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विश्लेषण: जल्दी में है प्रशांत किशोर, क्या नीतीश को खटक रही है उनकी महत्वाकांक्षा?

प्रशांत किशोर को देशभर में सफल चुनावी रानितिकार के रूप में जाना जाता है मगर प्रशांत किशोर देश की राजनीति में खुद को एक सफल राजनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं| उनके पास कई विकल्प थे मगर बीती वर्ष 16 सितंबर को प्रशांत किशोर ने रणनीतिकार से नेता बनने के तरफ अपना पहला कदम बढ़ाते हुए जदयू में सामिल ही गये|

इस समय प्रशांत को लेकर जदयू के अन्दर जो घमासान मचा है, उसकी पटकथा तो उसी समय लिखा गया था, जब नीतीश कुमार ने पीके को ‘भविष्य’ बोलकर जेदयू में स्वागत किया| नीतीश कुमार ने यह किस परिप्रेक्ष्य कहा था, वह तो वे ही जाने मगर मीडिया ने इसे नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में लिया| नीतीश कुमार ने भी अघोषित रूप से उनको पार्टी में नंबर 2 की हैसियत दे दी|

पार्टी में प्रशांत किशोर के बढ़ते कद और पुराने नेताओं की घटती अहमियत से भड़कती चिंगारियों को शोला बनना तो तय था मगर उस समय नीतीश का आशीर्वाद होने के कारण किसी के आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हुई| 

यहाँ यह जानना जरुरी है कि प्रशांत किशोर राजनीति में सिर्फ विधायक, सांसद या मंत्री बनने नहीं आये हैं| उनकी महत्वाकांक्षा इस से कही ज्यादा बड़ा है| ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार को पीके के महत्वाकांक्षा के बारे में पता नहीं रहा होगा| राजनीति में सब अपना फायदा देखता है| नीतीश और प्रशांत दोनों ने भी एक दुसरे में अपना फायदा देखा| मगर अब प्रशांत किशोर की जल्दबाजी अब नीतीश को खटक रही है!

प्रशांत जब से जदयू में सामिल हुए हैं, वे जदयू और नीतीश के नाम पर लोगों को जोड़ तो रहे हैं मगर पार्टी से नहीं खुद से| जदयू को उम्मीद थी कि पीके के आने से जदयू मजबूत होगा मगर उनकी संस्था आईपैक लगातार नीतीश कुमार के जगह प्रशांत किशोर को स्थापित करने में लगी है| प्रशांत किशोर पार्टी हित से ज्यादा अपने हित में लगे हुए हैं या यूं कहें कि प्रशांत नीतीश के जदयू में रहते हुए, उसके समान्तर अपना जदयू तैयार करने में लगे हैं| यही बात नीतीश को खटक रही है और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रशांत और नीतीश के बिच दूरी बढ़ गयी है|

इसका सबसे पहले संकेत हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के गाँधी मैदान में हुए संकल्प रैली में दिखा| जिसमें पार्टी के पोस्टर के साथ मंच पर भी प्रशांत किशोर को जगह नहीं दी गयी| 

5 मार्च को पीके ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘अगर मैं किसी को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनाने में मदद कर सकता हूं ,तो बिहार के नौजवानों को मुखिया या विधायक भी बना सकता हूं’। पार्टी में अकेले पड़े पीके का यह बयान जदयू को चेतवानी देने के तरह लिया गया| इसपर जदयू के नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि मनुष्य को अपने बारे में भ्रम हो जाता है। विधायक, सांसद जनता बनाती है और उसे पार्टी टिकट देती है।

पीके यही नहीं रुके| एक इंटरव्यू में वे नीतीश कुमार के फैसले को ही गलत बता दिया है| जिसको लेकर पार्टी के अन्दर ही उनको लेकर भूचाल मचा है|

दरअसल, जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने कहा है कि वह भाजपा के साथ दोबारा गठजोड़ करने के अपनी पार्टी के अध्यक्ष नीतीश कुमार के तरीके से सहमत नहीं हैं और महागठबंधन से निकलने के बाद भगवा पार्टी नीत राजग में शामिल होने के लिये बिहार के मुख्यमंत्री को आदर्श रूप से नए सिरे से जनादेश हासिल करना चाहिये था|

इसपर जद (यू) के महसचिव आऱ सी़ पी़ सिंह ने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में पीके का नाम लिए बगैर कहा, “जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वे उस समय पार्टी में भी नहीं थे। उन्हें इसकी जानकारी नहीं होगी। सभी नेताओं की सहमति से पार्टी महागठबंधन से अलग हुई थी और फिर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल हुई थी।”

पीके के हालिया बयानों से स्पष्ट है कि जद (यू) में सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा है। बेगूसराय के शहीद पिंटू सिंह के पार्थिक शरीर के पटना हवाईअड्डा पहुंचने पर जब सरकार और पार्टी की ओर से श्रद्धांजलि देने वहां कोई नहीं गया, तब पीके ने पार्टी की ओर से माफी मांगी थी और इसके लिए उन्होंने ट्वीट भी किया था। जिसके कारण प्रशांत किशोर कि व्यक्तिगत छवि तो चमकी मगर पार्टी की बहुत किरकिरी हुई| इसको भी अब इसी विवाद से जोड़ कर देखा जा रहा है|

जदयू के सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर को लेकर जदयू में पहले से ही नाराजगी थी मगर नीतीश कुमार के समर्थन के कारण कोई बोल नहीं रहा था| मगर हालिया घटनाक्रम को देखें तो यह साफ़ है कि प्रशांत किशोर अब पार्टी में अकेले पड़ गयें हैं| प्रशांत की महत्वाकांक्षा और उसके लिए उनकी बेतावी अब नीतीश को खटक रहा है! पीछे मुड़कर देखें तो नीतीश कुमार ऐसे हरकत को सहन नहीं करतें| उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और शरद यादव इसके कुछ उदाहरण हैं|

 

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