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वह गांधी का स्पर्श ही था, जिसने अहिल्या जैसे पाषाणवत् चंपारण को धधकता शोला बना दिया था

वैसे तो इतिहास के हर घटना की शताब्दी आती है और उसे सौ साल पुराना बना कर चली जाती है। हम भी इतिहास को बीते समय और गुजरे लोगों का दस्तावेज भर मानते हैं। लेकिन इतिहास बीतता नहीं है; नए रूप, नए संदर्भ में बार-बार लौटता है और हमें मजबूर करता है कि हम अपनी आँखें खोलें और अपने परिवेश को पहचानें! इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं कि वे जब भी आपको या आप उनको छूते-खोलते हैं तो आपको कुछ नया बना कर जाते हैं। इसे पारस-स्पर्श कहते हैं। इतिहास का पारस-स्पर्श! चंपारण का गांधी-अध्याय ऐसा ही पारस है। इस पारस के स्पर्श से ही गांधी को वह मिला और वे वह बने जिसकी खोज थी उन्हें, यानी इतिहास ने जिसके लिए उन्हें गढ़ा था। और वह गांधी का स्पर्श ही था कि जिसने अहिल्या जैसे पाषाणवत् चंपारण को धधकता शोला बना दिया था।

 

10 अप्रैल, 1917 , यही वह दिन था जब 48 वर्षीय मोहनदास करमचंद गांधी नील के खेतिहर राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर पहली बार बिहार की धरती बांकीपुर स्टेशन (अब पटना) और 15 अप्रैल 1917 को चंपारण पहुँचे। चंपारण सत्याग्रह का बिगुल फूंकने वाले मोहनदास करमचंद गांधी यहीं से महात्मा बने और उनके साथ इस पावन भूमि का नाम भी इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज हो गया ।

उस एतिहासिक घटना एवं आंदोलन के 100 वर्ष पूरे होने जा रहें हैं। भारत में सत्य और अहिंसा की ताकत का प्रथम दर्शन कराने वाला चंपारण पुनः गांधीमय होने जा रहा है। चंपारण सत्याग्रह शताब्दी सामारोह का भव्य योजन होने जा रहा है।

इस ऐतिहासिक वर्ष को यादगार बनाने के लिए कई सामारोह का आयोजन हो रहा है, जो इस माह से अगले साल अप्रैल तक चलेगा। गांधी और गांधीवाद से संबंधित डॉक्युमेंट्री का निर्माण कर कॉलेज तथा स्कूलों में दिखाया जायेगा। पूरे बिहार में गांधी जी के संदेशों और फिल्म आदि के साथ रथ निकलेगा। इस संदेश की गूंज ऊँची होगी।, देशव्यापी होगी।

“इस कवायद से यदि 10 फीसद बच्चों के मस्तिष्क में भी गांधी के विचार और आदर्श पहुँचाए जा सकें तो बिहार के भविष्य के लिए यह असाधारण उपलब्धि होगी।”

– मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

 

प्रकाश पर्व की तरह यादगार होगा चंपारण शताब्दी वर्ष 

कुछ माह पीछे जाएँ तो प्रकाश पर्व के आयोजन को लेकर कई गणमान्य हस्तियों के मन में शंका के बादल मंडरा रहे थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कुशल नेतृत्व में आयोजन न सिर्फ सफल हुआ, बल्कि इसकी गूंज देश ही नहीं विदेशों में भी सुनाई दी और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कदम भी यहाँ पड़े और मुख्यमंत्री की प्रशंसा की। पंजाब के मुख्यमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि इतना सफल आयोजन वे भी नहीं करा सकते थे।

महात्मा गांधी ने चंपारण की धरती पर स्वच्छता का पाठ भी पढ़ाया था । सौ वर्ष पूरा होने पर पूरे साल केंद्र सरकार की तरफ से स्वच्छता आंदोलन चलाया जायेगा और इस आंदोलन का बिगुल खुद प्रधानमंत्री मोदी फूकेंगे। इस आयोजन से 100 साल बाद फिर चंपारण विश्व पटल पर छा जायेगा।

 

100 साल पहले चंपारण सत्याग्रह का जन्मभूमि बना 

15 अप्रैल, 1917 भारतीय इतिहास की वो सुबह, जब निलहों के अत्याचार से त्रस्त चंपारण के किसानों ने उम्मीद की किरण देखी थी। महात्मा गांधी ने चंपारणबद्ध आंदोलन के जरिए किसानों को कई समस्याओं से मुक्ति दिलाई थी। उन्होंने यहाँ अंग्रेजों के जुल्म से पिस रहे किसानों के समक्ष पहली शर्त रखी डर से स्वतंत्र होने की जिसके कारण चंपारण देखते-देखते सत्याग्रह की जन्मस्थली बन गया और विश्व फलक पर पहुँच गया। बापू के साथ चंपारण का नाम यूँ जुड़ा कि सौ साल बाद भी वे यहाँ ‘जिंदा’ हैं।

 

राजकुमार शुक्ल की पहल पर आए थे बापू

मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व में 1917 में संचालित चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी। वे दस अप्रैल, 1917 को जब बिहार आए तो उनका एक मात्र मकसद चंपारण के किसानों की समस्याओं को समझना, उसका निदान और नील के धब्बों को मिटाना था। गांधी ने 15 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी पहुँचकर 2900 गाँवों के तेरह हजार किसानों की स्थिति का जायजा लिया। 1916 में लगभग 21,900 एकड़ जमीन पर आसामीवार, जिरात, तीनकठिया आदि प्रथा लागू थी। चंपारण के किसानों से मड़वन, फगुआही, दशहरी, सट्टा, सिंगराहट, धोड़ावन, लटियावन, शरहवेशी, दस्तूरी, तवान, खुश्की समेत करीब छियालीस प्रकार के ‘अवैध कर’ वसूले जाते थे। कर वसूली की विधि भी बर्बर और अमानवीय थी। नील की खेती से भूमि बंजर होने का भय अलग था।

 

उधर, गांधीजी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही थी। तत्कालीन समाचार पत्रों ने चंपारण में गांधीजी की सफलता को काफी प्रमुखता से प्रकाशित किया। निलहे बौखला उठे। गांधीजी को फंसाने के लिए तुरकौलिया के ओल्हा फैक्टरी में आग लगा दी गई। लेकिन गांधीजी इससे प्रभावित नहीं हुए।

बाध्यता के कारण बिहार के तत्कालीन डिप्टी गर्वनर एडवर्ड गेट ने गांधीजी को वार्ता के लिए बुलाया। किसानों की समस्याओं की जांच के लिए ‘चंपारण एग्रेरियन कमेटी’ बनाई गई। सरकार ने गांधीजी को भी इस समिति का सदस्य बनाया। इस समिति की अनुशंसा के आधार पर तीनकठिया व्यवस्था की समाप्ति कर दी गई। किसानों के लगान में कमी लाई गई और उन्हें क्षतिपूर्ति का धन भी मिला। हालांकि, किसानों की समस्याओं के निवारण के लिए ये उपाय काफी न थे। फिर भी पहली बार शांतिपूर्ण जनविरोध के माध्यम से सरकार को सीमित मांगों को स्वीकार करने पर सहमत कर लेना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। सत्याग्रह का भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यह पहला प्रयोग इस लिहाज से काफी सफल रहा। इसके बाद नील की खेती जमींदारों के लिए लाभदायक नहीं रही और शीघ्र ही चंपारण से नील कोठियों के मालिकों का पलायन प्रारंभ हो गया।

 

आंदोलन से मिला दूरगामी लाभ

इस आंदोलन का दूरगामी लाभ यह हुआ कि इस क्षेत्र में विकास की प्रारंभिक पहल हुई, जिसके तहत कई पाठशाला, चिकित्सालय, खादी संस्था और आश्रम स्थापित किए गए। बापू ने तीन बुनियादी विद्यालयों की स्थापना की ताकि लोगों में शिक्षा का संचार हो, जिससे उनमें निर्भयता विकसित हो।

 

गांधी दर्शन के आईने में आज का चंपारण 

चंपारण के लोगों में आज भी बापू के प्रति अपार प्रेम झलकता है। फिर चंपारण में बापू के सपने हकीकत क्यों नहीं बन रहें हैं? चंपारण हाशिए पर है। न यहाँ पूर्ण स्वच्छता लागू है और न ही शिक्षण व्यवस्था ही सुदृढ़ की जा सकी है। यहाँ तक कि गरीबी और अशिक्षा के कारण यह इलाका नक्सल प्रभावित हो गया। लेकिन अब चंपारण बदल रहा है। आने वाले समय में चंपारण और बदलेगा। बापू के संदेश को पूरी दुनिया के लोग करीब से जानेंगे और समझेंगे।

सौ साल के पुराने इतिहास को जीवंत रूप में प्रदर्शित कर उसे सीधा ‘कनेक्ट’ करने की कोशिश चंपारण के कोने-कोने में चल रही है। जहाँ-जहाँ महात्मा गांधी गये थे, उन सभी जगहों के विकास के साथ समाजिक परिवर्तन हो, ऐसी कोशिशें हो रही हैं। इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार के स्तर पर काम जारी है

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