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विदेश में भी जिन्दा है बिहारियत, यूरोप में बिहार को एक ग्लोबल ब्राण्ड बना रहें हैं ये बिहारी

एक तरफ युवाओं पर सदा यह आरोप लगता रहा है कि वे समाज से दूर होते जा रहे हैं, सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं और खासकर बड़े शहरों में रह रहे शिक्षित युवा अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों को छोड़ बढ़ जाना चाहते हैं। इस आरोप की स्त्यता पर बिहार के कुछ शिक्षित युवाओं ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। ये युवा खोज व जोड़ रहे हैं अपने जैसे अन्य युवाओं को, जो अपनी संस्कृति के संरक्षक व प्रसारक हैं।

पढ़ाई या काम के सिलसिले में घर से दूर जाना एक मजबूरी हो सकती है पर यह मजबूरी दिल से बिहारियत मिटने की वजह न बन जाये, इसके लिए सात समंदर पार एक बिहारी की कोशिशों की चर्चा आज दुनियाभर में हो रही है।

प्रकाश शर्मा

इनका नाम है प्रकाश शर्मा। ये जहानाबाद के मूल निवासी हैं। पटना में रहकर शिक्षा ग्रहण किया इन्होंने। फिलहाल एक जापानी कंपनी में टेक्निकल मैनेजर का पद सम्भालते हुए छः वर्षों से जर्मनी में रह रहे हैं। प्रकाश कहते हैं कि बिहारियों को लगता था जर्मनी में बिहारी एक्का-दुक्का ही हैं। पर इस अवधारणा को स्वीकार करने की बजाय प्रकाश ने इसे आजमाने की सोची।

एक साल पहले यूरोप में रह रहे बिहारियों के लिए एक ग्रुप बना, फेसबुक ग्रुप! नाम रखा गया- ‘बिहार फ्रर्टेनिटी’। इसमें बिहार से संबंधित जानकारियाँ दी जाती थीं और सवाल पूछे जाते थे। सिलसिला चल पड़ा, लोग जुड़ते चले गए।
इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए जर्मनी के कई शहरों में प्रवासी बिहारिओं के सम्मेलन करवाये गए। लोगों को अपनों से मिलने, बात करने व यादें संजोने का अद्भुत मौका मिला।

अब सबने मिलकर इस फ़ोरम को एक संस्था का रूप दिया है, जिसका नाम “बिहार फ्रेटर्निटी” रखा गया है। यह एक ग्लोबल फ़ोरम है। इसका उद्देश्य है यूरोप में रह रहे बिहारियों की मदद करना, बिहार के पर्व को मिलजुल कर मनाना, बिहार को एक ग्लोबल ब्राण्ड बनाना और जो बिहार में रह कर बिहार को सींच रहे हैं उनके जीवन में अच्छा बदलाव लाने में मदद करना।

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में लिट्टी-चोखा

इस संस्था के अध्यक्ष शेखपुरा के अरविंद सिन्हा को बनाया गया है। टीम में नौ लोगों की कोर कमिटी भी बनी है, जिसमें प्रकाश शर्मा और अरविंद सिन्हा के अलावा रोशन झा (मधुबनी), रवि बरनवाल (पटना), सुधांशु शेखर (मुज़फ़्फ़रपुर), ज़ुल्फ़ेकार अरफ़ी, कुमार राहुल (ख़गड़िया), हिमांशु झा (बेतिया) और सत्येष शिवम् (सीतामढ़ी) भी हैं। अभी संस्था से केवल जर्मनी में 400 सदस्य जुड़े हुए हैं। ये अलग-अलग परिवेश के लोग हैं।

इस संस्था ने ‘प्रोजेक्ट ज्योति’ नाम से एक प्रोजेक्ट की शुरुआत भी की है, जिसके अंतर्गत बिहार के विभिन्न जिलों से 15-20 छात्रों का चयन करके उन्हें दुनिया के सामने अपनी काबिलियत को एक्सप्लोर करने का मौका दिया जाएगा। उन्हें उच्च स्तर की शिक्षा दिलाई जाएगी। इसके प्रथम चरण के लिए खगड़िया व शेखपुरा जिले को चयनित किया गया है।

प्रोजेक्ट ज्योति

यह वाकई बेहतरीन कदम है कि जब बिहार के बाहर जाने के बाद सक्षम बिहारी अपने क्षेत्र के लोगों को आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध करा रहे हैं।

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