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गुप्ताधाम की रोमांचक यात्रा: बिहार के बाहर होती ऐसी जगह तो हो जाती विश्व-विख्यात

आज मन बहुत खुश था। दोस्तों के साथ यात्रा पर जो जाना था। इसे साहसिक यात्रा भी कह सकते हैं। उतार- चढ़ाव, समतल, पहाड़ी, झरने, नदियाँ,जंगल सबकुछ मिलने वाला है इस यात्रा के दौरान।

भूख-प्यास, थकान से इस तरह सामना होगा, मौत को इतने करीब से देख पाउँगा, ये नहीं सोचा था। हमने सोचा कि जैसे सभी जाते हैं, वैसे हम भी जायेंगे और बाबा भोलेनाथ का दर्शन कर के आराम से वापस आएंगे। लेकिन स्थिति बिलकुल उलट गई।
अक्सर कहानियों को ज्यादा दिलचस्प बनाने के लिए उसमें मिर्च-मसाला डाल दिया जाता है। लेकिन ये यात्रा अपने आप में मसालेदार थी।

सावन की शुरुआत हो चुकी थी। महादेव की जयकार के बीच न जाने कितने कावरियों को मैं अपने शहर से आते जाते देखता था। मेरा भी मन हुआ कि मैं भी भोलेनाथ का दर्शन करूँ।
इसी उम्मीद में मैंने अपने घर पर पापाजी से बात की। उन्होंने बताया कि अगर जाना है तो गुप्ताधाम जाओ। वहाँ घूमो, दर्शन करो। ये यात्रा शरीर की परीक्षा ले लेती है। इसके साथ ही प्रकृति की खूबसूरती का दर्शन हो जाता है।
चूँकि मेरे पिता ने संकल्प किया था कि वो लगातार 21 साल गुप्ताधाम जायेंगे। ये तब की बात है जब यात्रा करने वालो की संख्या सीमित होती थी। 100-150 लोग ही पूरे सावन में दर्शन कर पाते थे।

गुप्तेश्वर धाम

खैर! 4 दोस्तों ने एक जगह मुलाकात की, जगह थी मेरे पिताजी का आयुर्वेदिक चिकित्सालय।
हम सभी मित्र वहां शाम में 6 से 7 बजे तक मिला करते थे। ये रोज की रूटीन में शामिल था। इसके बाद आरा के रमना मैदान का चक्कर काटते हुए 8 बजे तक अपने-अपने घर को रवाना हो जाते थे, अगले दिन मिलने का वादा लेकर।
मैंने अपने दोस्तों के बीच ये बात रखी कि क्यों न हम गुप्ता धाम चलें और वहाँ महादेव के भव्य रूप का दर्शन करें। सारे दोस्त तैयार हो गए। चूंकि हमारी उम्र अधिक नहीं थी, सभी तकरीबन 20 से 22 साल के बीच ही थे,इसलिए उत्सुकता के साथ थोड़ा सा डर भी था। लेकिन डर पर हमारी उत्सुकता हावी थी।

जाने की तारीख तय हुई 4 अगस्त 2012। 4 दोस्त- विवेक दीप पाठक (बाबा) ,प्रेमजीत सोनी( संटू),मनोज कुमार( विक्की) और विवेक चंद्रवंशी( झुन्नू)।

 

शनिवार की रात करीब 10 बजे सभी नहाकर भगवा धारण किये भगवान भोलेनाथ का जयकारा लगाते हुए जीप पर सवार हुए। साथ में शहर के कई और लोग भी थे पर ग्रुप अलग-अलग था। आरा में शिवगंज के समीप दुर्गा मंदिर से जीप खुली। चारो दोस्त खुश थे कि अब भगवान भोलेनाथ का दर्शन होकर रहेगा।

3, 4 साल की उम्र में मैं गया था वहाँ, पर मेरी याद से ये मेरी पहली यात्रा थी गुप्ताधाम की। हमारे दोस्तों में प्रेमजीत पहले जा चुके थे और उन्होंने पूरे रास्ते स्पष्ट कर दिया था कि “वहाँ के लिए तुम सब अंजान हो, इधर-उधर न जाना, साथ में रहना। जंगल है, जंगली साँप-बिछु के अलावे बहुत से जानवर हैं, इसलिए समूह में रहना। अकेले कहीं न जाना। जंगल में भटक जाने का डर होगा। दूर-दूर तक, जहाँ तक नज़र जायेगी, बस जंगल और पहाड़ ही दिखेगा। इसलिए हर कदम सतर्क रहना।”

अक्सर हमने लोगो को आते-जाते सही सलामत ही देखा था। इसलिए उसकी बातों को हमने मज़ाक में लिया।

अँधेरे को चीरती हुई हमारी जीप की रौशनी आगे बढ़ती जा रही थी। आरा से जैसे ही लगभग 40 km की दुरी पर हम पहुँचे, अचानक जीप कुछ आवाज़ के साथ बन्द हो गई। जीप ठीक करते-करते सुबह के 3 बज गए और आखिरकार हमलोग सुबह 5 बजे सासाराम पहुँच गए|

सासाराम से लगभग 40km दूर आलमपुर के रास्ते हमलोग पनियारी पहुँचे, जहाँ से हमें सामने पहाड़ी पर चढ़ाई करनी थी।

सामने से इसकी ऊँचाई का आकलन करना मुश्किल था। स्थानीय निवासी से बातचीत के दौरान पता चला कि इसकी ऊँचाई लगभग 3000मीटर के आसपास होगी। वैसे प्रमाणित नहीं, ये ऊँचाई अनुमानित है।

सामने इतने ऊँचे पहाड़ को देख कर हमारी उत्सुकता और बढ़ गई। चढ़ाई से पहले सबने बताया कि यहाँ एक देवी का स्थान है, जिसको लोग पनियारी माई के नाम से जानते है। यहाँ जमीन के नीचे से बारहों महीने पानी निकलता रहता है।
तो हमने भी निश्चित किया कि आगे की चढ़ाई के पहले हमसभी यहाँ स्नान करेंगे और उसके बाद पनियारी माई का दर्शन कर के आगे की यात्रा करेंगे। स्नान करके सुबह के करीब 7 बजे सूर्य की बढ़ती किरणों के साथ हमने भी बढ़ना शुरू किया।

लगभग 2किलोमीटर की सीधी चढ़ाई ने हमारे शरीर की कठिन परीक्षा ली। हम कुछ दूर ऊपर चढ़ते, थक जाते। फिर आराम करते और फिर बढ़ जाते। चढ़ाई के रास्ते में अनेक तरह की आवाज़ें, जीव-जंतु, सुंदर प्राकृतिक छटा मन को मोहित किये जा रही थी। बन्दर और लंगूरों का झुन्ड इस यात्रा को और भी अद्भुत बना रहा था।

हाँ एक बात तो मैं बताना भूल ही गया; हमने अपने साथ जो बैग रखा था उसमें एक जोड़ी कपड़े थे। बाकि खाने का सामान था। तली हुई लिट्टी, नमकीन, बिस्कुट, मिक्चर इत्यादि था। भूख लगने पर हम सभी बैठ कर खाते और फिर आगे बढ़ जाते।

पहाड़ की चढ़ाई इसी तरह से होती रही। मैंने प्रेम को कहा “भाई रास्ता तो दुर्गम है। एक तरफ गहरी खाई है तो दूसरी तरफ घना जंगल। लेकिन जिस तरह तुमने बताया कि ये जानलेवा है, वैसा तो कहीं दिख नहीं रहा।”

खैर! चलते-चलते चढ़ाई करते हुए हमलोग पहुँच गए बघवा खोह के पास। बघवा खोह के बारे में कोई विस्तृत जानकारी किसी को नहीं। जैसे कि नाम से स्पष्ट होता है, शायद पहले यहाँ बाघ की मांद होगी, पर लोगों के आवागमन की वजह से वो दूर जंगल में चले गए हों।
हालांकि वहाँ एक बाबा जरूर दिख जाते हैं। मेरे पिताजी की यात्रा से लेकर अब तक वो वहीं दिखाई देते हैं।

एक गजब का तेज है उनमें। बड़े -बड़े बाल! बाल नहीं, जटा! लगता है कि सालो से कंघी नहीं किया गया है। दुर्बल सा शरीर, लेकिन गज़ब का तेज! वो उसी मांद में बैठे रहते थे। पास में जलता हुआ मोटा-सा पेड़ का तना और उसके भस्म को उन्होंने अपने पूरे शरीर पर लगाया हुआ था। चूँकि शरीर का कुछ भाग कपड़ो से ढंका हुआ था,इससे स्पष्ट था कि वो नागा साधु नहीं बल्कि शिव के भक्त हैं। जिस तरह से भस्म को विभूषित किया हुआ था अपने पूरे तन पर और जिस अंदाज़ में चिलम(गांजा) का कश लगा रहे थे, देखकर अलग ही अनुभव प्राप्त हो रहा था!

उनसे आशीर्वाद लेकर हम सभी ने चढ़ाई की थकान मिटाने के लिए थोड़ी देर आराम करने का निर्णय लिया
और कुछ खाने-पीने की इच्छा से पास की चट्टान पर बैठ बात करते हुए खाने लगे।

वहाँ आराम के दौरान हमने जो नज़ारा देखा वो किसी स्वर्ग से कम नहीं था। हमलोग पहाड़ की चोटी पर थे। दूर-दूर तक घना जंगल और नीचे देखने पर खेत के छोटे- छोटे भाग। इंसान तो न के बराबर नज़र आ रहे थे। पूरा का पूरा दृश्य आनंददायक था। फिर मेरी नज़र मेरे पीछे की पहाड़ पर गई। मन एकदम सिहर उठा उस दृश्य को देखकर। आकाश और जमीन को एक दूसरे से मिलते हुए देखा मैंने पहली बार। और उसे मिला कौन रहा था! बादल! अद्भुत छटा थी हर जगह! मनमोहक, मनोरम,अकल्पनीय!
मुझे ये समझ नहीं आरहा था कि ऐसी जगह हमारे बिहार में है, फिर इतने लोगों के जानने के बावजूद ये छुपी हुई कैसे है? अन्य कोई देश होता तो कब का इसे विश्व ख्याति प्राप्त बना चुका होता। पर भैया ये है तो बिहार ही न! यहाँ राजनीति ज्यादा और विकास कम होता है। खैर! दृश्य ने मुझे पूरी तरह से भावविभोर कर दिया।

इस तरह के मनमोहक दृश्यों से यात्रा के दौरान कई बार दो-चार हुआ। प्रेम ने कहा “विवेक सुंदरता पर मोहित न हो,अभी सबकुछ सुहाना लग रहा पर इसमें खोना मत। कब यहाँ मौसम करवट ले ले, कुछ कहा नहीं जा सकता।” प्रेम पूरे रस्ते हमें समझाता, हिदायतें देता जा रहा था और हम तीनों उसका मजाक उड़ाते आगे बढ़ रहे थे।

10-12 km दूर जाने पर हमें आम के कुछ पेड़ दिखे। बड़े से आम के पेड़! लग रहा था जैसे पीपल और बट की तरह फैले हुए। एक के बाद एक कई। हाँ उन्ही आम के पेड़ की वजह से उस जगह का नाम था अमवाचुवा।
अमवाचुवा का हिंदी में अर्थ होता है आम का गिरना। शायद इसी तरह से इस स्थान का नामकरण हुआ होगा। वैसे तो इसका भी कोई प्रमाण नहीं, पर स्थानीय लोग यही कारण बताते हैं। अमवाचुवा को कुछ लोग अमवाछू भी कहते है,पर इसका प्रमाणित नाम क्या है वो मुझे नहीं पता।

आगे यात्रियों की भीड़ मिलनी शुरू हो गई। एक जगह हनुमान जी और दुर्गा जी का मंदिर है। वहाँ बहुत सी छोटी-छोटी दुकानें हैं। पहले तो कुछ भी मिलना मुश्किल था पर आज वहाँ आधुनिक पेय पदार्थ, खाने वाली चीज़े,पकौड़ी, चावल-दाल, सबकुछ मिलने लगा है। छोटी-छोटी तम्बुनुमा जगह बनाई गई है, जिसमें यात्री आराम करते हैं। आराम करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होता। पर शर्त होती है कि आपको खाने-पीने की चीज़ें उनकी दुकान से ही लेनी पड़ेगी।

ये दुकानें कई गाँव के लोगों की हैं। पर उस स्थान से सबसे नजदीकी गाँव है- कुसमा। वहाँ के लोग बहुत ही दयालु प्रवृति के हैं। जितना भी सामान लाया जाता है,सब पहाड़ी के नीचे से। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितनी मुश्किल से ये लोग अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।

मैंने भी उस जगह कुछ खाने की इच्छा जाहिर की। तब मुझे पता चला कि वहाँ की दही बहुत ही विख्यात है। हमने भी दही-चुरा लिया और जैसा सुना था उससे कहीं अधिक स्वादिष्ट दही का स्वाद था। मुँह से बस एक ही आवाज़ आई, तृप्ति! मन को तृप्त कर दिया था उस दही की मिठास ने। ऊपर से मलाई,अहा! उसके बाद मैंने बस यही सोचा कि असली जीवन तो यहाँ है, बाकि सब मोह माया है।

वहाँ से खा-पीकर कुछ आराम करने के बाद हमलोग आगे बढ़े। कुछ 3 या 4 km ऊपर-नीचे, समतल चलते हुए आखिर हमलोग पहाड़ के दूसरे छोर की तरफ पहुँचे। मैंने पैर में चप्पल पहना हुआ था। विक्की और प्रेम ने भी स्लीपर पहना हुआ था, पर झुन्नू एकदम खाली पैर। पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े पैर में चुभ रहे थे। चप्पल पहने होने के बावजूद हमें चुभ रहे थे तो वो खाली पाँव ही था।

यहाँ पहुँचते-पहुँचते लगभग 12 बज चुके थे। प्यास से बुरा हाल था। सूर्य अपनी किरणों की प्रचंडता बढ़ाये हुए थे। पत्थरों से टकराकर परावर्तित होती रोशनी गर्मी को और बढ़ा रही थी। पानी का कहीं नामोनिशान नहीं था,और न ही बादलों का। सुंदरता का एहसास तो हो चुका था लेकिन अब दुर्गमता भी साफ दिखने लगी थी। धीरे-धीरे प्रेम की बातें सच सी लगने लगीं।

प्यास से बेहाल हम सभी दोस्त आगे बढ़ रहे थे। पहाड़ी की ढलान पर जब नज़र गयी तो पहली बार मन में ये एहसास हुआ कि कहीं यहाँ आके हमने गलती तो नहीं की। एक तो धूप ऊपर से प्यास! जैसे-तैसे हारते-थकते हमलोग चलते रहे।

समतल भूमि पर आते ही पानी के बहने की आवाज़ कानो में पड़ने लगी। हमलोग खुश हो गए कि शायद इस धूप और गर्मी से राहत मिलेगी। इसी उम्मीद से तन में थोड़ी ऊर्जा का संचार हुआ और हमलोग आ गए नदी के पास।

लोगों ने और प्रेम ने पहले भी आगाह किया था कि पहाड़ी वाली नदी है। संभल कर पार करना। पर हम सभी तो नहाने के मूड में थे। प्रेम मना करता रहा पर हम सभी कूद पड़े पानी में।
हमने पहले भी कई कहानियां सुन रखी थी। बताया गया था कि सुगवा और दुर्गावती नदी में अचानक से बारिश का पानी आ जाता है, जिससे जलस्तर में काफी बढ़ोतरी हो जाती है। नदियाँ उफान मारने लगती हैं। हमें तो तैराकी आती नहीं, पर जलस्तर बढ़ जाने पर कोई तैराक भी इसका मुकाबला नहीं कर सकता। कारण था कि नदी चट्टानों से लबरेज रहती है।

शीतल सी लहर ने जब शरीर को छुआ तो एक अलग ही आनन्द की अनुभूति हुई। मन किया कि अब तो बस इसी में सो जाऊँ। पर ज्यादा देर तक इसमें रहना मौत से टकराने जैसा था। न जाने कितने लोग इस नदी के रास्ते काल के गाल में समा चुके हैं। नदी से बाहर निकल कर हमने अपने गीले कपड़े बदले और एक बार फिर वो कैमूर की घाटी गुप्ताबाबा की जयघोष से गूंज उठी।

वहाँ से 3 या तो4 km दूर चलने पर हम सभी पहुँचे उस जगह जिसके लिए हमने इतनी दुर्गम यात्रा की थी।
बाबा गुप्तेश्वर नाथ की गुफा के पास। वो गुफा जिसमें खुद भोलेनाथ भस्मासुर से बचने के लिए छुपे थे।
जैसे ही हमलोग गुफा के पास पहुँचे, मन हुआ कि एक बार दर्शन कर ले उसके बाद फिर कल सुबह दर्शन कर के हमलोग निकल जाएंगे वापसी के लिए। पर भाग्य से आगे और किस्मत से ज्यादा किसी को न कुछ मिला है,न मिलेगा।

 

मैंने सुन रखा था कि यहां बाबा के गुफा के पास एक झरना है, नाम है सीता कुंड। कहते है,यहाँ का पानी इतना शीतल है कि कुछ लोग इसे शीतल कुंड भी कहते है।
वहाँ जाने की उम्मीद में मैं अपने दोस्तों के साथ गुफा से कुछ दूर पर जाकर बैठ गया। जो बैग में था,निकाल के हम सभी दोस्त खाने लगे।

खाते-खाते मैंने अचानक प्रेम से पूछा कि भाई यहां से शीतल कुंड कितनी दूरी पर है। उसने बताया करीब 2 से 3 km। मैंने कहा कि हम सभी वही चलते हैं। इसके प्रेम ने योजना बनाई “कुछ देर यहाँ बिता लो। वहां चल के नहाया जायेगा और फिर वही से जल लेके गुफा में बाबा का दर्शन करने चलेंगे।”

कुछ ही समय गुज़रा होगा। अचानक से बादल की तेज़ गड़गड़ाहट हुई। आवाज़ से घबराकर लोग इधर-उधर भागने लगे। इस बीच मैं भी उठा और सबसे बोला “चलो हम सभी चलते है शीतल कुंड।” मैं लगभग दौड़ने लगा।
मेरे पीछे विक्की उसके पीछे झुन्नू और सबसे पीछे प्रेम था।

गुफा से शीतल कुंड जाने के वक्त दुर्गावती नदी को 2 बार पार करना पड़ता है। पहली धारा तो हम पार कर गए। पर इसी बीच बारिश बहुत तेज़ हो गई। दूसरी धारा तक पहुँचते-पहुँचते नदी का बहाव काफी तेज़ हो गया। हम सभी कुछ ही फुट के फासले पर थे। मैंने जब नदी को पार किया तब पानी मेरे घुटने तक। मेरे ठीक पीछे विक्की ने पार किया तब तक पानी उसके कमर तक। उसके पीछे झुन्नू पार करने लगा तब तक पानी की तेज़ धार लगभग उसके छाती के उपर बहने लगी। जैसे-तैसे हमने नदी पार कर लिया।
एक तो पहाड़, ऊपर से तेज़ बारिश और काले बादल। पूरी घाटी में घना अँधेरा हो गया। शाम के 4 ही बज रहे थे, लेकिन लगने लगा जैसे अमावस की अँधेरी रात हो, घुप्प अँधेरा।

अब तो डर समाने लगा। मन ही मन में खुद को कोस रहा था “न मैं प्रेम से ज़िद करता और न हम यहां मुसीबत में फँसते। मेरी ही वजह से ऐसा हुआ।” प्रेम का ख्याल मन में आते ही मैंने लगभग चीखते हुए विक्की से पूछा “प्रेम कहाँ है भाई?” विक्की ने बताया, वो तो झुन्नू के पीछे था।

झुन्नू ने कहा “मैंने ध्यान नहीं दिया, मैं खुद डूबने वाला था, किसी तरह पत्थर पकड़ के किनारे आया।” इतना सुनते ही डर और हताशा हमारे दिमाग पर हावी होने लगी।
पानी का स्तर बढ़ने लगा। हम भी धीरे-धीरे पहाड़ी के ऊपर बढ़ने लगे। हम ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे- प्रेम! प्रेम!

बिजली की गड़गड़ाहट, झरने और नदी की गुर्राहट, घना अंधकार, पेड़ के टूटने की आवाज़, बहते हुए पत्थर व चट्टानों को देखा हमने। सबकुछ इतना भयावह कि हमने भोलेनाथ से प्रार्थना की “हे भोलेनाथ आप किसी तरह हमें घर पहुंचा दें। दुबारा कभी वापस नहीं आएंगे।”

4 बजे से इनसब से जूझते हुए रात के 10 बज गए। न बारिश थमने का नाम ले रही थी और ना ही जलस्तर रुक रहा था। इस बीच जब प्रेम नहीं मिला तो हमें ये यकीन हो गया कि प्रेम नदी में बह गया। वो ज़िंदा नहीं है।

हम सोचने लगे कि उसके घर वालो से कैसे कहा जायेगा? कौन बोलेगा? कैसे बोलेगा के प्रेम नदी की बहाव में बह गया! कैसे कहेंगे कि साथ गए थे 4 और अब वापस 3 लोग आये हैं। मन दुःख में डूब रहा था।

एक ओर बारिश की बुँदे कमज़ोर पड़ रही थीं तो दूसरी और हमारे आँखों से आँसू की धारा तेज़ होती जा रही थी। किसी तरह हिम्मत करके हम सभी फिर उसी किनारे पर आये और एकदूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ कर टार्च की रौशनी में दूसरी तरफ देखने लगे कि शायद प्रेम वहां बैठा हो। पर हमारी हिम्मत भी अब जवाब देने लगी थी।
वो पल याद आते ही आज भी आँसू आ जाते हैं।

ये समय कटने का नाम नहीं ले रहा था। वक्त जैसे थम सा गया था। बिजली चमकने पर जिस तरफ भी हमारी नज़र जाती थी वहां बस पहाड़ से गिरने वाला झरना ही दिखाई दे रहा था। प्रकृति का ये मनोरम दृश्य हमारे लिए सबसे भयानक अनुभव बन चुका था।

रात के लगभग 12 बजे बारिश रुक गई। बारिश की वजह से सांप और बिच्छू ऊपर की ओर बढ़ रहे थे। हमने वहां से निकलना ही उचित समझा। एक दूसरे का हाथ पकड़ के हमने नदी को पार किया और अँधेरे में गिरते-पड़ते हम आखिरकार वापस गुफा के पास आगए।

4 बजे शाम से 12 बजे रात तक लगातार भींगने के बाद दुबारा नहाने की जरूरत नहीं पड़ी और न ही हिम्मत हुई। ठण्ड से हालत खराब हो रही थी। सर्दी-बुखार, थकान और सबसे बड़ा दुःख प्रेम की मौत की खबर। इन सबसे बेहाल किसी तरह हम एकदूसरे को ढांढस बंधवाते हुए आगे बढ़ रहे थे।

गुफा के पास आके सबने भोलेनाथ का जयकारा लगाया। हमने वहाँ भी प्रेम-प्रेम चिल्लाया। इस उम्मीद में कि शायद वो भीड़ को चीरते हुए हमारे पास आए और पूछे के तुम सब ठीक हो..?

लेकिन न कोई आवाज़ आई, न किसी ने कुछ बताया। पता चला कि उस बहाव में कुछ लोग बह चुके हैं। तब हमें एकदम यकीन हो गया कि प्रेम भी उनमें से एक था।
किसी तरह गुफा में अंदर जाके भोलेनाथ से प्रार्थना की हमने “हे भोलेनाथ किसी तरह प्रेम को घर पहुँचा दीजिये या हमसे मिला दीजिये।”

दर्शन करने के बाद रात को करीब 2 बजे हम तीनों ने फैसला किया कि अब एक पल यहाँ नहीं रुकेंगे, सीधे घर चलेंगे। रात में ही बिना आराम किये हमने पहाड़ की चढ़ाई शुरू कर दी। पूरी रात चलते रहे और लगभग 7 बजे सुबह पहाड़ से उतर चुके थे।

मन तो एकदम हताश हो चूका था कि हमने अपने एक दोस्त को खो दिया है। हम तीनों ही उदास थे। फिर भी हमने सोचा थोड़ा सा प्रसाद ले लेते हैं। आखिर प्रेम के घर जाना है और बताना ही है कि अब वो नहीं रहा। यही सब सोचते प्रसाद लिया हमने।

मन में उदासी छाई थी कि तभी किसी ने मुझे पीछे से खींचा और एक जोर का तमाचा मेरे गाल पर। आवाज़ भी जोर की हुई- चटाक!
मैंने मुड़के देखा तो मेरी आँखों में अचानक आँसुओ का सैलाब आ गया। इस बार आँसू गम के नहीं थे क्योंकि थप्पड़ लगाने वाला कोई दूसरा नहीं बल्कि प्रेम था।

वो वहां जलेबी खा रहा था और उसी जलेबी की रसभरी हाथों से जो गाल पर तमाचा लगाया न, गाल पूरा झन्ना गया और जलेबी का रस लगा सो अलग। हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी ये थी कि हमारा दोस्त ज़िंदा था। अब उसके घर पर मौत की सूचना नहीं देनी पड़ेगी।
मैंने सारी बातें प्रेम को बताई। प्रेम ने कहा “तुम तीनों ने नदी पार किया, मैं भी पार करने वाला था लेकिन एक पेड़ टूट के नदी में गिरा और बहने लगा। मैंने बहुत आवाज़ लगाई कि तुम सब वापस आ जाओ, वहाँ फँस जाओगे, कोई नहीं होगा उधर। पर सुनने से पहले ही तुम तीनों निकल गए। बहाव और बारिश इतनी जोर की थी कि लगा जैसे तुम तीनों बह गए। सब क्या कहेंगे कि प्रेम ये लोग पहली बार आये थे पर तुम तो कई बार आचुके हो। फिर कैसे छोड़ दिया अकेले सबको।”

प्रेम ने आगे बताया “जैसे-तैसे मैं भी वापस आ गया और बाबा का दर्शन करने गुफा में गया। वहाँ मुझे ऐसा लगा कोई जैसे प्रेम- प्रेम चिल्ला रहा। शायद तुमलोग होंगे, पर कोई नहीं दिखा। मैंने दर्शन किया, पहाड़ चढ़ाई की और सुबह यहाँ पहुँच गया। इस दुःख में था कि तुम में से कोई मर ही गया है। अब तुमलोगो को अच्छे से देखकर मूड अच्छा हुआ है।”

फिर हमने मिलकर प्रसाद की खरीददारी की और जीप में अपने-अपने घर को रवाना हुए। हमारी ये दुर्गम यात्रा सफल रही। हर हर महादेव!

याद है वो एक-एक पल जब हमने कहा था “महादेव अगर यहां से हम सभी सही सलामत अपने घर पहुँच जायेंगे तो दुबारा नहीं आएंगे।” पर जब प्रेम से मुलाकात हुई, उसके थप्पड़ में जो प्यार दिखा, जो दर्द दिखा, दोस्तों के प्रति जो स्नेह दिखी, उसके बाद चारों गले लग कर बेतहाशा रोये और भोलेनाथ से कहा “हे प्रभु! धन्यवाद! हम हमेशा आएंगे।”

विवेक दीप पाठक (प्रवक्ता, ऑल इंडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन, भोजपुर)

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