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क्या आप जानतें हैं? बीबी कमाल की पुत्री ने बिहार के काको में आकर डाली थी सूफी मत की नीव

सूफ़ी” शब्द ”सुफ” से बनता है और अरबी भाषा में इसका मतलब ”सुफ्फा” है, यानी ”दिल की सफाई। सूफ़ी अपने ज़ाहिरी लिबास की वजह से सूफ़ी कहलाए। अम्बिया, औलिया और सूफियों की ख़ास पहचान रही है। पहली हिजरी में भी ‘सूफ़ी’ शब्द था। सूफियाए इस्लाम” ने जो सूफ़ीवाद अपनाया वो आख़री पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पवित्र जीवन का नैतिक पहलू है। इसको सभी सिलसिलों के सूफियों ने और सिलसिलए चिश्तिया के बुजुर्गों ने खास तौर से अपने सूफ़ीवाद के सिद्धांत की बुनियाद करार दिया है।

‘सूफ़ी वो है जो अपने नश्वर अस्तित्व को परम सत्य की खोज में डूबा दे और दुनियावी ख्वाहिशों से मुक्त होकर आध्यात्मिकता और सत्यता से अपना रिश्ता जोड़ ले। सूफ़ी अपने को तपा कर मैं और तुम की बंदिशों से पाक हो जाता है।

‘हया के फूल, सब्र व शुक्र के फल, अज़ व नियाज़ की जड़, ग़म की कोंपल, सच्चाई के दरख्त के पत्ते, अदब की छाल, हुस्ने एख़लाक़ के बीज, ये सब लेकर रियाज़त के हावन दस्ते में कूटते रहो और इसमें इश्क़े पशमानी का अर्क़ रोज़ मिलाते रहो। इन सब दवाओं को दिल की डेकची में भरकर शौक के चूल्हे पर पकाओ। जब पक कर तैयार हो जाए तो सफ़ाए क़ल्ब की साफी में छान लेना और मीठी ज़बान की शक्कर मिलाकर मोहब्बत की तेज़ आंच देना, जिस वक्त तैयार हो कर उतरे तो उसे ख़ौफे ख़ुदा के हवाले से ठंडा कर इस्तेमाल करना।” ये ही वो महान नुस्खा है जो इंसान को इश्के ख़ुदा की भट्टी में तपा कर आज भी कुंदन कर सकता है।

सूफियों की इबादत, नेक अमल और उच्च नैतिक मूल्यों का व्यावहारिक जीवन होता है। ये लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं और सहाबा के नक्शे कदम पर अमल करते हुए, कुरानी की शिक्षाओं को अपना कर इबादत को अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं। सूफियों का हर अमल सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा की खातिर होता है। दुनिया के ज़ायके और हवस की खातिर नहीं।

”अल्लाह का वली बनने के लिए पहला क़ौल ये है कि मज़लूमों की फरियाद सुनना, बेचारों की आवश्यकता को पूरी करना और भूखों को खाना खिलाना” सूफ़ीवाद के तीन पहलू हुए:- इल्मी, अमली और इश्क़े हक़ीक़ी। हिंदुस्तान में गंगा-जमुनी तहजीब और सूफी धारा को आगे बढ़ाने में हजरत मखदूमे बीबी कमाल का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। हजरत बीबी कमाल मध्य एशिया से आई विश्व की प्रथम महिला सूफी संत हैं। बीबी कमाल तुगलक वंश के शासन काल में एक सूफी संत महिला थीं। जो तांत्रिक विद्या के लिए प्रख्यात थीं। हिन्दुस्तान में सुफी विचारधारा के कई केंन्द्र हैं उस में एक मुख्य केन्द्र हजरत मखदूमे बीबी कमाल है अफगानिस्तान के कातगर निवासी हजरत सैयद काजी शहाबुद्दीन पीर जगजोत की पुत्री तथा सुलेमान लंगर रहम तुल्लाह की पत्नी थी| सूफियों ने एकता अखंडता कि शिछा हर समय में दी। वर्ष 1174 में बीबी कमाल अपनी पुत्री दौलती बीबी के साथ काको पहुंची थीं।

कमाल बिहारशरीफ के हजरत मखदुम शर्फुद्दीन बिहारी याहिया की काकी थी। बीबी कमाल की पुत्री दौलती बीबी ने काको में आकर सूफी मत की नीव डाली थी।

फिरोज शाह तुगलक ने 1351 ईसवी से 1388 ईसवी में बीबी कमाल को महान साध्वी के रूप में अलंकृत किया था। ये माता पुत्री काको में ग्यासुद्दीन के 1320 ईसवी से 1325 ईसवी तक के शासन काल के दौरान यहां थीं। बीबी कमाल अपनी तांत्रिक विद्या के कारण मुसलिम संप्रदाय से अधिक हिंदुओं में चर्चित थीं। बीबी कमाल अपनी तंत्र विद्या से सब कुछ जान लेती थीं। तदंतर बीबी कमाल की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। दिन-दुखी और रोगी अपना दुखड़ा सुना कर समस्याओं से मुक्ति के लिए बीबी कमाल के पास आने लगे। बीबी कमाल सबों को समस्या का निदान बताती और तांत्रिक उपचार करती। रोगी चंगा होने लगे, दीन-दुखी प्रसन्न होने लगे। फिरोजशाह तुगलक जैसे बादशाह ने भी बीबी कमाल को महान साध्वी के तौर पर अलंकृत किया था। इनके मजार पर शेरशाह, जहां आरा जैसे मुगल शासक भी चादरपोशी कर दुआएं मांगी थी। हिंदू-मुसलिम सभी संप्रदाय के लोग यहां बीबी कमाल की दुआ पाने लगे। लोगों की आस्था इतनी बढ़ गयी कि बीबी कमाल के गुजर जाने के बाद आज भी बीबी कमाल का मजार हिंदुओं की और मुसलमानों के इबादत का केंद्र बना हुआ है।

काको शरीफ जो बिहार की राजधानी पटना से 50 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है यह बिहार में सूफीवाद का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे पुराने केंद्र में एक है।

विश्व के प्रथम महिला सूफी संत के जहानाबाद रेलवे स्टेशन से पूरब बिहारशरीफ जानेवाली सड़क मार्ग पर काको में स्थित है।

जहानाबाद मुख्यालय से इसकी दूरी 8 किलो मीटर के करीब है। महान सूफी संत बीबी कमाल के मजार पर लोग रुहानी इलाज के लिए मन्नत मागते व ईबादत करते हैं। जनानखाना से दरगाह शरीफ के अंदर लगे काले रंग के पत्थर को कड़ाह कहा जाता है। यहां आसेब जदा और मानसिक रुप से विक्षिप्त लोग पर जूनूनी कैफियततारी होती है।

दरगाह के अंदर वाले दरवाजे से सटे स्थित सफेद व काले पत्थर को लोग नयन कटोरी कहते हैं। यहां चर्चा है कि इस पत्थर पर उंगली से घिसकर आंख पर लगाने से आंख की रोशनी बढ़ जाती है।

सेहत कुआं के नाम से चर्चित कुएं के पानी का उपयोग फिरोज शाह तुगलग ने कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए किया था। दरगाह से कुछ दूरी पर वकानगर में बीबी कमाल के सौहर हजरत सुलेमान लंगर जमीं का मकबरा है। आईने अकबरी में महान सूफी संत मकदुमा बीबी कमाल की चर्चा की गयी है, जिन्होंने न सिर्फ जहानाबाद बल्कि पूरे विश्व में सूफियत की रौशनी जगमगायी है। इनका मूल नाम मकदुमा बीबी हटिया उर्फ बीबी कमाल है। कहते हैं कि उनके पिता शहाबुद्दीन पीर जराजौत रहमतूल्लाह अलैह बचपन में उन्हें प्यार से बीबी कमाल के नाम से पुकारते थे। बाद में वह इसी नाम से सुविख्यात हो गईं। इनकी माता का नाम मल्लिका जहां था। बताते हैं कि बीबी कमाल का जन्म 1211 ई. पूर्व तुर्कीस्तान के काशनगर में हुआ। मृत्यु 1296 ई. पूर्व में हुई थी।

जहानाबाद जिले के काको स्थित हजरत बीवी कमाल की मजार बिहार के ऐतिहासिक पुरातात्विक धर्मिक और साम्प्रदायिक सद्भाव केन्द्रों में एक है।

– सयेद आसिफ इमाम

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