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बोर्ड एग्जाम और वसंत, जीवन में लगभग साथ साथ आती है

दो बार से लगातार मैट्रिक में फेल हो रही रनिया और पिंकिया दांत पर दांत पटक के कहती है अगर जो ई बेर हमको नीतीसवा फेल किया तो ईंट से ईंट बजा देंगे।

पूरब टोला का सुरजवा क्वेश्चन बैंक लाँघकर मॉडल पेपर में घुस आया है। पूरे आठ दिन का लघु योजना बनाते हुए कहता है इसके बाद कुछो न पढ़ेंगे…लड़ना होगा तो इसी से लड़ेगा वरना फेल सही।

इधर गुडुआ अपना पूरा बल लगाकर यूनिक और गाइड जैसे संयुक्त गेस पेपर को छाती के पास लाकर लीनियस पद्धति के अनुसार अलग-अलग विषयों में वर्गीकरण कर दे रहा है।

गणेश पूजा के प्रोग्राम में लड़की पर लेज़र लाइट छिड़कने वाला सुनिलवा चार बजे भोर में लालटेन जलाकर मच्छरदानी के भीतर विज्ञान और गणित के अति महत्वपूर्ण प्रश्नों पर प्रकाश छिड़क रहा है।

दिन भर सोनिया के हृदय की धड़कन एवं पल्स रेट को गिनने वाला मनीषवा परीक्षा से आठ दिन पहले थीटा डिग्री कोण पर झुके दो समतल दर्पण के सामने वस्तु को रखकर…उसमें बने प्रतिबिम्ब की संख्या को बायें हाथ की अँगुली पे गिन रहा है।

वो लजबजा गया है कि 360 को थीटा से भाग देने पर अगर कोई विषम संख्या आये तो दर्पण पे बने प्रतिबिम्ब की संख्या वही रखेंगे या उस संख्या में एक घटा देंगे।

रोज सुबह मजनुआ के व्हाटसएप पे गुड मॉर्निंग सहित अपना दिल भेजने वाली सरितवा आज संदेश में पूछ रही है कि निकट दृष्टि दोष दूर करने में कौन सा लेंस प्रयोग होता है? मजनुआ आश्चर्यचकित होते हुए पूछ बैठता है ई बीमारी आपको कब से हो गया?

अरे नहीं जी…परीक्षा नजदीक है इसीलिए पढ़ ले रहे हैं आजकल तो जानते हैं बियाह से पहले भी कुटुम सब यही सवाल पूछता है।

प्रश्न का जवाब देते हुए मजनुआ भी इधर से पूछ बैठता है आप बताइए कि गाड़ी के हेडलाइट एवं सर्च लाइट में कौन सा दर्पण प्रयोग होता है?
ये वाला प्रश्न भी कुटुम आपसे बियाह के पहले पूछेगा….फिर दोनों एक साथ मुस्कुराते हुए अगले प्रश्न पे आते हैं….

दोनों तरफ घमासान युद्ध चल रहा है….परीक्षाओं का दौर है…वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का गोला बनाकर एक दूसरे के ऊपर फेंका जा रहा है…जो पीछे हुआ वो सबसे पीछे हो जाता है….

जैसे जैसे परीक्षा छाती पर आ रहा है, दिनेश माटसाब और देवनारायण माटसाब भी मंगल से लेकर मंगल तक रोज चार घण्टा खींच के पढ़ा रहे हैं, तभियो सिलेबस पार नहीं परा रहा है।

पता ही नहीं चल रहा कितना पढ़ना है…क्या पढ़ लिए….क्या बाकी रह गया..

दिल्ली में कमा रहा मिठुआ…अपने जिगरी दोस्त को फ़ोन करके मधुआ का खबर लेना वाला लौंडा ये खबर लेना शुरू कर दिया है कि.. कहिया से परीक्षा है….? कहिया के टिकट करवायें…? कहिया एडमिट कार्ड आवेगा…?

अंगूठा और तर्जनी के बीच विद्या का क्वेश्चन बैंक फँसाकर सरितवा कहती है बाप रे इतना मोटा पढ़ना पड़ेगा….कहाँ से शुरू करे कहाँ से खत्म करे पता ही नहीं चल रहा है। चोरी तो चलबे करेगा…अब सब भगवान भरोसे।

हाल-ए-दिल ये हो गया है कि जीवन का हरेक परीक्षा भगवान के भरोसे ही दिया जा रहा है।

इधर ज्योतिया के जीजा जी जुगाड़ में हैं कि किसी तरह दस घण्टा पहले क्वेश्चन मिल जाए….हर एक घण्टा के बाद अजीत माटसाब को फोन लगा के पूछते हैं सर काम हुआ?

मन बेचैन है…इंतजार में रात भर सही से नींद नहीं ले पा रहे हैं…जैसे अपने साली को पास कराने का टेंडर इन्हीं को मिला हो।

रमुआ के पान दुकान पर खैनी का पुरिया खत्म करने वाला लड़का के मुंह से तीन रात में पूरा सिलेबस खत्म करने की बात सुन…बगल में खड़े गोबरधन चचा अवाक रह जाते हैं|उनको लगता है मोदीजी बच्चों के मानसिक विकास पर भी कोई विशेष योजना का कार्यान्वयन कर रहे हैं।

परीक्षाओं का दौर है…परीक्षा तो अपने समयानुसार होती ही रहेंगी….सवाल आते ही रहेंगे….तैयारियाँ भी चलती रहेंगी….पर अच्छे नम्बर से पास होना बहुत जरूरी है।

ये जीवन की पहली परीक्षा होती है…पहली परीक्षा हौंसला देती है, इतना हौंसला देती है कि एक बाप अपना पेट काट कर आपको मुखर्जीनगर में पढ़ा सकता है। एक माँ फटी साड़ी पहनकर आपको कोटा भेज आईआईटी और मेडिकल की तैयारी करवा सकती है।

शायद इसी को तपस्या कहते हैं…जहाँ माँ-बाप बच्चों के लिए जीना सीखते हैं और बच्चे माँ-बाप के लिए। जो एक-दूसरे के लिए जीना सीख जाए उनका जीवन वसंत हो जाता है।

अभिषेक आर्यन

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