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गांधी का चंपारण से है ऐसा रिश्ता जिसको जान कर आँखे भर आएंगी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चम्पारण से रिश्ता इस इतिहासिक विषय को जब भी लेखक लिखने बैठेगा तो उस के मस्तिक में जो बात आएगी वह है चंपारण सत्याग्रह जो गांधी जी के नेतृत्व में भारतीय इतिहास में प्रथम सत्याग्रह था और चंपारण जिला को यह सौभाग्य प्राप्त है।

 

चंपारण के हजारों मेहनत काश मजदूर एवं गरीब किसान अंग्रेजों के लिए नील की खेती करने को बेबस थे। अक्सर जमीनों को अंग्रेजों ने अपने कब्जे में लेकर अपनी कोठियां और नील के कल-कारखाने बनाते जा रहे थे। उसके बावजूद किसान गरीब मजदूरों पर अंग्रेजों द्वारा ज़ुल्म व सितम के पहाड़ तोड़े जा रहे थे। शोषण का बाजार गर्म था नीलहे अंग्रेजों के शोषण से तंग आकर चंपारण के एक निवासी जिन्हें पूरा भारत राजकुमार शुक्ल के नाम से जानता है। जो एक किसान भी थे अंग्रेजों के इस अत्याचार का वर्णन करने हेतु महात्मा गांधी से मिले, और गांधी जी को चंपारण आने का नेवता भी दिया और गांधी जी राजकुमार शुक्ल के साथ 10 अप्रैल 1917 को पटना पहुंचे वहां से मुजफ्फरपुर आये वहां अपने एक मित्र जो मश्हूर बैरिस्टर मौलाना मजहरुल हक़ से मिल के चंपारण में किसानो पर हो रहे अत्याचार और नील के खेती से संबंधित समस्याओं की जानकारी ली और विचार विमर्श किया।

 

मुजफ्फरपुर से 15 अप्रैल को गांधी जी मोतिहारी पहुंचे और 15 अप्रैल की सुबह में चंपारण भ्रमण हेतु प्रस्थान कर रहे थे उसी समय मोतिहारी के एस.डी.ओ के सामने उपस्तिथि का फरमान मिला। उस आदेश के साथ गांधी जी को चंपारण छोड़ देने का भी सन्देश था। मगर इस आज्ञा का उलंघन कर गांधी जी ने अपनी यात्रा जारी रखा। आदेश न मानने के कारण उनपर मुकदमा चलाया गया। चंपारण पहुँच कर गाँधी जी ने जिलाअधिकारी को पत्र लिखा कि, “वे तब तक चंपारण नही छोङेगें, जबतक नील की खेती से जुड़ी समस्याओं की जाँच वो पूरी नही कर लेते।” जब गाँधी जी सबडिविजनल की अदालत में उपस्थित हुए तो वहाँ हजारों की संख्या में लोग पहले से ही गाँधी जी के दर्शन को उपस्थित थे। मजिस्ट्रेट मुकदमें की कार्यवाही स्थगित करना चाहता था, किन्तु गाँधी जी ने उसे ऐसा करने से रोक दिया और कहा कि सरकारी उलंघन का अपराध वे स्वीकार करते हैं। गाँधी जी ने वहाँ एक संक्षिप्त बयान दिया जिसमें उन्होने, चंपारण में आने के अपने उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होने कहा कि “वे अपनी अंर्तआत्मा की आवाज पर चंपारण के किसानों की सहायता हेतु आये हैं और उन्हे मजबूर होकर सरकारी आदेश का उलंघन करना पङा। इसके लिए जो दंड दिया जायेगा उन्हें स्वीकार हैं।”

 

गांधी जी के इस अभियान से अंग्रेज सरकार हिल गयी। पुरे भारत का ध्यान अब चंपारण पर था। सरकार ने मजबूर होकर एक जाँच आयोग नियुक्त किया, गांधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया। जमींदार के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बनने लगे। साथ ही गाँधी जी ने छुआ-छूत को खत्म किया। चम्पारण ही भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बना, भारत में सत्याग्रह की पहली विजय चम्पारण सत्याग्रह ही था। सत्याग्रह की सफलता के बाद गांधी जी ने चंपारण छोड़ वापस जाने का मन बनाया। चंपारण वासियों ने उन्हें दोबारा चंपारण आने का नेवता भी दिया। गांधी इस वादे के साथ वापस गुजरात लौटे की वह दोबारा आएंगे मगर चंपारण वासियों को अफ़सोस और निराशा ही हाथ लगी। आज भी चंपारण में चाहे पूर्वी हो या पश्चमी कई सारी कोठियां, आश्रम गांधी जी के नाम से स्थापित है। चंपारण में गांधी जी का आगमन केवल वह सत्याग्रह या निलहों के खिलाफ ही आंदोलन नहीं था बल्कि चंपारण में गांधी जी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई की महत्व को भी लोगों को समझाये और जागरूकता के लिए भी कई अभियान चलाया, कई प्रथाओं को भी समाप्त किया जो ज़माने से चंपारण में चलित था, गांधी जी के बिहार आने के बाद से बिहार के राजनीति की भी तस्वीर बदलती जा रही थी। चंपारण वासियों को साहस और बल मिलता जा रहा था। जब-जब चंपारण या सत्याग्रह का ज़िक्र होगा गांधी जी का नाम आएगा। वैसे बापू का रिश्ता तो पुरे भारत से है। परन्तु चंपारण सत्याग्रह से बापू ने अपने आप को भारत के सामने परिचित कराया और उनके द्वारा चंपारण में रचनात्मक कार्यों ने एक इतिहास रचा।

 

उस महान सत्याग्रह के 100वें साल में हम प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन हर एक व्यक्ति, जो मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है, आज गांधी की कमी महसूस कर रहा है। देश के किसान सौ वर्ष पूर्व भी परेेशान थे और वे आज भी परेशान हैं। आर्थिक विषमताएं, सामाजिक कुरीतियां और धार्मिक-जातिगत तनाव आज भी देश की कमजोरी बने हुए हैं। सत्य, अहिंसा और प्रेम के जो मंत्र महात्मा गांधी द्वारा हमें प्रदान किए गए, आज अपने ही देश के अंदर अव्यावहारिक साबित किए जा रहे हैं। ऐसे में, गांधीजी के नेतृत्व में देश के पहले सफल सत्याग्रह- चंपारण सत्याग्रह की सौवीं वर्षगांठ पर हमें उनके मार्गों की प्रासंगिकता को गहराई से समझना चाहिए और उनको अपनाने की कोशिश करना चाहिए ।

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