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बिहारी विशेषता

बुद्ध पुर्णिमा: आज ही के दिन बुद्ध को बिहार के बोधगया में ज्ञान मिला था!


“तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो मानना या न मानना बाद की बात है। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतर्मन का भवन है।”

        – भगवान बुद्ध

बुद्ध के विचार
बुद्ध के विचार

 

 

 

आज 21st  मई  को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जा रही है जो की  वैशाख महीने के पूर्णिमा का दिन है ।   आज ही गौतम बुद्ध का 2578वां जन्मदिन मनाया जायेगा जिसे सब बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जानते है।

 

 

कहा जाता है की इसी दिन गौतम बुद्ध को अपने बिहार में स्थित बोधगया में  ज्ञान हांसिल हुई थी और इसी दिन उनका देहांत भी हुआ था ।  बिहार में स्थित बोद्धगया हिन्दू और बौद्ध धर्म वालो के लिए एक घार्मिक स्थल माना जाता है । हिन्दू धार्मिक ग्रंथो के अनुसार गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु जी का नांवा अवतार माना जाता है।

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महाबोधि मंदिर, बोद्धगया

 

 

‘गौतम बुद्ध’, ‘महात्मा बुद्ध’ आदि नामों से भी जाना जाते है। वे संसार के प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन आज भी बढ़ रही है।

 

 

अपने बिहार के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे तपस्या कर रहे गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, इसी के बाद वह भगवान कहलाए। इतिहासकार कहते हैं कि यहां पर अभी जो पेड़ है वह चौथी पीढ़ी का है। इसे सम्राट अशोक की पत्नी ने कटवा दिया था।

 

यही भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला था।
यही भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला था।

2002 में यूनेस्को द्वारा इस शहर को विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया। करीब 2630 ईसा पूर्व में राजकुमार सिद्धार्थ ने दुनियाभर में लोगों के दुख से व्यथित होकर सांसारिक मोह माया को त्याग दिया था। वह ज्ञान की खोज में निकल पड़े थे और बोधगया पहुंचे। यहां पर पांच साल तक तपस्या के बाद पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसके बाद ही वह भगवान बुद्ध कहलाए। बुद्ध ज्ञान की प्राप्ति के बाद दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए निकल पड़े थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा संस्मरण में बोधगया के प्रसिद्ध बोध मंदिर को महाबोधि मंदिर का नाम दिया था। सम्राट अशोक की इस बोधि वृक्ष के प्रति गहरी श्रद्धा थी। इससे नाराज उनकी पत्नी ने इस पेड़ को कटवा दिया था।

 

आज भी बोधगया आस्था का महाकेंद्र है। आप भी एक बार यहाँ आईये और बुद्ध के ज्ञान को महसूस करीये।

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