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एक बिहारन के अरमान, “हमार इच्छा बा कि हमार बियाह आपन गांव से होखो”

अमीषा त्रिपाठी, पुणे में फैशन डिजाइनिंग कर रही हैं। बिहार के बक्सर जिले के छोटे से गाँव नगरपुरा की रहने वाली अमीषा अपने प्रोजेक्ट्स में बिहार के परंपरागत परिधानों को प्राथमिकता तो देती ही हैं, बिहारी संस्कृति से अपने जुड़ाव को परदेस में रहकर भी खुलकर सामने लाती हैं। 18 साल की अमीषा साझा कर रही हैं भोजपुरी गीतों से अपने लगाव को व ज़ाहिर कर रही हैं अपनी एक मासूम इच्छा भी।

हमरा हिसाब से हमनी के आपन रीति रिवाज से जुड़ाव रहे के चाहीं, ओकरा से लगाओ रहे के चाहीं। हम देखले बानीं भोजपुरिया समाज के लगभग हर घरन में, माई चाहे मइया गीत गुनगुनात रहेली लोग। हर बिधि के गीत सुने के मिल जाला। हम माँ के देखत रहनी, जइसे कहीं सुनाओ कि घर में केहु के बियाह ठीक भइल बा चाहें लइका के जनेव पड़ल बा, चाहें केहु के लइका होखे वाला बा त माँ गीत गावे सुरु क देस।

हमारा गीतन से जुड़ाव माँ के चलते भइल। हम उनका के बचपने से घर में गावत सुनले बानी। माँ जब रोटी बनावस भा बरतन धोवस, गीत हमेसा गुनगुनास।

लइकी होखला के सबसे बेसी फायेदा इहे बा कि माँ के हर गुन देखे, सुने आ सीखे के मिल जाला।

हमरा एगो बात मन पड़ेला जब हम 8-9 साल के रहीं तब माँ के गीत गावत सुन के इयाद क लीं आ दोसरा घरे एगो मइया अकेले रहत रहली, उनका के जाके गाके सुनाईं। मइया बड़ी चाव से हमार गीत सुनस आ जहां गलती बुझाए ओइजा बतावस। एगो दुवारे बरियात के गीत हमरा बड़ी पसंद रहे ओकरे के खुब गावत रहनीं। एक लाइन आगे लिखऽतानी|

“आपन खोरिया बाहारऽ ए कवन बाबा,
आवऽतारन दुलहा दामाद ए लाला”

इ गीत त जइसे कंठस्त हो गइल रहे।

हम गांव से सहर में रहे लागल रहनी बाकि गीत सुने के मोका हमेसा मिलत रहे आपन माँ से, बड़ी खुसी होला सोच के कि आज उहे कामवां हमहुँ करेनी आपन क्लास वर्क करत।

माँ से कुल्हि गीतन के सुन-सुन के हरेक गीतन के धुन से प्यार भइल पहिले, फेर धीरे-धीरे लिरिक्स के मतलब बुझाइल कि मतलब का होला तब लागल कि भोजपुरिया गीत-संगीत कवनो अमृत घोंट से कम नइखे, बस महसूस करे के बा तब ओह घोंट के असर बुझाइ।

हमार सपना बा कि कुल्हि गीतन के कहीं सहेज के धऽ दीं, बस लागल बानीं ओह में। भोजपुरी के भीरी अथाह सागर बा गीतन के। हम त बस ओह में से एक-एक ठोप निकलले बानीं। अभी त बहुत बाकी बा, हरेक रसम के अनगिनत गीत बाड़ी संऽ।

हमरा सुरु से आपन भोजपुरिया बियाह के रीति रिवाज से बहुत जुड़ाव रहल बा। उहे देख के बड़ भइल बानी आ सबसे बेसी त गीत से। हम कवनो रसम के गीत के खाली सुनेनी ना हमेसा ओकरा के महसूस करेनी चाहें कतनो हाली सुनीं बाकिर कुछ गीतन के जब सुनब तब रोवा खाड़ हो जाला।

बियाह के कुल्हि रसम हमरा बहुत पसंद ह आ ओहु में सबसे बेसी पसंद ह जब माड़ो गड़ा जाला आ लइकी आके माड़ो पूजे ले, फुआ आ बहिन लोग कोहबर लिखेली लोग, मुंह से गीत गावत रहीहन लोग बाकिर आंख से लोर गिरत रहे ला, ओइजा लउके ला कि अब काल्ह से भतीजी आ बहिन ना लउकी।

जब बारात समियाना में रहे ला आ ओइजा से निकले ला दुवारे बारात लगावे खाती त घर के सब मरदाना बाराती के लिआवे जाला। हम अपना घर के बात करतानीं। दुवार प दुवार-पूजा खाती चउकी लागल रहे ला, गांव-घर के लइकी-कनिया छत पे बारात के इंतजार में खड़ा रहे ली लोग। जइसे बाजा के आवाज तनियो सुनाये सुरु होला तइसहीं मेहरारू लोग गीत काढ़ा देला।

हमरा इयाद बा लास्ट टाइम अपना छोटका बाबा के लइकी माने सबसे छोट फुआ के बियाह में गांवे गईल रहनी। केहु कहलस कि बारात निकल गइल बा दुआरे लागे खाती आ पड़को छूटत रहे। बारात पूरा 40-45 मिनट ले ले रहे दुआर तक आवे में। गीत जब गवाये सुरु भइल रहे त एक के बाद एक, एक के बाद एक गवाते गइल रहे। हम बस खड़ा होके गीतन के सुनत रहनी, ओह्ह समय प हम का महसूस करेनी हमरा आजतक ना बुझाइल बाकी एह दुनिया में एगो अलगे फील होला।

हमरा भीतरी ई सोच ना रहे ला कि काल्ह बिदाई बा, आंख भीज जाला, हम बस ओह्ह मोमेंट के फील करेनी। लइकी जवन गावे ली स ओकर एकैक लाइन के फील करेनी। उ छवि हमरा खाती अद्भुत होला।

जब खबर आवे ला कि गुरहंथी आवता, बीचे अगाना माड़ो आ माड़ो के एक ओर से लइकी बइठल रहेले ओकरा पीछे माड़ो के बहरी से गांव-घर के सब मेहरारू लोग। दुलहिन के साथे ओहघरी खाली नाउन माड़ो में रहेली अउरी केहु ना, ई पार्था पहिलहीं से चलत आवता। माड़ो के दूसरका ओर लइका वाला लोग खाती दरी चाहे गद्दा बिछल रहे ला। गुरहंथी खाती सब एक साथे आवे ला, ओह में पूरा बाराती ना होला, मुख्य रूप से लइका के घर के कुल्हि बड़ आदमी आ नाता-रिस्तेदार रहे ला लोग। जइसे सब अगाना में आवेला तइसे गीत सुरु होला।

“आई गइले डाल-दउरा, आई गइले सिर-मउरी,
आरे माई, आई गइले धिया के सोहाग-भाग,
धिया लेले चउकवे बइठी”

इ गीत सुनते एगो अलगे फीलिंग आवेला रोवा-रोवा खाड़ हो जाला, हम कहीं बियाह में रहेनी बस इ पल के इन्तेजार करेनी। हम शायद आपन इमोसन के कब्बो जुबान ना दे पाइब। बस अतने कहब कि हमारा खाती सौभाग बा कि हम भोजपुरिया माटी प जनम लेले बानी। हमार एगो इहो इच्छा रहल बा कि हमार बियाह हमार आपन गांव से होखो एक दम उहे रसम से जइसे 2001 में हमार फुआ के भइल रहे।

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