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मांझी द माउंटेन मैन: बिहारी मोहब्बत की एक अनोखी कहानी!

ए फगुनिया हम तोरा से बहूते प्यार करत है रे .. नवाजुद्दीन सिद्दिकी की दमदार आवाज में बोला गया यह डायलॉग सीधे हमें याद दिलाता है ‘मांझी द माउंटेन मैन’ फिल्म की!

देखने में तो सिनेमा हॉल की एक सीट पर यह फिल्म काफी शानदार लगती है। मगर यह फिल्म बसी है बिहार के उसी गहलौर पर्वत में आज भी,  जो रास्ता गहलौर पर्वत का सीना चीरकर बाहर निकलता है। वह आज भी बिहार के दशरथ मांझी की बिहारी मोहब्बत की कहानी सुनाता है। वो दशरथ मांझी एक बिहारी ही था जिसके हाथों में इतनी ताकत थी कि उसने अपने सामने पर्वत को झुका दिया!

दशरथ मांझी को माउंटेन मैन के नाम से भी जाना जाता है।

1934 में जन्में दशरथ मांझी का जन्म बिहार के छोटे से गांव गहलौर में हुआ था। उस वक़्त गांव बहुत दयनीय परिस्थिति से गुजर रहा था। ना सड़कें, ना पानी, ना बिजली ..मूल भूत सुविधाओं से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं था गांव का! इसी छोटे से गांव से एक बिहारी के प्यार की कहानी शुरू हुई थी।

गांव पूरी तरह से जात-पात लिपटा हुआ था। मांझी गहलौर के एक गरीब मजदूर के बेटे थे। थोड़े बड़े होने पर वो घर छोड़कर भाग जाते हैं। और फिर कई सालों बाद लौटते है। लौटने के बाद उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद गहलौर पर्वत से गिरने से उनकी गर्भवती पत्नी की मृत्यु हो जाती है। उनकी पत्नी का इस तरह से पहाड़ से गिरकर मर जाना उन्हें अंदर तक हिला कर रख देता है। दशरथ मांझी जैसे अपनी पत्नी की याद में पागल हो जाते हैं।

यही आग उनके मन में सिर्फ एक हथौड़े और एक छेनी की मदद से 360 फुट लंबे,30 फुट चौड़े और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काट कर सड़क बना देने की हिम्मत भरती है। इस काम को पूरा करने में मांझी को पूरे 22 साल लग गए। जिसके अद्भुत और सराहनीय कार्य के बाद दशरथ मांझी माउटेन मैन बन गए ।

मांझी का यह सफर काफी लंबा संघर्षपूर्ण रहा। पहाड़ को तोड़ता देखकर पूरे गांव वाले मांझी को पागल समझते थे। सब उन्हें ऐसा पागलपन नहीं करने की सलाह देते थे। कोई उनकी मदद को तैयार नहीं था क्योंंकि सभी को यह काम पागलपन लग रहा था।

हालांकि सफल होने के बाद मांझी का कहना था कि इसी पागल शब्द से उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती थी। उन्होंने संकल्प लिया था कि खुद के दम पर वो अतरी और वजीरगंज के दूरी को कम करेंगे।

 

22 साल के लगातार परिश्रम के बाद आखिरकर वो पहाड़ काटने में सफल रहे। इस काम में मांझी को 1960 से 1982 तक का समय लगा। मगर उनकी इस सफलता के बाद सड़क बनकर तैयार हुई और पूरे गांव के आवा गमन काफी सरल हो गया।अंत में गांव वाले भी उनकी मेहनत को रंग लाता देखकर उनकी मदद करने लगे थे और साथ ही सराहना भी। मांझी की इज्जत इस सड़क के बनने के बाद दोगुनी हो गई थी। मांझी की मृत्यु 17 अगस्त 2017 को हुई थी।

दशरथ मांझी की इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया था। नीतीश कुमार ने उनके नाम पर अस्पताल बनाने की घोषणा भी की है।

दशरथ मांझी पर फिल्म के आलावा एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म (द मैन हू मूव्ड द माउंटेन)भी बनी थी। यह डॉक्यूमेंटरी 2012 में बनी थी जिसके निर्देशक कुमुद रंजन हैं। इसी साल मांझी द माउंटेन मैन बनाने की केतन मेहता ने घोषणा की थी। सत्मेव जयते सीज़न 2 के पहले एपिसोड में भी दशरथ मांझी की कहानी दिखाई गई थी।

एक बिहारी के अंदर का जज्बा बेमिसाल ताकत और अनोखी मोहब्बत ही बिहार की अलग परिभाषा लिखती है। मांझी के इस योगदान को पूरा बिहार हमेशा याद रखेगा!

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