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कई परियोजनाएं बनें, करोड़ों खर्च हुए, हजारों मर गए पर बिहार में बाढ़ अब भी वैसा ही है

“बाढ़ी फेरो औतैक” एक मैथिली नाटक, जो बचपन मे गांव के काली पूजा नाटक मंच पर देखा था। उसके एक पात्र का कथन आज भी याद है “बाढ़ी अबै नै छै, लाओल जाई छै। राहत बंटै बला गिरोह के द्वारा, सरकारक नीन एकरा बजाबैत छै गरीब गुरबा के जीवनक-घर-परिवार दहा क ल जाई लेल ताकि बाढ़ी नियंत्रण आ पुनर्वास के नाम पर करोड़ो के पैकेज आबै खाई लेल”।

बिहार का शोक कहे जाने वाले कोशी के अलावा कमला, बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, भुतही बलान जैसी कई बरसाती नदियाँ हर साल लाखों घरों और खेती के जमीन को प्रभावित करती है।

कई परियोजनाएं बनी, करोड़ों खर्च हुए, हजारों मर गए, कई तटबंध बने, मुआवजे बंटे पर बाढ़ अब भी वैसा ही है।

कहीं पढ़ा था की जब नेहरू जी ने कोशी नदी के बांध का पैसा भाखड़ा-नांगल को दे दिया था तो कोशी इलाके के लोगों ने बांध के लिए श्रमदान किया था। सरकारी मशीनरी चाहती है की बाढ़ आए। पुरानी बात है, आज कहीं पढ़े थे की एक बार जब मधुबनी जिला में एक तटबंध टूट रहा था लालू राज में तो तब के कम्युनिस्ट स्वयंसेवक रात में मिट्टी डाल कर रोकने की कोशिष कर रहे थे। DM साहब ने उन पर लाठियां चलवा दी तबके जिला जज रात में अकेले नाइट गाउन पहन के पुलिस की लाठियां रोकने दौरे थे।

इस इलाके में इतनी नदियाँ है की अगर ठीक से बरसाती जल का प्रबंधन किया जाय तो बाढ़-सुखाड़-पेयजल-सिंचाई-बिजली सब की समस्या दूर हो सकती है। फेसबुक पर एक बुजूर्ग मित्र दिनेश मिश्रा जो आईआईटी से पढ़ाई के बाद नौकरी छोड़ के बाढ़ और नदियों पर रिसर्च में लग गए उन्होंने इस पर बहुत काम किया है और कई किताबें लिखी है। फिर भी सब शून्य।

केंद्र और राज्य के हजारों करोड़ों के अलावा 2015 में वर्ल्ड बैंक ने करीब 1500 करोड़ की राशी कोशी बाढ़ क्षेत्र के लिए अप्रूव किया । पैसा कहां खर्च हुआ और रिजल्ट क्या हुआ ये सवाल फिर गूंजेगा जब फिर से बाढ़ लाखों घरों को दहा देगी। फिर लोग मरेंगे-दहेंगे, अस्पताल-स्कूल-बिजली-संचार ठप हो जाएगा, खेती और रोपल खेत दह जाएगा, सड़क-तटबंध टूट जाएगी, बीमारियां फैलेगी, राहत शिविरों में बच्चे भूखे बिलखेंगें। नेता लोग हेलीकॉप्टर से घूम आएंगे ऊपर से, कुछ पैकेट गिराया जाएगा और फिर अगले एक साल तक लोग मुआवजे की रकम और अपने परिजनों को ढूंढने और जिंदगी को पटरी पर लाने में लगे रहेंगे।

और अगले साल बाढ़ फिर आ जाएगी।


लेखक- आदित्य झा

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