।

(मुझे दुःख है कि इस लेख में कहीं-कहीं मुझे कुछ कड़ी बातें लिखनी पड़ी हैं, किन्तु मेरा उद्देश्य किसी की निंदा करना नहीं है । मेरा विश्वास है कि यदि हममें कुछ बुराइयाँ हैं तो उसकी तीव्र आलोचना होने से हमें उन बुराइयों को दूर करने में मदद मिलती है । फिर भी यदि भूलवश कोई अनुचित बात कह दी हो तो उसके लिए मैं विनम्रतापूर्वक क्षमा-याचना करता हूँ । आपका मित्र—अविनाश कुमार सिंह)


लेखक/कवि – अविनाश कुमार सिंह 

(राजपत्रित पदाधिकारी, गृह मंत्रालय, भारत सरकार)

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