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हिन्दी दिवस पर हिन्दी की व्यथा एक हिन्दी प्रेमी की कलम से …

एक बात तो सम्पूर्ण सत्य की सीढी चढ़ रहा है और चीख चीख कर हमारी हिन्दी हमे ये एहसास दिला रही है की वो अपने ही घर मे कैद है । या यू कहो की अगर थोड़ी स्वतंत्रा भी मिली है तो बस दासी बन कर जीने को मजबूर है हमारी हिन्दी ।

आज जिस हिन्दी को हमारी आधुनिक पीढ़ी सिरे से नकारती जा रही है, सोचो यदि आप और आपके घर की संस्कृति को इस तरह तित्तर-बित्तर कर देने की स्थिति मे लाकर छोड़ दिया जाये तो आपको कैसा लगेगा?
कहने को तो बड़ी आसानी से कह देते हैं हम की हिन्दी हमारी शान है, जान है, अभिमान है । लेकिन क्या सच मे इसे शान जान अभिमान बनाने के लिए एक कदम हम सब ने बढ़ाने की कोशिश की है?
एक बात तो सम्पूर्ण सत्य की सीढी चढ़ रहा है और चीख-चीख कर हमारी हिन्दी हमे ये एहसास दिला रही है की वो अपने ही घर मे कैद है । या यू कहो की अगर थोड़ी स्वतंत्रता भी मिली है तो बस दासी बन कर जीने को मजबूर है हमारी हिन्दी ।


एक बार इस सच्चाई को अन्तः करण से सोंचने और इस पर विचार करने की जरूरत है हमें। खास कर के हम हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगो को, जो जितनी तेज़ी से आधुनिक पैमानों और उपकरणों को अपने जीवन में स्वीकृति दे रहें हैं, उनती ही तेज़ी से हिन्दी को अपना मानने से इंकार भी करते जा रहे हैं। आज अँग्रेजी जरूरत बनती जा रही है इसका मतलब ये नहीं है की हम अपनी राजभाषा और मातृभाषा को भुला दे।
हिन्दी भाषा को एक अंतराष्ट्रीय भाषा की मान्यता आज तक नहीं मिल पायी है, हिन्दी ने अपना स्थान संयुक्त राष्ट्र संघ मे अब तक नहीं बनाया है जबकि सच्चाई ये है की दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा मे हिन्दी का नाम आता है।

आश्चर्य तो तब लगा जब योग को मानने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ मे 177 देशों का समर्थन आसानी से मिल जाता है लेकिन हिन्दी को एक भाषा की मान्यता दिलाने के लिए मात्र 129 देशों का समर्थन भी प्राप्त नहीं हो पा रहा है। सोंचने वाली बात है की यदि हम उसे मानते हैं, उस पर हमे गर्व भी है और उसे हम अपनी संस्कृति से अलग नहीं करना चाहते हैं तब हिन्दी की ऐसी स्थिति क्यूँ है?

हिन्दी की व्यथा को देखते हुये मेरी कलम आज कुछ कहना चाहती है आप सब से| शायद मेरी कलम प्रेरित कर पाये आप सब को हिन्दी को हमारी सच्ची शान बनाने में, अपने ही घर मे कैद हिन्दी को आज़ाद करवाने में ….

अभागी हिन्दी

दुबली पतली, थकी थकी सी प्यारी हिन्दी,
ओह अभागी किस्मत वाली मारी हिन्दी ।
दुख मे डूबी, टूटी और हारी हिन्दी,
बिलख बिलख कर, रोती आज हमारी हिन्दी ॥
अंग्रेजों से मिली आज़ादी, अँग्रेजी मोद मनाये,
महलों मे भी मिले पालना, अफसर के मन भाये ।
हिन्दी बेचारी करे चाकरी, दर दर की ठोकर खाये,
व्यथा की ये करुण कहानी, मुझसे लिखी ना जाये ॥
हिन्दी की शान मे हीं, भारत की शान है,
हिन्दी हमारी आत्मा, हिन्दी हमारी जान है ।
कोई पीछे मूड़ कर देखे, हिन्दी कितनी महान है,
हिन्दी से ही बचा आज तक, दुनिया मे सम्मान है ॥

 

लेखक – विपुल शरण

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