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इस बिहारी ने अकेले बीसीसीआई से लड़कर लिया बिहार क्रिकेट का मान्यता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एतिहासिक फैसले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में प्रशासनिक सुधार के लिए जस्टिस आर एम लोढ़ा की प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है. इसकी चारों तरफ प्रशंसा की जा रही है।  इस सिफारिशों को लागू कर देने के बाद 15 साल बाद फिर से बिहार के क्रीकेट संघ को पूर्ण मान्यता मिलने का रास्ता साफ हो गया। बिहार ने 2000 में झारखंड के बनने के बाद अपनी पूर्ण सदस्यता और मतदान का अधिकार गंवा दिया था।

 

भले यह फैसला कोर्ट ने सुनाया हो मगर इस क्रांतिकारी फैसले के पिछे बिहार के क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (कैब) के सचिव आदित्य वर्मा का सबसे बडा हाथ है।

 

गौरतलब है कि आईसीसी से लेकर बीसीसीआई तक में जिस एन श्रीनिवासन के खिलाफ खड़े होने की किसी मे हिम्मत नहीं थी उस श्रीनिवासन के खिलाफ सबसे पहले आवाज बिहार के आदित्य वर्मा ने ही उठाई थी।   वर्मा की कानूनी कार्रवाई से ही एन. श्रीनिवासन को आईपीएल स्पाट फिक्सिंग प्रकरण में बीसीसीआई अध्यक्ष पद से अलग हटना पड़ा। उसके बाद ही बीसीसीआई में चल रहे धांधली का पर्दाफास हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोढा के नेतृत्व में जांच बैठाया।

 

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोढ़ा समिति की जिन सिफारिशों को स्वीकार किया है, उन पर एक नज़र.
1. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों की उम्र 70 साल से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.

2. बीसीसीआई का कोई सदस्य एक वक्त में एक ही पद पर रह सकता है, ताकि किसी तरह के हितों का टकराव नहीं हो.
3. बीसीसीआई में किसी अहम पद पर ना तो कोई मंत्री रह सकता है और ना ही कोई प्रशासनिक सेवा का अधिकारी.
4. बीसीसीआई के अंदर खिलाड़ियों का एसोसिएशन होगा और यह बाहर से भी फंड ले सकता है. हालांकि वह कितनी फंडिंग ले सकता है, इसके बारे में फ़ैसला बोर्ड को लेना है.
5. जिन राज्यों में एक से ज़्यादा क्रिकेट संघ है, उन्हें रोटेशनल आधार पर वोटिंग करना होगा. यानी एक राज्य के पास एक वक्त में केवल एक ही वोट होगा.
6. भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अंदर कैग का एक प्रतिनिधि भी शामिल होगा.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के तहत लाने के प्रस्ताव के बारे में कहा कि इस पर फ़ैसला संसद को करना है.

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