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गाँव का मेला: दू रूपईया वाला बरफ चूसते हुए सोचते हैं कि ई मेला काहे ज़रूरी है

“मेला दिलों का आता है..”

चार दिन से गाँव में मेला लागल है. गौ पूजनोत्सव. ना-ना कोनो पार्टी-ऊर्टी का चुनावी एजेंडा नहीं है. बारह साल से मनाया जा रहा है. ठेठ गाँव है हमारा. बैल मेला भी लगता है तो गौ पूजन भी होता है. जूड़-शीतल को गाछी के जड़ में पानी देंगे तो गेहूँ कटनी का उत्सव भी होगा. प्रकृति पूजन को गाँवों ने जिंदा रखा है. हम आसा-निरासा, निर्मल-मंगल, बाबा-गुरूजी से बाचल हैं अभी.🐄🌳

खैर, एन्नी-ओन्नी नहीं भटकाते हुए आइए आपको गाँव का मेला घुमाते हैं. ई मेला काहे ज़रूरी है, दू रुपही बरफ चूसते हुए सोचते हैं. थोड़ा शाम होबे दीजिए. मेला जमने दीजिए तब घूमा जाएगा. पच्छिम भर सूरुज दादा ललिया गए.

लाउडइस्पीकर पर “मौत का कुआँ देखिए, आसाम-बंगाल का जादू, देखिए बारह साल की बच्ची जिन्दा सांप निगल जाएगी, 100 रुपिया में दो किलो सरफ के साथ पांच नहाए वाला साबुन फ्री” का मिला-जुला आवाज़ आने लगा. मतलब मेला पूरा जवान है. रस्ता पर गर्दा उड़ रहा है. आना-जाना शुरू है. लाल-पियर-हरियर से मेला भरल है. कोई बच्चा फूंकना खरीदने के लिए मम्मी का आँचर खींच रहा है तो कोई जिलेबी के लिए बीच मेले में छिरिया रहा है.

नया जवान युवक लाल ठप्पा मेहँदी वाले से अपने प्रिय के नाम का पहिला अच्छर छपवा रहा है तो कोई कोनो विशेष के खाली देखे के लिए तीन बार ब्रेक डांस पर झुलुआ झूल चुका है. कल उसी के चक्कर में तीस रुपैये का फोचका जे खाया था, अभी तक पेट में मरोड़ उठ रहा है लेकिन दिल है कि मानता नहीं. मेला कोन-सा डेली-डेली लगता है.

मूर्ति के पंडाल के कोनवा में दस ठो दादी अम्मा गोलिया के बैठल हैं. कम दांत-कमज़ोर आंत के बादो डेढ़-डेढ़ किलो जलेबी-मुरही-चौप आ घुघनी का गर्दा उड़ा चुकी हैं. अब सब घुटना आ कमर दर्द के बहन्ना से मेला में चुप्पे से बइठकर फलम्मा बाबू के बेटी पर नज़र रख रही हैं.

“हे मधुबन वाली, देख रहे हैं. कईसे बीच मेला में छौरा सब से ठिठिया-ठिठिया कर बतिया रही है.. तनिको लाजो नहीं होता है.. बहस के दूर हो गयी है..”👵🏻👵🏻

कलकत्ता के मीना बाजार पर हरेक माल नब्बे रुपैय्ये मिल रहा है. नबकी भौजी सब लपक के आलता आ लोलपैना खरीदले जा रही हैं. भईया इधर बौआ को “झलक दिखला जा-टिलिलिली पों-पों” वाला मोबाइल दिलवा रहे हैं. भौजी को दिल्ली का इस्पेशल छोला-भटूरा खाना है ता बुचिया चाउमिन खाने के लिए ठुनक रही है. भईया बेचारा.! भौजी के बैगो लदले हैं आ तीन ठो बौआ-बुतरू भी..💄💋👛

मेला के पूरुब भर कोना में आल्हा रुदल का नाच चल रहा है. भरपूर पईसा वसूल. लौंडा को सांझ के 9 बजे से भोर के 9 बजे तक नचवाता है सब. अभियो गाना चल रहा है “सारे लड़कों की कर दो शादी, बस एक को कुंवारा रखना”.. गाना ख़तम होते ही अलाउंसर को चिट मिला.💃🏻💃🏻

“पच्छिम बंगाल से आपलोगों के बीच चलकर आयीं मिस काजल रानी के इस रंगारंग डैंस आइटम से खुश होकर महेन मिसिर उर्फ महेन चचा की तरफ से दस रुपए का ईनाम आया है.. धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद..”😈

अब जमेगा मेला में रंग. महेन चचा लुंगी समेटकर चिट देने वाले को गरिया रहे हैं. आज उनका बेटवा भी साथ दे रहा है. साथ तो देबही पड़ेगा. रात भर नाच देखा है. मार खाने से बचना है तो बाबूजी को सपोर्ट करही पड़ेगा. कुछ देर में महेन चचा की चाचियो गरियाते हुए आयीं आ कुच्छो नहीं मिलने पर चचा आ बेटवा को पकड़ के ले गयीं घरे.. मेला अपने शबाब पर है.🥳😍

गाँव के इस मेले का बचा रहना बहुत ज़रूरी है. सामाजिक सौहार्द के खातिर. प्रकृति को आभार प्रकट करने के खातिर. मॉल-फ्लिप्कार्ट के जमाने में देसी दोकानदार के जिंदा रहे के खातिर. पेस्ट्री के बीच में बताशा का मिठास बचल रहे के खातिर. बर्गर-चौमिन-मोमो के समय में मुरही-चौप-घुघनी के स्वाद के खातिर आ “मंगल पर जीवन” खोजने के दौर में जीवन में मंगल खोजे के खातिर..👩🏻‍🎨🥨🥓

– अमन आकाश

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