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#BihariKrantikari: इस देशभक्त ने एक हाथ में गीता और दूसरे हाथ में कृपाण रख देश की आजादी की कसम खाई थी

बिहार के मुंगेर जिला में माउर नामक ग्राम का एक संभ्रांत कृषक परिवार| 21 अक्टूबर 1887 ई० को पिता हरिहर सिंह के चौथे पुत्र के रूप में आये श्री कृष्ण सिंह| पिताजी शिवभक्त थे, जिसका प्रभाव पुत्रों पर भी आजीवन बना रहा| श्री कृष्ण सिंह न सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री रहे बल्कि ये आधुनिक बिहार के निर्माता भी माने गये हैं| भारत माता के महान सपूत, स्वतंत्रता संग्राम के नायक, स्वच्छ राजनीतिज्ञ, अनासक्त कर्मयोगी और किसानों और गरीबों के मसीहा, श्री कृष्ण सिंह को लोग यूँ ही प्यार से ‘श्री बाबू’ नहीं कहते| आजीवन देश को समर्पित रहे श्री सिंह कई बार कहा करते थे, “प्रत्येक नागरिक को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि पहले देश है, फिर शेष|”
छात्र जीवन में ही मुंगेर के कष्टहरणी घाट पर, एक हाथ में गीता और दूसरे हाथ में कृपाण लेकर श्री बाबू ने संकल्प लिया था कि “जब तक देश आजाद नहीं हो जायेगा, तब तक चैन से नहीं बैठूँगा”|
श्री कृष्ण सिंह ने महात्मा गांधी की अगुआई में सन् 1920, 1930, 1940 एवं 1942 ई० में संचालित राष्ट्रिय आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई| इन्होंने 10 वर्षों तक जेल की यातनाएं सहीं| 1916 ई० में उन्होंने सेंट्रल हिन्दू कॉलेज, बनारस में गांधी जी का भाषण पहली बार सुना और इतने प्रभावित हुए कि होमरूल आन्दोलन के सक्रिय हो गये| इन्होंने मुंगेर के गाँव-गाँव में घूमकर स्वराज का सन्देश किसानों को सुनकर उन्हें संगठित किया|
1920 ई० में गांधी जी से पहली बार साक्षात्कार के बाद ये वकालत छोड़ कर असहयोग आन्दोलन में सक्रिय हुए| उनके क्रांतिकारी भाषणों से जनता आंदोलित हो उठी| 1920 ई० के कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में श्री बाबू को 260 प्रतिनिधियों में सर्वप्रमुख प्रतिनिधि चुना गया| फलतः उनका कार्यक्षेत्र समस्त बिहार बन गया| 1921 ई० में ये एक साल के लिए गिरफ्तार कर लिए गये|
असहयोग आन्दोलन के स्थगित होने पर ये स्वराज दल से जुड़े| 1923 ई० में खड़गपुर में उन्होंने बिहार के जमींदारों द्वारा किसानों पर किये जाने वाले जुल्म के खिलाफ किसानों को संगठित किया| उस वक्त श्री बाबू किसान सभा के सचिव थे| किसानों की और से सिंहेश्वर चौधरी ने उन्हें ‘बिहार केसरी’ की उपाधि से विभूषित किया|
श्री बाबू के सहृदय, धर्म-निरपेक्ष होने की कई घटनाएँ सामने आती हैं| 1924 ई० में मुंगेर जिला परिषद के चुनाव में उन्हें सर्व सम्मति से अध्यक्ष मान लिया गया| किन्तु उन्होंने अपने अग्रज शाह मुहम्मद जुबैर, जो एक प्रतिष्ठित वकील थे, को अध्यक्ष बना कर खुद उपाध्यक्ष बने| 1930 ई० में जुबैर साहब की मृत्यु के पश्चात् ही इन्होंने अध्यक्ष पद स्वीकार किया|
नमक सत्याग्रह की घटना श्री बाबू के क्रांतिकारी विचार को खुल कर सामने रखती है| उस समय वो अस्वस्थ चल रहे थे, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद भी नहीं चाहते थे कि ऐसी परिस्थिति में श्री बाबू नमक सत्याग्रह में भाग लें| लेकिन श्री बाबू उस हालत में भी मुंगेर से 30-35 मील पैदल चलकर बेगुसराय मंडल के ‘गढ़पुरा’ ग्राम में नमक सत्याग्रह में भाग लेने पहुँचे| वहाँ श्री बाबू ने पुलिस पदाधिकारी द्वारा विरोध जताने पर, खुलते कड़ाहे की मूठ को दोनों हाथों से पकड़ लिया| हाथ में फफोले पड़ गये लेकिन श्री बाबू ने मूठ नहीं छोड़ी|
श्री बाबू वो शख्स रहे हैं जिन्होंने कभी चुनाव में हार नहीं देखी| 20 जुलाई 1937 ई० में ये बिहार के प्रधानमंत्री बने, किन्तु 1939 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को विश्वयुद्ध में झोंकने के खिलाफ आकर इन्होंने पद त्याग दिया| 1940 में पटना में छात्र-सभा में इन्होंने कहा, “न देंगे एक पाई, न देंगे एक भाई”| इसके बाद इन्हें पुनः 9 महीने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया|
आजादी के बाद जब-जब आम चुनाव हुए, श्री बाबू विजयी रहे| विशेष बात यह थी कि ये कभी वोट मांगने अपने कार्यक्षेत्र में नहीं गये| कई विरोधियों के बावजुद एवं स्वयं वोट मांगने न जाने के बावजुद भी ये हर बार विजयी हुए| ये एक निस्वार्थ देश सेवक का अपने कार्य पर विश्वास नहीं तो और क्या है!
श्री बाबू ने बिहार के विकास में कई कार्य किये| निर्विवाद रूप से ये कहा जाता है कि आज विकासोन्मुख बिहार में जो भी प्रगति का प्रबल स्तंभ दिख रहा है, उन सब की परिकल्पना श्री बाबू ने ही दी थी| बिहार में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर उन्होंने नया कीर्तिमान स्थापित किया| जमींदारों के शोषण से मुक्त होकर किसान प्रगति की ओर उन्मुख हुए| शोषण और दमन में पिसती अनुसूचित जनजातियों का उद्धार किया|
श्री बाबू पुस्तक प्रेमी और स्वाध्यायी थे| मुख्यमंत्री आवास में उनका एक निजी पुस्तकालय भी था, जिसको अंतिम समय में उन्होंने ‘मुंगेर सेवा सदन’ को दान कर दिया| श्री बाबू कहते थे, “ दुनिया में दो बड़ी चीजें हैं- एक बोलना, दूसरा लिखना| बोली और लेखन से हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाते हैं| तुलसी की बात हम नहीं जानते, यदि उनमें बोलने-लिखने की ताकत नहीं होती| भाव तो पैदा होकर खत्म हो जायेगा| छः हजार वर्ष पहले वेद की ऋचाएँ कही गईं| फिर गीता बोली गई| अब तो उनपर अनेक भाष्य और पुस्तकें बनकर तैयार हो गयी हैं| बोलने और लिखने की ताकत, इन्हीं दोनों से मनुष्य आगे बढ़ता है| आज पुस्तकों से ही संभव है कि कुछ ही वर्षों में लड़के सब जान लेते हैं, जिसे जानने में संसार को हजार वर्ष लगे थे|”
विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में वाक्चातुर्य, युद्ध में विक्रम और स्वभाव में शीतलता श्री बाबू के व्यक्तित्व की विशेषताएँ हैं| मैथली शरण गुप्त ने इन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा था-
“तुम स्वराज संयुग के योद्धा,
सिंह निहिंसन-वृति-वितृष्ण,
लो, स्वीकार करो हे विजयी,
इन जन का भी- ‘जय श्री कृष्ण’|”
लम्बे समय तक राजनीति में रहते हुए भी श्री बाबू ने कभी अपने परिवारजन को राजनीति में शामिल नहीं होने दिया| वो वंशवाद के विरोधी थे| जब तक वो मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने अपने परिवार से किसी को टिकट नहीं दिया| यहाँ तक की उन्हें ये भी पसंद नहीं था कि उनके बेटे उनके मुख्यमंत्री आवास में रहें|
1961 ई० में श्री बाबू ने अंतिम साँसें लीं| उनके निधन के पश्चात् उनकी तिजोरी खोली गयी| उसमें एक बड़ा लिफाफा था, जिसके अन्दर 3 छोटे लिफाफे थे| एक लिफाफे में 22 हजार रूपये थे, जिसके ऊपर लिखा था कि इसे बिहार प्रांतीय काँग्रेस कमिटी को दे दिया जाये, जिसका मैं आजीवन सदस्य रहा| दूसरे लिफाफे में 2 हजार रूपये थे जो उनके महरूम मित्र, जो उनके मंत्रिमंडल के सदस्य थे, के दूसरे बेटे को समर्पित था, जो उस वक्त आर्थिक कठिनाई में थे| तीसरा लिफाफा, जिसमें 1000 रूपये थे, उनके अत्यंत निकट राजनीतिक शख्सियत के नाम पर उसकी पुत्री की शादी के अवसर पर देने के लिए थे| 40 वर्षों तक राजनैतिक शिखर पर रहने वाले, 17 वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहने वाले इंसान के पास जो भी पूंजी थी, वह किसी को दान में देने के लिए ही थे|
श्री बाबू के जीवन से जुड़ी कई ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जो उनके निस्वार्थ देशभक्त होने का पुख्ता सबूत देती हैं| सिर्फ बिहार नहीं, वो देश की बात किया करते थे| ऐसे सच्चे देशभक्त को हमारा नमन| ऐसे सहृदय व्यक्तित्व, स्वतंत्रता के नायक को हम कभी भूल न पाएंगे| इनके जैसे मिसाल बहुत कम लोग स्थापित करते हैं| राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में-
“कौन बड़ाई चढ़े श्रृंग पर, अपना एक बोझ लेकर?
कौन बड़ाई पार गये यदि, अपनी एक तरी खेकर?
सुधा गरल वाली यह धरती, उसको शीश झुकाती है
खुद भी चढ़े साथ ले झुककर, गिरतों को बांहें देकर||”

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