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अम्मा से काल्ह बतिआइत रही त पता चलल कि आई सतुआनी है

“अमुआ मोज़र गईले महुआ कोसा गईले, 
रसवा से भर गईल कुल डरिया 
तनि ताका न बलमुआ हमार ओरिया”

आई भोरे से इहे गीत सुन रहल हति. अम्मा से काल्ह बतिआइत रही त पता चलल कि आई सतुआनी है. आई जे घरे रहिति त भोरवे में अम्मा एक चुरुआ पानी ले कर माथा पर थोपले रहित आ कहले रहित, “भगवान तोरा मांगे-कोखे जुड़ रखी हथुन”. आ खाहुला बसिया खाना भेटल रहित. राते के बनाएल भात-दाल, तरकारी, तरुआ, दही सब. इहाँ त कुछ न पता चल रहल हई. न आम के पेड़ हई न कुछो मोजरल हई. एहने दिन पर घरे के इयाद बहुत अबईछई.

कल अम्मा से बात किये तो पता चला कि आज सतुआनी है. गेहूं और चना के साथ बाकि की दलहन फसलें भी तैयार हो कर घर में आने की ख़ुशी में यह त्यौहार मनाया जाता है. अन्न देवता को आभार प्रकट करने के लिए चने या जौ को पीस कर सत्तू बनाया जाता है. फिर उस सत्तू के साथ आम का टिकोला और तुलसी के पत्ते के साथ भोग लगाया जाता है. इसी दिन सौर मास के हिसाब सूर्य रेखा से दक्षिण की ओर चला जाता है. इसी दिन से खरमास (महीने के वो दिन म=जिनमें शुभ-कार्य नहीं किये जाते) की समाप्ति होती है और लग्न-मुहूर्त शुरू हो जाते हैं.

वैसे भी सब जानते ही हैं हम बिहारियों के लिए सत्तू का अपना स्वैग है. हम पीने से लेकर खाने तक में इसको चलाते हैं. लिट्टी-चोखा के अलावा इसको भर कचोरी, पराठा और भी न जाने क्या-क्या बनता है.

आज के दिन की तैयारी हमारे यहाँ कल रात को ही पूरी हो कर ली जाती है. रात को ही आज दिन का खाना बना कर रख लिया जाता है. अम्मा रात को सोने से पहले पीतल के लोटा में पानी भर भगवान जी के सामने रख देती हैं. सुबह उठ कर हम बच्चों से ले कर घर के चौखट-किवाड़ी, पेड़-पौधे तक में में पानी डालती हैं. सबको जुड़ाती हैं.

बचपन में जब गांव में रहते थे तो दादा जी के साथ रात वाला पानी डोल में ले गाछी (आम-लीची का बगीचा) में जाते थे और सारे पेड़ की जड़ों में ये पानी रखा करते थे. लौटने पर लौटते हुए टिकोला लिए आते थे. दाईजी उन टिकोलों से पहले भगवानजी को भोग लगाती थी. फिर अम्मा चटनी पीसती थी. उस दिन पहली बार हम आम की चटनी खाते थे. काहे से कि पहले भगवान जी का हक़ होता है न इसलिए.

और आज ही के हमारे यहाँ विदागरी भी होता है. दुल्हें आते हैं अपनी दुल्हनों को अपने संग ले जाने के लिए. दुल्हनें थोड़ी आँखों में सपने लिए अपने पिया जी के संग उनकी दुनिया को महकाने के लिए मायके से अपने साथ, आम का मंजर तो महुए की ख़ुश्बू लिए चल पड़ती हैं.

बस आज मन आम की गाछी, टिकोले और महुआ के रस में डूबा हुआ है.)

लेखक: अनु रॉय

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