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#10 Bus to Patna: ईहे खिचड़ी-चोखा केतना को आइएएस, इंजिनियर ता केतना एक्टर बना दिया

खिचड़ी-चोखा.. ना-ना गलत बूझे आप. मकर संक्रांति वाला दिन पूरा जतन से, बारहों मसल्ला आ तेरहों स्वाद डालकर, कड़कड़ाता घी से छौंका लगाकर बनाया गया खिचड़ी नहीं. दिन भर का कोचिंग क्लास, डिफरेंसिएसन आ इंटीगरेसन, कुछ भेड़िए कॉपी हैं-सभी कॉपी हाथी हैं, लिफ्ट के पुली के स्पीड से जब दिमाग आ शरीर का सारा ऊर्जा चूसा जाता है ता रूम पर लौटकर याद आता है खिचड़ी-चोखा. दाल, चावल, आलू आ हरियर मिरचाई का महागठबंधन. कसम से बता रहे हैं, खिचड़ी बनाने में एतना एक्सपर्टी हो जाता है कि कुकर का बिना सीटी सुने आ मोबाइल पर बिना टाइमर लगाए अपने आप गैस ऑफ़ कर देते हैं. गंधे से पता चल जाता है.

आजे दस दिन का छुट्टी मनाकर घर से पटना पहुंचे हैं. पटना पहुंचकर हमारा सबसे पहीला काम होता है बूमचूम्स का हाफ पैंट पहीन के, जेब में नमरी डाल के छोटका गैस सिलिंडर में प्राण फूंकवाना.

हमारे खाद्य आपूर्ति विभाग का मुखिया तीन लीटरा कूकर कहाँ गया!! अरे ऊ ता फोल्डिंग के ऊ कोने में पड़ा हुआ है. साला ई लॉज का चूहा सब अलगे डॉन बन गया है. फोल्डिंग में आधा घुस के जब कूकर निकाले ता उसमें चूहवा अपना थ्री बीएचके फ्लैट बना लिया था. श्रीमान चूहा-श्रीमती चूहिया आ आधा दर्जन न्यू बोर्न बेबी. इनका किचन, बेडरूम से लेकर टॉयलेट तक हमारा कूकर ही बन गया था. इस फैमिली को बाइज्जत अलग जगह शिफ्ट किया गया. अब अपना शिफ्टिंग बाकी था.

अभी बोरिया खोलेंगे ता थारी-बाटी-करछुल टनटना के बाहर लुढ़क जाएगा. मम्मी को केतना मना करते हैं कि मसल्ला-ऊसल्ला तो कम-से-कम मत बाँधा करो लेकिन सुनबे कहाँ करती है. उनको अभियो लगता है कि पटना में पियरका रंग वाला हल्दी, ईंटा के बुकनी वाला मिरचाई आ गोबर मिलाया हुआ धनिया मिलता है. कुल जौंडिस का कारण ईहे है. गायघाट, अगमकुआं, मीठापुर से चालीस किलो का बोरा लादकर जब रूम पहुँचकर फोल्डिंग पर जिंदा लाश के तरह पड़ जाते हैं तब याद आता है खिचड़ी-चोखा..

ओहो, ई आलू में भी साला हरियर कोंपल निकल गया है. चार दिन आओर लेट आते ता ई अलग इंडिपेंडेंट वृक्ष बन गया होता. प्याज तो ससुरा मोजा से ज्यादा बदबू दे रहा है. ऊम्महूँ, फेंको इसको. पांच आलू को कांट-छांटकर एक आदमी लायक चोखा इतना बचाकर कूकर के हवाले कर दिए. बस बीस मिनट का स्ट्रगल आओर, उसके बाद ता खिचड़ी-चोखा सटासट खींचा जाएगा. जादा मेहनत भी नहीं लगता. ना बनाने में, ना खाने में आ ना पचाने में.

ईहे खिचड़ी-चोखा केतना को आइएएस बना दिया, केतना को इंजिनियर ता केतना एक्टर आ लीडर भी बन गए. हमहू निकट भविष्य में कहियो बड़का आदमी बन गए, अपना स्ट्रगल का कहानी लिखना पड़ा ता एक चैप्टर ता खिचड़ी-चोखा पर ही लिखेंगे. कड़की आ आलसपन में दिन बीत रहा था. दस दिन दुन्नू टाइम खिचड़ीए ठेल रहे थे. तबियत थोड़ा उप्पर-नीचे हो गया. डाक्टर साहब 800 रुपैये का ब्लड आ पेशाब-पैखाना टेस्ट करके (Test करके, Taste करके नहीं) बोले.

“देखिए आप बाहर का खूब खा रहे हैं. इसलिए तबियत गड़बड़ाया है. ऐसा कीजिए अभी दस दिन सिर्फ खिचड़ी खाइए..”

– अमन आकाश 

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