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छठ एकमात्र ऐसा महापर्व है जिसमें महिलाएं अपने खानदान के लिए बेटी मांगती है

देश में शायद बिहार एकलौता राज्य है जहां की महिलाएं साल भर में कम से कम एक दिन अपने खानदान के लिए बेटी मांगती है। छठ पर्व के पावन अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में वे गाती हैं|

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला,
पढ़ल पंडितवा दामाद, ए छठी मईया दर्शन दिहिन न अपान।

मतलब हमें घर में सिमटी-सकुचाई रहने वाली बेटी नहीं चाहिए बल्कि हमें ऐसी बेटी चाहिए जिनके कदमों की आवाज से सब कुछ गुंजता रहे और इन बेटियों के लिए जो वर मिले व पैसे वाला हो या नहीं पर पढ़ा-लिखा जरूर हो। केवल प्रार्थना गीतों में ही नहीं छठ पर्व के कई मौके पर बिहार के संस्कृति में महिलाओं के लिए समान प्रतीक देखने को मिलता है।

छठ के गीतों से भी यह साबित होते हैं। हमारे समाज में देवी के पूजा की पंरपरा है। छठ एक ऐसा त्योहार है जिसमें बेटियां मांगी जाती है। सदियों से स्त्री को शक्ति का रूप माना जाता रहा है। छठ भी इसी का ही एक उदाहरण है।

यानी पुरुष प्रधान समाज में सृष्टि की सृजनकार बेटियों को समर्पित है यह पर्व। आज जहां बेटियां न हों इसके लिए भ्रूण हत्याएं तक की जा रही हैं, उस दौर में छठ माई से बिहार ऐसी बेटियां मांगता है जो रुनकी झुनकी हो। अर्घ्य के साथ बेटी होने का वरदान मांगा जा रहा है। साथ ही इस बिहार को ऐसे बेटे चाहिए जो भले धनाढ्य न हों लेकिन पढे लिखे चाहिए। यानी पढे लिखे बेटे के साथ सरस्वती होगी तो लक्ष्मी झक्ख मारकर आएगी और जब ऐसे बेटे छठ माई से मंगी गई बेटियों के वर बनेंगे तो वह बेटी और दामाद तो सुखी होंगें ही।

यह एकमात्र ऐसा महापर्व है, जिसमें बेटियों के महत्व के बारे में बताया जाता है। एक और गीत है

’सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर,
पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा धियवा मंगियो जरूर ’।

इस गीत में भी भगवान सूर्य से एक बेटी मांगी जा रही है।

छठ इन्हीं भिन्नताओं के कारण हम बिहारियों को आदर्श नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है। छठ में जहां डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हुए हम यह स्वीकारते हैं कि डूबना जीवन का सत्य है लेकिन पुनः उदय होना भी सच्चाई है, वैसे ही छठ के लोकगीतों में बेटियों के जन्म के लिए प्रार्थना करना यह दर्शाता है कि हम देवी पूजक हैं। बेटियों को भी वही स्थान मिला हुआ है जो पुरुष प्रधान समाज में बेटों को है। बेटियां भी ऐसी चाहिएं जो तेज तर्रार और दुनिया से कदम से कदम मिलाकर चले लेकिन वह अपनी सारी सफलताओं के बाद भी गर्व से कहे, हम बिहारी हैं और हमारी अस्मिता छठ है।

साभार: प्रियदर्शन शर्मा (संपादक, राजस्थान पत्रिका)

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