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बिहारी बाप: हमारे पिता जी के गारिए हमारे लिए ‘लभ यू’ होता है

उ का है न हम बिहारी है। हम अपने माई के बारे में तो लिखते ही है, पर आज पिता जी के बारे में भी लिख रहे है। हमारे पिता जी हमारे लिए स्पेसल आ ख़ास नहीं होते पता है काहे? चलिए आज बताते है।

उ का है न कि हमारे पिता जी हम से आइ लभ यू जैसा जघन्य अपराध वाला वाक्य पूरे जीवन में नहीं बोलते। बस यू समझिए की सुबह शाम उनका गारिए हमारे लिए लभ यू होता है।

हमारे पिता जी हमें रोने पर चाकलेट आ महँगा खिलौना नहीं देते, बल्कि और ज्यदा रोने का जोगाड करते है। इसकी शुरुआत पहिले लतिया के करते है, आ ओहु से मन नहीं भरा तो फिर पातर साटका (छड़ी) कवन दिन रात काम आएगा। आस पड़ोस का कोई आदमी जदी कभी मार दे, तो ओरहन (उलाहना) के बजाए, थोड़े अऊर काहे नहीं कूटे? ऐसा पूछ कर दूँ तड़ी और लगा के अपनी आत्मसंतुस्टी कर लेते है। ग़लती चाहे किसी की भी हो।

हमारे लिए स्कूल बंद होने पर कोई वेकेशन नहीं, बल्कि गाँव चल के खेत पटवाना, भूसा ढोना, गेहूँ पिसवाना, बग़ीचा साफ़ करवाना ही जश्न होता है। हमारे लिए रेंगलर, प्यूमा, लेवाईस का जीन्स नहीं बल्कि चौंक पर सुरेंद्र चा के दोकान पर से 100 रोपे वाला पेंट का ढाई मीटर आ 75 रोपे वाला बढ़िया कुर्ता का सवा दूँ मीटर कपड़ा अनवर चा हीया सिया जाता है। जिसका हिसाब बाबूजी अपने करेंगे। उ का है न, की जादे पइसा ले जाने पर गिर जाएगा नहीं तो कोई छिन लेगा इ डर हमेशा उनको बना रहता है। आ नहीं तो पइसा देख के सुरेंद्र चचवा ठग लेगा इ भी बात रहता है।

लेकिन इ सब के बीच हमारा पिता जी दुनिया के सबसे हसीन, समझदार आ मज़बूत बाप होते हैं। जानते हैं काहे? 3 भाई बहिन वाले परिवार में बाबा आजी को देखते हुए, हमको आईएएस, प्रोफ़ेसर, डाक्टर, इंजिनयर बनाने का सपना देखने का कुबत सबमें नहीं होता। इ बात अलग है कि प्राइवेट नोकरी के नाम प उनका बीपी हाई हो के आँख लाल हो जाता है।

बिहारी बाप के सामने जदी इनोवेटिज आइडिया के बारे में बताने जाएँगे तो आपको पहिले तो आधा घंटा समझाने का नाकाम कोशिश करना पड़ेगा। उसके बाद तो समझिए की पूरे घर में तांडव होगा, तांडव। हमारा खिस हमरा माई प निकलेगा। इसके पीछे का कारण जानते है? उ का है न कि अपने जीवन में असुविधाओं और असफलताओं से डरा एक बाप बेहतर जीवन शैली से ज्यदा अपने बेटे के बारे में सोच ही नहीं पता।

हमारे बाप हमसे कम शब्दों में काफ़ी बातें कर लेते हैं, उ चाहे अपना पेट काट के हमारा नाम शहर के सबसे बढ़िया एसएससी के कोचिंग में लिखवाना हो या फिर आईटीआई करवाने के लिए दूँ, महीना तक चिंता में रहना। हमारे पिता जी की एक-एक बात निराली है। शेष अगले भाग में। लेखन जारी है..

– निरंजन पाठक 

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